शिक्षा मंत्रालय अपने आप में किसी विशाल साम्राज्य से कम नहीं है। स्वायत्त कहलाने वाला केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) शिक्षा मंत्रालय की निगरानी में काम करता है। सीबीएसई के तहत 26 देशों में 25,000 से अधिक स्कूल और 40 लाख छात्र (कक्षा 10वीं और 12वीं) आते हैं। उच्च शिक्षा विभाग 57 केंद्रीय विश्वविद्यालयों, कुल 49,565 संबद्ध महाविद्यालयों, राज्यों के स्तर पर 537 निजी और 437 सार्वजनिक विश्वविद्यालयों का संचालन करता है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) जैसे राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थानों सहित इन उच्च शिक्षण संस्थानों में वर्ष 2021-22 तक कुल लगभग 4 करोड़ छात्रों ने दाखिला लिया था। शिक्षा मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) इन संस्थानों के लिए कई परीक्षाएं आयोजित करती है। यह सब मंत्रालय की जिम्मेदारियों का महज एक छोटा सा हिस्सा है। इन सभी पर निगरानी रखने का दायित्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर है।
ऐसा नहीं है कि पहले अन्य मंत्रियों और सरकारों के कार्यकाल में परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक नहीं हुए मगर महज दो महीनों के भीतर ही राष्ट्रीय पात्रता सह-प्रवेश परीक्षा (स्नातक) या नीट-यूजी के कई प्रश्न पत्र लीक हो गए हैं। कक्षा 12 के अंक पत्रों में अशुद्धियां पाई गई हैं। संभवतः डिजिटल मूल्यांकन व्यवस्था जल्दबाजी में अपनाने के कारण ऐसा हुआ होगा।
खैर, कारण जो भी मगर मूल्यांकन प्रणाली पर छात्रों का विश्वास पूरी तरह डगमगा गया है। पुनर्मूल्यांकन की मांग ने सीबीएसई को अराजकता की स्थिति में धकेल दिया है। स्थिति की गंभीरता इस बात से और भी बढ़ जाती है कि कुछ ही सप्ताह में कॉलेजों में दाखिला शुरू हो जाएगा। सरकार ने शीर्ष अधिकारियों को बर्खास्त कर इन घटनाक्रम को गंभीरता से लेने के संकेत दिए हैं। दूसरी तरफ विपक्षी दल कांग्रेस का कहना है कि ‘मंत्री प्रधान’ को जिम्मेदारी लेनी चाहिए और तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए।
क्या धर्मेंद्र प्रधान वाकई मुश्किल में हैं? या उनके मंत्रालयों में मुसीबतें लगातार उनका पीछा करती रही हैं?
वह भारत के सबसे लंबे समय तक कार्यभार संभालने वाले पेट्रोलियम मंत्री रहे हैं। प्रधान ने स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री के साथ शुरुआत की थी और फिर कैबिनेट मंत्री बनाए गए। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि सरकार का कारोबार में कोई दखल नहीं होना चाहिए और उन्होंने भारत पेट्रोलियम निगम लिमिटेड (बीपीसीएल) के निजीकरण की दिशा में पहल की। इसके तहत कंपनी में सरकार की अपनी 52.9 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की योजना था।
वर्ष 2020 में उन्होंने पत्रकारों से कहा,‘बीपीसीएल में निजी निवेशकों की काफी दिलचस्पी है।’ मगर यह योजना कभी कारगर नहीं हो पाई। वर्ष 2022 में केवल एक ही बोलीदाता बचा जिसके बाद सरकार ने यह प्रक्रिया ही रद्द कर दी। प्रधान के बाद पेट्रोलियम मंत्री बने हरदीप पुरी ने किसी भी तेल कंपनी के निजीकरण से इनकार कर दिया है। जब एक सार्वजनिक मंच पर पुरी से निजीकरण के बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने इसे ‘बकवास’ बताया।
