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फूलों की खेती में है खुशबू बिखेरने की अपार क्षमता

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 10:21 AM IST

सन 1988 में बीज नीति को उदार बनाए जाने के बाद सन 1990 के दशक के आरंभ में देश में फूलों की व्यावसायिक खेती की शुरुआत हुई थी। इतना समय बीत जाने के बाद अब फूलों की खेती, कृषि जगत के बागवानी क्षेत्र का एक विशिष्ट और आकर्षक हिस्सा बन चुकी है। बीते दो दशक में इस क्षेत्र की वृद्धि वाकई उल्लेखनीय है। सन 2001 से अब तक फूलों की खेती का रकबा 4.4 गुना बढ़ा है और उत्पादन में 5.6 गुना वृद्धि दर्ज की गई है। घरेलू स्तर पर इन फूलों की मांग लगातार बढ़ रही है और इसकी अधिकांश खपत भी घरेलू बाजार में हो जाती है लेकिन सरकार ने इस क्षेत्र को निर्यात की दृष्टि से एक उभरते संभावनाशील क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया है। शादी समारोह, वर्षगांठ, वैलेन्टाइंस डे, शिक्षक दिवस, मातृ दिवस, क्रिसमस, नव वर्ष तथा ऐसे ही अन्य अवसरों पर तोहफे में फूल देने का चलन भी बढ़ा है।
 
करीब 28.6 लाख टन के सालाना उत्पादन के साथ भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा पुष्प उत्पादक देश है। पहले स्थान पर अब भी चीन कायम है। दूसरे स्थान पर पहुंचने की इस उल्लेखनीय यात्रा में भारत ने नीदरलैंड, विभिन्न यूरोपीय देशों तथा अमेरिका जैसे मुल्क को पीछे छोड़ा है। यद्यपि भारत में उपजे फूल दुनिया के 130 देशों में पहुंचने लगे हैं लेकिन फूलों की खेती से उपजे उत्पादों के निर्यात का बाजार का अभी गति पकडऩा शेष है। वैश्विक पुष्प व्यापार में भारत की हिस्सेदारी काफी कम करीब 0.4 फीसदी है। हालांकि भारत को भौगोलिक और जलवायु संबंधी लाभ हासिल है और दुनिया के कई बड़े देशों में जब फूलों की मांग चरम पर होती है, उस समय भारत में उत्पादन भी जोरों पर होता है। 
 
इस समय हम प्रति वर्ष 450 करोड़ रुपये से 600 करोड़ रुपये मूल्य के फूलों का निर्यात करते हैं। ताजा आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि सन 2018-19 में हमने 571 करोड़ रुपये मूल्य का पुष्प संबंधी निर्यात किया जो इससे पिछले वर्ष के 507 करोड़ रुपये से 12.6 फीसदी अधिक था। सन 2019-20 में दिसंबर 2019 तक 445.48 करोड़ रुपये मूल्य के पुष्प उत्पादों का निर्यात किया गया था। बीते तीन वर्षों में अमेरिका भारत के फूलों का सबसे बड़ा आयातक रहा है। इसके बाद जर्मनी, ब्रिटेन, नीदरलैंड, संयुक्त अरब अमीरात, कनाडा, जापान, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और इटली का नंबर आता है। 
 
दिलचस्प बात यह है कि भारत में फूलों की खेती में अभी भी खुले खेतों में होने वाली फूलों की खुदरा खेती का दबदबा है। धार्मिक स्थानों के आसपास यह खेती ज्यादातर छोटे और सीमांत किसान करते हैं क्योंकि वहां साल के अधिकांश समय मांग बरकरार रहती है। इन फूलों में व्यापक तौर पर गेंदा, गुलाब, बेला-चमेली, गुलदाउदी, गैलार्डिया, क्रॉसैंड्रा आदि की हिस्सेदारी 98 फीसदी है और फूलों की खेती में इन्हीं का दबदबा है। इन फूलों का अधिकांश कारोबार थोक में होता है और इनका इस्तेमाल हार बनाने, सामाजिक समारोहों की सजावट करने और धार्मिक स्थानों पर होता है। इनमें से कई का वाणिज्यिक इस्तेमाल भी होता है, मसलन तेल निकालने और गुलकंद जैसे पारंपरिक उत्पाद तैयार करने में। कई पुष्प औषधीय और सौंदर्य प्रसाधन बनाने में भी इस्तेमाल किए जाते हैं।
 
