लंबे समय से प्रशासनिक कार्यों से जुड़े हुए लोगों को कई बार यह समझ में नहीं आता है कि कुछ ऐसे क्षेत्र और संगठन होते हैं जहां शीर्ष पदों पर अधिकारियों को बिठाने के लिए काफी सोच विचार की जरूरत होती है।
अक्सर जिम्मेदार और ऊंचे ओहदों पर ऐसे लोगों को नियुक्त कर दिया जाता है जिनकी नौकरी को कुछ ही समय बचा होता है। प्रशासनिक इकाइयों में भी कई बार ऐसा देखा गया है कि सरकार ने सचिव स्तर के पदों पर ऐसे लोगों को बिठा दिया है जिन्हें कुछ ही महीनों बाद सेवानिवृत्त होना होता है।
ऐसे लोग अक्सर अपनी सेवानिवृत्ति से संबंधित औपचारिकताओं को पूरा करने में ही जुटे हुए होते हैं। उस अवधि में ये अपने पेंशन के कागजात तैयार करने में ही काफी मशगूल होते हैं। इस लिहाज से यह फैसला स्वागत योग्य है जिसमें कहा गया है कि ऐसे लोग जिनकी नौकरी में दो साल से कम का समय बचा हो, उन्हें सचिव स्तर के पदों पर नियुक्त नहीं किया जाएगा।
विदेश सचिव और कैबिनेट सचिव जैसे महत्वपूर्ण ओहदों पर भी नियुक्त लोगों के लिए अब अनिवार्य हो गया है कि वह एक तय अवधि तक उस पद पर सेवाएं देते रहें। इस फैसले से कम से कम यह फायदा तो होगा कि इन पदों पर नियुक्त लोगों को इस पद की जिम्मेदारियों को समझने का मौका मिलेगा और वे कुछ ठोस कार्यों को पूरा कर पाएंगे। ये फैसले सराहनीय तो हैं, पर ये उच्चतम न्यायालय पर लागू नहीं होते जहां कुछेक महीनों में ही मुख्य न्यायाधीशों के चेहरे बदलते रहते हैं।
उदाहरण के लिए पिछले कई महीनों से विद्युत नियामक के अध्यक्ष की कुर्सी खाली पड़ी थी और अभी हाल ही में इस पद को भरा गया है- वह भी तब जब कि देश में बिजली की समस्या विकराल रूप लेती जा रही थी। कुछ ऐसा ही भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के अध्यक्ष पद को लेकर भी हुआ था। आखिरी समय तक यह साफ नहीं था कि सेबी के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी किस व्यक्ति को सौंपी जाएगी और इससे बोर्ड के अंदर ऊहापोह की स्थिति थी।
हालांकि, रक्षा क्षेत्र में स्थितियां इससे कुछ इतर हैं जहां सेना प्रमुख के सेवानिवृत्ति के कुछ हफ्ते पहले ही सरकार को यह बताना पड़ता है कि पद की अगली बागडोर किसके हाथों में होगी। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर इसी वर्ष सितंबर महीने में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। यानी इस कुर्सी के खाली होने में लगभग 80 दिन बाकी हैं, फिर अभी तक इस बात का कोई संकेत नहीं है कि आरबीआई के गवर्नर का पदभार आगे कौन ग्रहण करेगा।
जो व्यक्ति इस पद पर बैठेगा उसे इतना समय भी नहीं दिया जाएगा कि वह काम शुरू करने के पहले पद की जिम्मेदारियों को समझे। अगर आरबीआई का ही कोई व्यक्ति इस पद पर काबिज होता है तो शायद उसे माहौल से वाकिफ होने में समय नहीं लगेगा, पर ऐसा होगा यह जरूरी तो नहीं है। ऐसे समय में जब आर्थिक प्रबंधन महत्वपूर्ण और जटिल होता जा रहा है, निश्चित तौर पर सरकार को नियुक्तियों के पहले और अधिक तैयार करने की जरूरत होगी।