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संसदीय समितियों में हितों का टकराव

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 9:36 PM IST

देश की संसदीय राजनीति में किसी भी पेशे या व्यवसाय से जुड़ा व्यक्ति चुनाव में जनता का समर्थन प्राप्त कर संसद पहुंच सकता है। उद्योगपति एवं कारोबारी भी चुनाव के रास्ते संसद में पहुंच कर देश की राजनीति पर असर डालते हैं। देश में कई ऐसे उद्योगपति हैं जो संसद सदस्य होने के साथ ही विभिन्न संसदीय समितियों में बतौर सदस्य शामिल हैं। ऐसे सदस्य संसद के दोनों सदनों-लोकसभा एवं राज्यसभा-में मौजूद हैं। जन प्रतिनिधि होने के साथ ही वे उद्योगपति भी हैं। इनमें कुछ उद्योगपति ऐसे भी हैं जिनकी कंपनियों के खिलाफ रकम के दुरुपयोग एवं परिचालन में अनियमितताओं के आरोप लग चुके हैं। अगर उद्योगपति चुनाव लड़ते हैं और लोगों के प्रतिनिधि के रूप में संसद पहुंचते हैं तो इसमें कुछ अनुचित नहीं है मगर क्या वे संसदीय समितियों के सदस्य बन सकते हैं? अगर वे इन समितियों के सदस्य बनाए जाते हैं तो क्या इससे हितों के टकराव की स्थिति पैदा नहीं होती है?
उद्योगपतियों के लिए पूंजी एक कच्चे माल की तरह होती है जिसके बिना उनका उद्योग नहीं चल सकता है। यह पूंजी उन्हें बैंकिंग तंत्र से हासिल होती है। मैं यह बिल्कुल कहने की कोशिश नहीं कर रहा हूं कि अपनी परियोजनाओं की राह में पूंजी की समस्या दूर करने के लिए उद्योगपति सांसद बैंकों या केंद्रीय बैंक पर किसी तरह का प्रभाव डालते हैं। मगर इस बात की पूरी आशंका है कि ये लोग ऋण आवंटन से जुड़े कर्जदाता संस्थानों के निर्णय प्रभावित कर सकते हैं या भुगतान में चूक कर चुकीं अपनी कंपनियों के खिलाफ ऋण वसूली की प्रक्रिया धीमी कर सकते हैं।
किसी भी क्षेत्र या खंड में किसी भी पक्ष या इकाई को अनुचित प्रभाव डालने या बेजा लाभ लेने से रोकने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। अवसर की समानता सुनिश्चित करने और हितों का टकराव रोकने के लिए विशेष रूप से कुछ शर्तें तय की गई हैं। मगर दुर्भाग्य की बात है कि संसदीय समितियां एक ऐसा विषय है जहां एक के बाद एक सरकारों ने कोई ध्यान नहीं दिया है। जो सांसद मंत्री नहीं बन सकते हैं उन्हें खुश करने के लिए अमूमन संसदीय समितियों में शामिल किया जाता है। इन समितियों के सदस्य मुंबई, दिल्ली और अन्य महानगरों के अलावा अक्सर हेल्थ रिजॉर्ट और सुंदर जगहों में मिलते हैं। ऐसा नहीं है कि वे इन जगहों पर छुट्टियां मनाने या सैर-सपाटे के लिए जाते हैं। संसदीय समितियों के सदस्य वहां ज्वलंत मुद्दों पर बहस करते हैं। लोकसभा की वेबसाइट पर नजर डालें तो पता चलता है कि किस तरह ये समितियां अपने कार्यों के प्रति गंभीर होती हैं। इन समितियों के अध्ययनों पर लोकसभा में विवेचना और बहस होती है। चर्चा के बाद निकले नतीजे देश के लिए विभिन्न रूपों में उपयोगी साबित होते हैं। यह एक सामान्य परंपरा रही है। मगर इन समितियों में शामिल कुछ सदस्य अपने ओहदे का लाभ उठा ले जाते हैं। हाल में एक ऐसी ही बैठक में एक बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के प्रमुख को अपमानित किया गया। वजह इतनी सी थी कि उन्होंने एक उद्योगपति सदस्य के अनुकूल निर्देश मानने से इनकार कर दिया था। केवल भारत में ही संसदीय समितियां बैंकों से पूछताछ नहीं करती हैं। ब्रिटेन में भी संसदीय समितियां बैंकों से जवाब तलब करती रहती हैं। अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के प्रतिनिधि भी अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन सीनेट की समितियों के समक्ष पेश होते रहते हैं। ब्रिटेन में ट्रेजरी कमिटी ताजा वित्तीय स्थायित्व रिपोर्ट पर अब बैंक ऑफ इंगलैंड के प्रतिनिधियों से सवाल पूछ रही है। इनमें बैंक ऑफ इंगलैंड के गवर्नर एंड्र्यू बेली भी शामिल हैं। बैंक ऑफ इंगलैंड की वित्तीय नीति समिति के सदस्यों से वित्तीय स्थायित्व पर महंगाई और ब्याज दर में बढ़ोतरी के असर, 2021 में ब्रिटेन के बड़े बैंकों की प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटने की क्षमता और वित्तीय प्रणाली के लिए आभासी मुद्राओं (क्रिप्टोकरेंसी) के रूप में पैदा हो रहे जोखिमों पर सवाल पूछे जा रहे हैं।
इस महीने के शुरू में मैसाच्युसेट्स से डेमोक्रेटिक पार्टी की सीनेट इलिजाबेथ वारेन ने फेडरल रिजर्व से एक के एक बाद वित्तीय कदमों के बारे में और जानकारियां देने के लिए कहा था। ये कदम 2020 में कई शीर्ष अधिकारियों ने उठाए थे। उस समय अमेरिकी केंद्रीय बैंक बाजार को सक्रिय रूप से मदद दे रहा था।
लोकसभा में विभागों से संबंधित 24 स्थायी समितियां हैं। इनमें प्रत्येक समिति में 31 सदस्य हैं जिनमें 21 लोकसभा से और 10 राज्यसभा के हैं। इन सदस्यों को क्रमश: लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के चेयरमैन नियुक्त करते हैं। हमें ऐसी समितियों की जरूरत क्यो हैं? इन संसदीय समितियों की जरूरत इसलिए है कि संसद का काम काफी अधिक और पेचीदा ही नहीं बल्कि इनका दायरा बड़ा है और इन्हें निपटाने के लिए समय भी अधिक नहीं मिलता है। इस वजह से संसदीय कार्यवाही का एक बड़ा हिस्सा संसदीय समितियों में निपटाया जाता है।
संसदीय समितियां दो प्रकार की होती हैं। इनमें स्थायी समितियां स्थायी एवं नियमित होती हैं। इन समितियों का गठन समय-समय पर संसद के प्रावधानों के तहत होता है। ये समितियां लगातार काम करती रहती हैं। वित्तीय समितियां, विभागों से संबंधित स्थायी समितियां और अन्य समितियां स्थायी समिति की श्रेणी में आती हैं। अस्थायी समितियों का गठन एक खास उद्देश्य के लिए होता है। अपना काम पूरा करने और संबंधित रिपोर्ट सौंपने के बाद ये समितियां भंग हो जाती हैं।
लोकतांत्रिक प्रणाली में संस्थान संसद के प्रति उत्तरदायी होते हैं। यह प्रणाली बेहतर ढंग से कार्य करें इसके लिए सांसदों को शिक्षित करने की जिम्मेदारी काफी हद तक सरकर की है। मगर क्या उद्योगपति सांसदों को ऐसी समितियों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए?
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठ सलाहकार हैं।)

First Published : January 28, 2022 | 11:15 PM IST