पिछले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था लगातार बेहतरी की दिशा में रही है। देश में डिजिटल प्राथमिकता वाले नीतिगत सुधारों ने इसे बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई है। इन सुविचारित रणनीतिक हस्तक्षेपों ने एक ऐसा तंत्र तैयार किया है जो नागरिकों को सशक्त बनाता है।
जन धन योजना ने 57 करोड़ से अधिक ऐसे नागरिकों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली में शामिल किया है जिनके पास पहले बैंक खाते तक नहीं थे। जन धन, आधार और मोबाइल के रूप में ‘जैम’ त्रयी की बुनियाद रखी गई जिसने प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण को सक्षम बनाया और कल्याणकारी वितरण में लीकेज को कम करने का काम किया। यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) ने लाखों लोगों को डिजिटल भुगतान की दिशा में प्रेरित करके भारत में डिजिटल पैठ को व्यापक बनाने में मदद की।
व्यक्तिगत बीमा प्रीमियम पर माल एवं सेवा कर यानी जीएसटी हटाने से भारत को बीमित देश बनाने की दिशा में आगे ले जाने में सहायता मिल रही है। इन सबको जोड़ने वाला एक तत्त्व है किफायती कनेक्टिविटी। भारत दुनिया के सबसे कम मोबाइल डेटा लागत वाले देशों में शामिल है। यही वजह है कि देश में जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा मोबाइल इंटरनेट तक पहुंच रखता है।
इन बातों के बीच भारत ने दुनिया का सबसे महत्त्वाकांक्षी डिजिटल सार्वजनिक अधोसंरचना ढांचा कायम किया है। हालांकि इसका प्रभाव बहुत हद तक स्मार्टफोन पर निर्भर है जो लेनदेन की सुविधा देते हैं। अब स्मार्टफोन की बिक्री में लगातार गिरावट आ रही है। 2025 की चौथी तिमाही में स्मार्टफोन की शिपमेंट सालाना आधार पर 7 फीसदी गिरी, क्योंकि कच्चे माल की बढ़ती कीमत के कारण बिक्री पर असर पड़ा। अब बढ़ती मेमरी लागत, रुपये का अवमूल्यन और 18 फीसदी जीएसटी के कारण बड़ी संख्या में देशवासी डिजिटल अर्थव्यवस्था से बाहर हो रहे हैं। यह समस्या चक्रीय नहीं ढांचागत है।
वर्ष 2026 में तीन शक्तियां एक साथ आई हैं, जिससे उद्योग इसे स्मार्टफोन बाजार के लिए चिंताजनक परिवेश मान रहा। वैश्विक डीआरएएम (डायनेमिक रैंडम-एक्सेस मेमरी) की कीमतें 2026 की पहली तिमाही में उससे पिछली तिमाही से 50 फीसदी से अधिक बढ़ गई हैं। एनएएनडी फ्लैश (नॉन-वोलेटाइल मेमरी) की कीमतें 80-90 फीसदी तक बढ़ गई हैं। काउंटर प्वाइंट रिसर्च के मुताबिक एक सस्ते फोन के लिए, अब मेमरी कुल सामग्री लागत का 43 फीसदी हिस्सा रखती है, जिससे एक ही तिमाही में उत्पादन लागत में 25 फीसदी की वृद्धि हुई है।
साथ ही, पिछले वर्ष में रुपये का डॉलर के मुकाबले लगभग 5 फीसदी अवमूल्यन हुआ है, जिससे आयातित घटकों की लागत बढ़ गई है। इसके साथ 18 फीसदी जीएसटी, जो प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं में स्मार्टफोन पर सबसे अधिक कर दर है, को जोड़ दिया जाए तो अब 10,000 रुपये से कम का स्मार्टफोन 25 से 35 फीसदी महंगा हो गया है। भारत हर साल लगभग 1.10 करोड़ स्मार्टफोन बनाता है, जिनमें से अधिकांश 20,000 रुपये से कम की श्रेणी के होते हैं। मांग में गिरावट अब देशभर में उत्पादन लाइनों की अर्थव्यवस्था को खतरे में डाल रही है।
स्मार्टफोन अब बुनियादी आर्थिक अधोसंरचना का हिस्सा बन चुका है। विदर्भ का एक किसान भी अपनी उपज बेचने से पहले मंडी भाव देखने के लिए फोन का उपयोग करता है। आणंद की एक डेरी की सहकारी सदस्य इसके माध्यम से भुगतान प्राप्त करती है और अपने बैंक खाते का इस्तेमाल करती है। बिहार का एक दिहाड़ी मजदूर ग्रामीण रोजगार योजना की मजदूरी के लिए आधार प्रमाणीकरण करता है। ओडिशा का एक ग्रामीण छात्र राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के दीक्षा ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म तक पहुंचता है।
दूसरी और तीसरी श्रेणी के शहर और ग्रामीण भारत अब नए स्मार्टफोन अपनाने में 70 फीसदी से अधिक और भारत के इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में आधे से अधिक का हिस्सा रखते हैं। लगभग 30 फीसदी किसान स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं। स्वरोजगार करने वाले कामगार (जो भारत की कार्यबल का 58 फीसदी हैं) इस उपयोग में 30 से 40 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं। उनके लिए 20,000 रुपये से कम का स्मार्टफोन आजीविका की कुंजी है।
जीएसटी दर में बदलाव के लिए ध्यान अक्सर तात्कालिक राजस्व हानि पर होता है। स्मार्टफोन के मामले में गुणक प्रभाव महत्त्वपूर्ण है। पहली बार के उपयोगकर्ता औपचारिक डिजिटल अर्थव्यवस्था में प्रवेश करते हैं। जिससे यूपीआई लेनदेन, ई-कॉमर्स खरीदारी, फिनटेक ऋण और डेटा व डिजिटल सेवाओं पर खर्च बढ़ता है। ये सभी कर राजस्व उत्पन्न करते हैं।
यह एक नीतिगत विरोधाभास है। सरकार ने भारत को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन निर्माता बनाने में भारी निवेश किया है। इसका उत्पादन वित्त वर्ष 25 में 5.45 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया और निर्यात 2 लाख करोड़ रुपये को पार कर चुका है।
उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन यानी पीएलआई आपूर्ति पक्ष पर काम करता है और निर्माताओं को भारत में उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करता है। मांग इस बात पर निर्भर करती है कि भारतीय उन फोनों को खरीदने में सक्षम हैं या नहीं, और यह जीएसटी से प्रभावित होती है। आज सरकार पीएलआई के माध्यम से उत्पादन को सब्सिडी देती है, जबकि उपभोग पर 18 फीसदी कर लगाती है। जैसे-जैसे 20,000 रुपये से कम की श्रेणी में कारोबार का आकार कम होता है, निर्माण की अर्थव्यवस्था कमजोर होती है। भारतीय विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत घरेलू मांग पर निर्भर करती है।
इस मुद्दे का कोई भी ईमानदार विश्लेषण एक तकनीकी जटिलता को स्वीकार करना चाहिए। घरेलू स्मार्टफोन निर्माता महत्त्वपूर्ण इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) जमा करते हैं, जिसका अनुमान 15-17 फीसदी है, जिसके विरुद्ध वे अपने आउटपुट जीएसटी देनदारी को समायोजित करते हैं। यदि आउटपुट पर दर में कटौती की जाती है और इस आईटीसी को समायोजित करने के लिए कोई तंत्र नहीं होता, तो यह एक उल्टा शुल्क संरचना बना सकता है जो घरेलू निर्माताओं को नुकसान पहुंचाता है।
यह समस्या हल करने लायक है। 20,000 रुपये से कम वाली श्रेणी में घरेलू निर्माताओं के लिए एक सुव्यवस्थित आईटीसी रिफंड तंत्र तैयार करना उचित होगा जो पहले से ही जीएसटी कानून में उल्टी शुल्क स्थितियों के लिए उपलब्ध है। जीएसटी दर में कटौती को तेज आईटीसी रिफंड के साथ जोड़ने से उपभोक्ता सामर्थ्य सुनिश्चित होती है और वह भी बिना घरेलू निर्माताओं को दंडित किए।
तीन हस्तक्षेप विचारणीय हैं। पहला है दो-स्तरीय जीएसटी सुधार। यानी 20,000 रुपये से कम कीमत वाले स्मार्टफोन पर तुरंत जीएसटी 18 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी करना, और तेज आईटीसी रिफंड के साथ इसे जोड़ना ताकि मूल्य राहत दी जा सके वह भी बिना शुल्क व्युत्क्रम पैदा किए।
दूसरा है 20,000 रुपये से कम वाले खंड में पीएलआई सहयोग का विस्तार करना, जहां मूल्य संवर्धन सबसे कमजोर है।
तीसरा विशेष ध्यान देने योग्य है क्योंकि इसकी वित्तपोषण व्यवस्था पहले से मौजूद है। सरकार की डिजिटल भारत निधि के जरिये, जो डिजिटल समावेशन के लिए एक निर्धारित कोष है, 20,000 रुपये से कम कीमत वाले स्मार्टफोन पर प्रत्यक्ष उपभोक्ता सब्सिडी का विकल्प प्रदान किया जा सकता है, बिना नए बजट आवंटन की आवश्यकता के।
ऐसे में चीन का 2024 का अनुभव शिक्षाप्रद है। वहां 6,000 रेनमिनबी से कम कीमत वाले फोन पर 15 फीसदी प्रत्यक्ष उपभोक्ता रियायत ने मांग को बहुत अधिक बढ़ावा दिया और घरेलू विनिर्माण को सहारा मिला। भारत में इसके समकक्ष 20,000 रुपये से कम कीमत वाले फोन पर लक्षित और मौजूदा रिटेल व ई-कॉमर्स अधोसंरचना के माध्यम से उपलब्ध कराया जाए।
इसे जीएसटी परिषद के किसी भी संशोधन की तुलना में ज्यादा तेजी से लागू किया जा सकता है। हमारे पास कोष मौजूद है और आवश्यकता भी है। नीति निर्णय अब वृद्धि को तेज करने और बड़े पैमाने पर मांग को सामने लाने का स्पष्ट अवसर पेश करता है।
(लेखक आईआरडीएआई के पूर्व चेयरमैन और वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग के पूर्व सचिव हैं)