आर्थिक उदारीकरण के बाद कॉर्पोरेट जगत के प्रवेश ने ही देश में फूलों की खेती को तकनीक सक्षम बनाया और तभी निर्यात गुणवत्ता वाले फूलों का उत्पादन भी शुरू हुआ। इन्हें ग्रीनहाउस में नियंत्रित वातावरण में तैयार करने की शुरुआत भी तभी हुई। इन कंपनियों ने प्रमुख तौर पर उन फूलों की खेती पर ध्यान दिया जिनकी वैश्विक बाजारों में अधिक मांग है। उदाहरण के लिए गुलाब, गुलनार, गुलदाउदी, जरबेरा, लिलियम, चाइना एस्टर आदि। विभिन्न प्रकार के ऑर्किड और एंथुरियम जो देश के पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों में पाए जाते हैं, उन्होंने भी विश्व बाजार में अपनी पकड़ मजबूत की है। पुणे स्थित पुष्पविज्ञान अनुसंधान निदेशालय के प्रमुख के वी प्रसाद के मुताबिक इन निर्यात आधारित पुष्पों में अधिकांश की उत्पादन इकाइयों ने नीदरलैंड, फ्रांस और इजरायल जैसे देशों से तकनीक हासिल कर उत्पादन कार्य शुरू किया लेकिन अब वे काफी हद तक स्वदेशी तकनीक पर स्थानांतरित हो गए हैं। ये स्वदेशी तकनीक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा विकसित की गई हैं। पुष्प विज्ञान क्षेत्र में आगे का काफी विकास स्थानीय तकनीकों के माध्यम से हो रहा है। सरकार भी जरूरी नीतिगत संरक्षण मुहैया करा रही है। वह कहते हैं कि किसानों और उद्यमियों की भूमिका भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है।
 
यह सही है कि वर्ष 2018-19 में फूलों की खेती का रकबा करीब 3.13 लाख हेक्टेयर था लेकिन इसमें काफी विस्तार की संभावना है। घरेलू और निर्यात संबंधी मांग में लगातार इजाफा होने के कारण इसके रकबे में तेज इजाफा हो सकता है और फूलों की खेती नए क्षेत्रों में विस्तार पा सकती है। हालांकि कुछ बाधाएं और चुनौतियां भी हैं जिन्हें हल करके इस क्षेत्र की संभावनाओं का अच्छी तरह दोहन किया जा सकता है। वैश्विक मांग और आपूर्ति को लेकर बाजार समझ की कमी और कीमतों को लेकर सही अनुमान नहीं लगा पाना भी ऐसी ही कमियां हैं। इसके अलावा चीन तथा पड़ोसी मुल्कों से भी इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा मिल रही है। नेपाल, श्रीलंका और पाकिस्तान भारत के पुष्प निर्यात के लिए चुनौती बनकर उभरे हैं। भारत की तरह इन देशों को भी जलवायु संबंधी लाभ हासिल है और वे बड़े आयातक देशों के लिए उस समय वे फूल उत्पादित कर रहे हैं जो आयातक देशों में कड़ाके की ठंड के कारण नहीं उग पाते। ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि वह तकनीकी श्रेष्ठता के दम पर इन देशों पर बढ़त कायम करे। ऐसे में देश का पुष्पविज्ञान शोध नेटवर्क मददगार साबित हो सकता है।

First Published : December 28, 2020 | 8:33 PM IST