नोटबंदी के ठीक बाद वर्ष 2017 से वर्ष 2019 के बीच प्रधान को कौशल विकास मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। यह वह दौर था जो रोजगार की उम्मीद रखने वालों के लिए बेहद मुश्किल गुजरा। इसके बाद कोविड महामारी आ गई।
इस महामारी ने हर तरफ कोहराम मचा दिया। मंत्रालय में कोई बड़ी उपलब्धि देखने को नहीं मिली। उन्हें वर्ष 2021 में शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। वर्तमान में शिक्षण कर्मचारियों की कमी देखते हुए स्कूल इस बात को लेकर परेशान हैं कि वे सीबीएसई के उस आदेश का पालन कैसे करें जिसमें बच्चों के लिए तीन भाषाएं (जिनमें दो भारतीय भाषाएं होनी चाहिए) पढ़ना अनिवार्य किया गया है। यह नीति (जो सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष समीक्षाधीन है) जुलाई में लागू होनी है।
हालांकि, राजनीति में प्रधान को कहीं अधिक सफलता मिली है। वह मध्य ओडिशा के तालचेर से हैं। उनके पिता देवेंद्र प्रधान राजनीति में सक्रिय थे और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री बने थे। धर्मेंद्र अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यकर्ता बने और पहले साल ही तालचेर कॉलेज के छात्र संघ अध्यक्ष बन गए। हालांकि, एक युवा भाजपा कार्यकर्ता के लिए ओडिशा में काम करना कठिन था।
वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के बीजू पटनायक के साथ घनिष्ठ संबंधों के कारण भाजपा राज्य में सत्ताधारी दल पर हमला नहीं कर सकी। जो लोग भाजपा और बीजू जनता दल (बीजद) दोनों दलों के साथ संतुलन साध कर आगे बढ़े वे प्रधान जैसे जुझारू भाजपा नेता की तुलना में राजनीति में अधिक सफल रहे।
उदाहरण के लिए अश्विनी वैष्णव को ही लें जिन्होंने अधिकारी के रूप में अपना करियर शुरू किया और नवीन पटनायक के करीब होने के कारण वाजपेयी के साथ काम किया। उन्हें बाद में राज्य सभा सीट मिली और अब वह मोदी सरकार में एक महत्त्वपूर्ण मंत्री बन गए हैं। यह अलग बात है कि वह अब भी विपक्ष में मौजूद अपने पूर्व ‘मार्गदर्शक’ पर हमला करने से कतराते हैं।
इसके उलट प्रधान ने भाजपा के लिए लंबे समय तक अथक परिश्रम किया। उन्होंने ओडिशा में पार्टी को मजबूत बनाया और पार्टी को सरकार में लाने में मदद की। ओडिशा विधान सभा में भाजपा विधायक भारी तादाद में उनके समर्थक हैं मगर वह मुख्यमंत्री नहीं बनाए गए। प्रधान कोई करिश्माई नेता या प्रभावशाली वक्ता नहीं हैं।
मगर वास्तविक राजनीति और संगठनात्मक गतिशीलता की उनकी समझ उन्हें पार्टी का एक अहम व्यक्ति बनाती है। उन्होंने हरियाणा से पहले कर्नाटक, उत्तराखंड, झारखंड और निश्चित रूप से ओडिशा में भाजपा के लिए विधान सभा चुनावों का संचालन किया जहां उन्होंने भाजपा को शानदार जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई। ओडिशा में ऐसा कोई प्रमुख पार्टी कार्यकर्ता नहीं है जिसे वह नाम से नहीं जानते हों, भले ही वे बागी ही क्यों न हों।
वह बागियों से संपर्क साधने में भी संकोच नहीं करते, उन लोगों से भी नहीं जिन्हें उन्होंने स्वयं पार्टी से बाहर कर दिया था। अपने मंत्रालयों में हुए तमाम विवादों के बाद प्रधान को शायद स्वयं को नए सिरे से स्थापित करने की जरूरत है। भाजपा का नेतृत्व अब नितिन नवीन के हाथों में है जो पार्टी में उनके कनिष्ठ रहे हैं। प्रधान के पास अब एक विकल्प केंद्र सरकार में ही समान महत्त्व का दूसरा ओहदा तलाशना है। मगर ऐसा करना उनके हाथ में नहीं है।