आंध्र प्रदेश राज्य के परिवारों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने के वास्ते जनसंख्या प्रबंधन नीति की घोषणा करने वाला पहला राज्य बन गया है। उसने दशकों पुराने ‘हम दो, हमारे दो’ परिवार नियोजन अभियान को उलटने की योजना बनाई है। उस अभियान ने 2000 तक देश की कुल प्रजनन दर को लगभग 3.3 से घटाकर 2 तक लाने में मदद की थी। आंध्र की नई नीति के तहत दूसरे या तीसरे बच्चे को जन्म देने वाले दंपतियों को 25,000 रुपये का प्रोत्साहन दिया जाएगा और इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) उपचार पर सब्सिडी दी जाएगी। यह प्रोत्साहन राशि राज्य की कुल प्रजनन दर के गिरकर 1.5 तक हो जाने की चिंताओं के कारण दी जा रही है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से काफी कम है।
राज्य की आशंका यह है कि संभावित परिसीमन प्रक्रिया से पहले जनसंख्या वृद्धि की धीमी गति, संसद में राज्य के प्रतिनिधित्व को कम कर सकती है और प्रत्येक राज्य की जनसंख्या से जुड़ी वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर आवंटन को भी प्रभावित कर सकती है। ये चिंताएं निराधार नहीं हैं और प्रगतिशील दक्षिणी राज्यों ने भी इसी तरह की आशंकाएं व्यक्त की हैं। लेकिन वास्तव में आंध्र प्रदेश का दृष्टिकोण अनुचित है।
एक तो, यह संकीर्ण जातीय पूर्वग्रह को दर्शाता है जो भारत जैसे एकीकृत देश के अनुरूप नहीं है। यह धारणा नीति के कार्यान्वयन को समस्याग्रस्त बना देगी। यदि पहचान भौगोलिक सीमाओं से परिभाषित होती है, तो आंध्र प्रदेश में भारत के अन्य भागों से आए प्रवासियों की बड़ी संख्या है। क्या दशकों से राज्य में रह रहे पंजाबी या बंगाली इस सब्सिडी के पात्र होंगे?
नीति का उद्देश्य निस्संदेह तेलुगु आबादी को बढ़ावा देना है, हालांकि यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है। दूसरी ओर बड़ी संख्या में तेलुगु भाषी अन्य राज्यों में भी निवास करते हैं, जिनमें तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु और महाराष्ट्र प्रमुख हैं। क्या यह नीति उनकी चिंताओं का समाधान करेगी? मूल निवासी पर जोर देने की नीति का दृष्टिकोण अमेरिका और यूरोप में तेजी से अपनाई जा रही प्रथाओं की एक निराशाजनक नकल है, जो समान प्रजनन दर वाले राज्यों के लिए एक खराब उदाहरण प्रस्तुत करता है।
यह इस तथ्य को नजरअंदाज करता है कि भारत का हिस्सा होने के नाते राज्य देश के किसी भी हिस्से से प्रतिभा और कौशल जुटा सकता है। प्रवासन आर्थिक विकास की रीढ़ रहा है। देश के सबसे गतिशील शहरों-अतीत में कोलकाता, आज मुंबई, बेंगलूरु, गुरुग्राम या हैदराबाद-का सबसे अधिक महानगरीय स्वरूप है। इनका निर्माण नौकरीपेशा और श्रमिक वर्ग के प्रवासियों की कड़ी मेहनत पर हुआ है।
इस नीति से प्रतिकूल परिणाम उत्पन्न होने का भी खतरा है। पहला खतरा मानव पूंजी की गुणवत्ता से संबंधित है। चूंकि भारत और आंध्र प्रदेश में घटती प्रजनन दर बेहतर शिक्षा और आय का परिणाम है, इसलिए सब्सिडी का अधिकांश हिस्सा उन गरीब परिवारों को मिल सकता है जिनके पास बड़े परिवारों का भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। राज्य ने इस समस्या को ध्यान में रखते हुए उदार प्रोत्साहन दिए हैं, जैसे कि तीसरे बच्चे के लिए पांच वर्ष की आयु तक 1,000 रुपये प्रति माह पोषण सहायता और दूसरे और तीसरे बच्चे के लिए 18 वर्ष की आयु तक सरकारी संस्थानों में मुफ्त शिक्षा। लेकिन ये किसी भी तरह से बच्चे के पालन-पोषण की पूरी लागत की भरपाई नहीं करते हैं। अब तक, समान प्रोत्साहन देने वाले किसी भी देश ने घटती प्रजनन दर को पलटने में सफलता प्राप्त नहीं की है।
दूसरा नकारात्मक परिणाम महिलाओं के अधिकारों से संबंधित है। घटती प्रजनन दर आमतौर पर महिलाओं की शिक्षा में सुधार और कुछ हद तक समाज में उनकी बढ़ती सक्रियता को दर्शाती है। छोटे परिवार महिलाओं पर बच्चों की देखभाल का बोझ कम करते हैं और उन्हें शिक्षा या व्यावसायिक करियर में अवसर तलाशने में सक्षम बनाते हैं। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है।
भारत जैसे पितृसत्तात्मक देश में अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन देने से महिलाओं की स्वतंत्रता सीमित हो सकती है और दशकों की कड़ी मेहनत से हासिल की गई सामाजिक प्रगति उलट सकती है।