पिछले सप्ताह केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 62,500 करोड़ रुपये की मोबाइल फोन विनिर्माण योजना (एमपीएमएस) और 1.27 लाख करोड़ रुपये के ‘भारत सेमीकंडक्टर मिशन’ (आईएसएम) 2.0 के लिए हामी भर दी थी। इस कदम से देश में इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण को बढ़ावा मिलेगा। उत्पादन संबंधी योजना (पीएलआई) का पहला चरण काफी असरदार रहा, जिससे स्मार्टफोन विनिर्माण के नक्शे पर भारत को विशिष्ट पहचान मिल गई। भारत अब दूसरी सबसे बड़ी संख्या में मोबाइल फोन बनाने वाला देश बन गया है और यहां से होने वाला निर्यात में स्मार्टफोन अहम हिस्सा बन गया है। किंतु भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग मुख्य रूप से इन्हें असेंबल करने तक ही सीमित है। अधिक मूल्यवान पुर्जे बनाने और डिजाइन करने की कमान विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के हाथों में ही है। एमपीएमएस में यह कमी परोक्ष रूप से स्वीकार की गई है।
पहले की पीएलआई योजना मुख्य रूप से अतिरिक्त उत्पादन पर प्रोत्साहन देती थी मगर नई योजना का मकसद देश में अधिक मूल्य वर्द्धन है। भारत में बने मोबाइल फोन की पात्र बिक्री पर विनिर्माताओं को 2.25 से 5 प्रतिशत तक प्रोत्साहन मिलेगा। इसके अलावा अहम पुर्जों और सब असेंबली को देश के भीतर से ही लेने पर उन्हें 1.5 प्रतिशत तक प्रोत्साहन अलग से मिलेगा। जो कंपनियां उत्पाद डिजाइन और शोध तथा विकास में निवेश करेंगी, उन्हें पात्र बिक्री पर 3 प्रतिशत प्रोत्साहन और भी मिलेगा।
यह अंतर काफी मायने रखता है। फाइनल असेंबली से रोजगार मिलता है मगर सबसे अधिक आर्थिक लाभ उन कंपनियों को होता है, जिनका पुर्जों, डिजाइन, सॉफ्टवेयर और तकनीकी प्रौद्योगिकी पर कब्जा होता है। पिछले कुछ महीनों में सेमीकंडक्टर, मेमरी चिप और दूसरे महंगे पुर्जों का आयात बढ़ने से इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं में व्यापार घाटा बढ़ा है। इससे पता चलता है कि देश के भीतर उत्पादन बढ़ाने से ही बात नहीं बनेगी बल्कि मुख्य पुर्जों के आयात पर निर्भरता भी घटानी होगी। वास्तव में सेमीकंडक्टर और पुर्जों के बढ़ते आयात के कारण इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं में भारत का व्यापार घाटा 2025-26 में 68.17 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। सरकार को उम्मीद है कि नई योजना से पांच वर्षों में लगभग 39 लाख करोड़ रुपये मूल्य के मोबाइल फोन तैयार होंगे और निर्यात भी काफी बढ़ेगा।
यह महत्त्वाकांक्षा आईएसएम 2.0 में ज्यादा दिखती है। सेमीकंडक्टर मिशन के पहले चरण में निवेश आया और फैब्रिकेशन व पैकेजिंग परियोजनाएं शुरू हुईं। व्यापक नजरिये वाले दूसरे चरण में फैब्रिकेशन के अलावा सेमीकंडक्टर डिजाइन, उन्नत पैकेजिंग, विनिर्माण उपकरण, खास रसायन एवं सामग्री, शोध एवं विकास तथा घरेलू बौद्धिक संपदा को भी सहारा देने के प्रावधान हैं। लेकिन ध्यान रहे कि वित्तीय प्रोत्साहन जरूरी तो हैं मगर दुनिया भर में होड़ करने वाला इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सेमीकंडक्टर उद्योग तैयार करने के लिए वही काफी नहीं हैं।
सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन के लिए बहुत भरोसेमंद ढांचे, मजबूत इंजीनियरिंग क्षमता और लंबे अरसे तक नीतिगत स्थिरता जरूरी है। इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग अब भी लागत की चुनौतियों से जूझ रहा है, जिसके कारण देश में पुर्जों का विनिर्माण चीन और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्द्धी देशों से होड़ नहीं कर पा रहा। रुकावटें दूर करने के लिए नीतिगत स्थिरता, तेजी से मंजूरी और अनुसंधान एवं विकास में लगातार निवेश की आवश्यकता है।
इस सिलसिले में सरकार द्वारा डिक्सन-वीवो संयुक्त उद्यम को हाल ही में मंजूरी देना और कुछ खास वस्तुओं पर आयात शुल्क कम करना दर्शाता है कि देश में तकनीकी क्षमता तैयार करने के लिए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से अलग होना जरूरी नहीं है। जो देश निर्यातोन्मुखी विनिर्माण तंत्र तैयार करने में सफल रहे हैं, उन्होंने देसी क्षमता विकसित करने से पहले विदेशी पूंजी, तकनीक और आपूर्ति तंत्र का फायदा उठाया। नई योजना की सफलता इस बात से तय होगी कि भारत स्थानीय स्तर पर लगातार मूल्य वर्द्धन करने के साथ प्रतिस्पर्द्धी उपकरण विनिर्माता बना सकता है या नहीं। अहम यह भी होगा कि बौद्धिक संपदा का विकास जारी रखते हुए जरूरी तकनीक पर अपनी निर्भरता वह कितनी कम कर सकता है।