कर कानूनों में एक बदलाव की वजह से पुनर्खरीद एक चलन बन चुका है। लाभांश वितरण कर का भुगतान पहले कंपनी को करना होता था लेकिन अब इसे हटा दिया गया है। अब सभी कंपनियों को पुनर्खरीद से हुई ‘वितरित आय’ पर एक कर देना होता है जबकि पहले केवल सूचीबद्ध कंपनियों को ही ‘पुनर्खरीद कर’ देना होता था। वर्ष 2020-21 से शेयरधारक को भी मिले लाभांश पर आयकर देना है। दूसरी तरफ शेयरधारक की अब संबंधित मुनाफे पर पूंजीगत लाभ कर के भुगतान की देनदारी नहीं रह गई है। इन बदलावों का नतीजा यह हुआ है कि कंपनी प्रवर्तकों के लिए पुनर्खरीद का विकल्प लाभांश देने की तुलना में खुद को एवं दूसरे बड़े शेयरधारकों को पुरस्कृत करने का अधिक आकर्षक तरीका बनकर उभरा है। इसका प्रभाव पहले से ही दिख रहा है। इस वित्त वर्ष में अभी तक 28,000 करोड़ रुपये से अधिक शेयर पुनर्खरीद की घोषणाएं हो चुकी हैं जिनमें टीसीएस एवं विप्रो भी शामिल हैं। यह आंकड़ा वर्ष 2019-20 के पूरे साल के आंकड़े से 42 फीसदी अधिक हो चुका है जबकि इस वित्त वर्ष में अभी करीब छह महीने बाकी हैं।
लेकिन किसी भी कंपनी के लिए कर सक्षमता बनाम लाभांश भुगतान का मसला पुनर्खरीद की पेशकश लाने का महज एक कारण है। जब भी कोई कंपनी पुनर्खरीद लाती है तो उसके कहीं गहरे निहितार्थ होते हैं। सबसे सरल रूप में भी इसका मतलब होता है कि वह कंपनी शेयरधारकों को नकद देने के लिए अपनी आरक्षित निधि कम कर रही है। आरक्षित निधि का आशय एकत्रित लाभ से है। कंपनी के पास यह रकम सबसे सस्ती नकदी होती है। अगर कोई कंपनी पुनर्खरीद की पेशकश कर रही है तो वह कारोबार बढ़ाने या कर्ज के निपटान में इस सस्ते फंड का निवेश करने के बजाय पुनर्खरीद को वरीयता दे रही है। इस तरह पुनर्खरीद का मतलब है कि कंपनी को अपनी सस्ती नकदी पर रिटर्न मिलने की उम्मीद नहीं है। यह दर्शाता है कि कंपनी अपनी वृद्धि संभावनाओं को लेकर आशावादी नहीं है।
वृद्धि की संभावना होने पर पुनर्खरीद का कोई रणनीतिक महत्त्व नहीं रह जाता है। ऐसी स्थिति में लाभांश का भुगतान भी शानदार रणनीति नहीं होती है। एक कंपनी वृद्धि के लिए अपना मुनाफा दोबारा लगाकर कहीं ऊंचा रिटर्न पा सकती है। इसकी झलक शेयर की कीमतों में बढ़ोतरी में भी दिखेगी। वर्ष 1997 में सूचीबद्ध एमेजॉन ने कभी भी लाभांश नहीं दिया है, माइक्रोसॉफ्ट ने सूचीबद्ध होने के करीब 22 साल बाद पहला लाभांश वर्ष 2003 में दिया था और ऐपल ने भी 1995 से लेकर 2012 के बीच कोई लाभांश नहीं दिया।
लाभांश के उलट पुनर्खरीद के माध्यम से कंपनी की बैलेंस शीट स्थायी रूप से बदल जाती है। पुनर्खरीद प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद पहले से कम शेयर ही बाकी रह जाते हैं और शेयरधारक एवं विविध शेयरधारिता पैटर्न भी कम हो जाते हैं। अगर कारोबार मुनाफे लायक बना रहता है तो अपेक्षाकृत छोटा इक्विटी आधार होने से भविष्य में प्रति शेयर आय बढ़ सकती है। इससे कंपनी के मूल्यांकन को मजबूती मिल सकती है। शेयरधारकों को पुनर्खरीद पेशकश के समय मौजूदा फायदे और भविष्य में अधिक लाभ मिलने की संभावना के बीच तुलना को भी ध्यान में रखना चाहिए।
कर नियम बदलने के बाद पुनर्खरीद प्रवर्तकों के लिए खुद को पुरस्कृत करने का प्रभावी तरीका है। लेकिन सिद्धांत रूप में कम दांव वाले प्रवर्तक लंबी अवधि में पुनर्खरीद विकल्प अपनाने को लेकर संयम खो सकते हैं। दूसरी तरफ प्रवर्तक अपने शेयरों की बिक्री के लिए पेशकश न कर अपना दांव मजबूत कर सकते हैं जबकि अल्पांश शेयरधारक अलग हो सकते हैं। निम्न वृद्धि वाली परिपक्व अर्थव्यवस्थाओं में पुनर्खरीद स्थापित कारोबारों के लिए मुफीद है। लेकिन भारत में मजबूत एवं सतत वृद्धि की जरूरत को देखते हुए कहा जा सकता है कि कर कानूनों में ऐसे बदलाव नहीं किए जाने चाहिए थे। अच्छी लाभप्रदता एवं मजबूत बैलेंस शीट वाली कंपनियां ही पुनर्खरीद की पेशकश कर सकती हैं। निवेशक को ऐसी जोखिम पूंजी बाहर निकालने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए।