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Editorial: प्राथमिकता ऋण ढांचे की हो समीक्षा

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साल 2020 से 2025 के बीच जिला-स्तरीय त्रैमासिक आंकड़ों पर आधारित इस अध्ययन ने प्राथमिकता ऋण प्रवाह में तीव्र क्षेत्रीय असंतुलन की ओर संकेत किया

Last Updated- June 10, 2026 | 11:57 PM IST
Bank Deposits

प्राथमिकता क्षेत्र का ऋण (पीएसएल) लंबे समय तक भारत के वित्तीय समावेशन के प्रमुख उपायों में से एक था। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) द्वारा जारी एक कार्यपत्र ने इस बात का मूल्यांकन किया कि क्या निर्देशित ऋण अब भी सार्थक विकासात्मक परिणाम देता है।

साल 2020 से 2025 के बीच जिला-स्तरीय त्रैमासिक आंकड़ों पर आधारित इस अध्ययन ने प्राथमिकता ऋण प्रवाह में तीव्र क्षेत्रीय असंतुलन की ओर संकेत किया। यह अध्ययन अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के 95 फीसदी से अधिक ऋण को कवर करता है। इसके मुताबिक 10 फीसदी से कम जिलों ने सभी प्राथमिकता क्षेत्र ऋणों का 45 फीसदी से अधिक हिस्सा प्राप्त किया।

ऋण अपेक्षाकृत विकसित राज्यों और शहरीकृत जिलों में अत्यधिक केंद्रित रहा जबकि पूर्वी भारत, पूर्वोत्तर और हिमालयी क्षेत्रों के बड़े हिस्से अब भी कम सेवा वाले बने हुए हैं। अध्ययन ने यह भी पाया कि जिन जिलों में पहले से पीएसएल की पहुंच सबसे कम है वहां अतिरिक्त ऋण का आर्थिक प्रभाव सबसे कमजोर रहा। दूसरे शब्दों में पिछड़े क्षेत्रों में केवल अधिक ऋण पहुंचाना अपने आप विकास उत्पन्न नहीं करता है जब तक कि वहां अधोसंरचना, संचार और प्रशासनिक क्षमता मजबूत न हो।

अध्ययन के निष्कर्षों ने पीएसएल की आपूर्ति में महत्त्वपूर्ण संस्थागत अंतर भी उजागर किए। लघु वित्त बैंकों ने अध्ययन अवधि के दौरान औसतन अपने समायोजित शुद्ध बैंक ऋण (एएनबीसी) का 100 फीसदी सीधे प्राथमिकता क्षेत्रों को दिया जबकि भारतीय स्टेट बैंक की पीएसएल में प्रत्यक्ष हिस्सेदारी लगभग 26.5 फीसदी रही और उसने प्राथमिकता क्षेत्र ऋण प्रमाणपत्र (पीएसएलसी) जैसे अप्रत्यक्ष साधनों पर अधिक भरोसा किया।

जो बैंक लक्ष्य से पीछे रहे उन्होंने नाबार्ड के ग्रामीण अधोसंरचना विकास कोष (आरआईडीएफ) में धन लगाया जो आवश्यक अधोसंरचना को सहारा देता है। राष्ट्रीयकृत बैंकों ने सीधे पीएसएल लक्ष्यों को पार किया जबकि निजी बैंक बाजार आधारित अनुपालन तंत्रों पर अधिक निर्भर रहे।

ये तथ्य नए नहीं हैं। वर्ष 1991 की नरसिंहम समिति से ही बैंकिंग सुधार पैनल बार-बार तर्क देते रहे हैं कि कठोर निर्देशित-ऋण आदेश ऋण आवंटन को विकृत करते हैं, लाभप्रदता को कमजोर करते हैं और बैंकों को राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों का बोझ डाल देते हैं जहां अक्सर देनदारी में चूक का जोखिम अधिक होता है।

वर्ष 2008 की रघुराम राजन समिति ने पीएसएलसी की शुरुआत के माध्यम से अधिक लचीलापन देने की सिफारिश की जिससे बैंकों को पीएसएल दायित्वों का व्यापार करने की अनुमति मिली बजाय इसके कि वे उन्हें पूरी तरह प्रत्यक्ष ऋण के माध्यम से पूरा करें। इसके पीछे एकदम सरल तर्क था। वह यह कि कुछ संस्थाएं कुछ खंडों की सेवा करने के लिए बेहतर तैयार होती हैं और समान अनुपालन को मजबूर करना समावेशन के बजाय अक्षमता पैदा कर सकता है।

यह बहस बढ़ी है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था काफी बदल गई है। कृषि को अब भी 18 फीसदी पीएसएल मिलता है जबकि सकल घरेलू उत्पाद में उसका योगदान घट गया है। वास्तव में 2025-26 में पहली बार सूक्ष्म और लघु उद्यम कृषि को पीछे छोड़ते हुए पीएसएल का सबसे बड़ा घटक बन गए। इस बीच भारत की भविष्य की वृद्धि के लिए केंद्रीय क्षेत्र जैसे डिजिटल अधोसंरचना, हरित ऊर्जा, स्वास्थ्य सेवा और लॉजिस्टिक्स आदि पीएसएल ढांचे से बाहर बने हुए हैं।

यह असंगति ढांचे के समय-समय पर समायोजन की मांग करती है। ईएसी-पीएम का पेपर अधिक व्यावहारिक मध्य मार्ग की ओर संकेत करता है। यह पीएसएलसी जैसे बाजार-आधारित साधनों को मजबूत करने, बैंकों को तुलनात्मक ताकतों के अनुसार विशेषज्ञता देने, जिला-स्तरीय लक्ष्यीकरण में सुधार करने और ऋण विस्तार को अधोसंरचना व संस्थागत क्षमता में निवेश के साथ संयोजित करने की सिफारिश करता है। स्पष्ट है कि पीएसएल ढांचे की समीक्षा की जानी चाहिए।

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First Published - June 10, 2026 | 11:57 PM IST

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