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वृद्धि और राजस्व बढ़ाने पर बड़ा दांव

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 8:56 AM IST

बाजार ने वित्त वर्ष 2021-22 के लिए पेश बजट पर शानदार प्रतिक्रिया दी है। बाजार यह देखते हुए फूला नहीं समाया कि सरकार ने बजट में कर बढ़ाने की कोई घोषणा नहीं की है। बाजार को लग रहा था कि सरकार अति धनाढ्य लोगों पर कुछ अधिभार लगा सकती है। वैसे तो यह अच्छा कदम है लेकिन इसका एक नुकसान यह है कि कर नहीं बढ़ाने से कुल व्यय में भी इजाफा (एक प्रतिशत से भी कम)नहीं हुआ है। यह अलग बात है कि सरकार ने वित्त वर्ष 2022 में नॉमिनल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 14.4 प्रतिशत बढ़ोतरी का अनुमान व्यक्त किया है। दूसरे शब्दों में कहें तो कर नहीं बढ़ाने से अर्थव्यवस्था को समर्थन देने के लिए सरकार पर्याप्त व्यय नहीं कर पाएगी। वित्त मंत्री ने बजट में प्रत्यक्ष करों और जीएसटी में 22 प्रतिशत बढ़ोतरी का अनुमान जताया है और इनके साथ विनिवेश से प्राप्त 175,000 करोड़ रुपये की रकम का इस्तेमाल राजकोषीय घाटा 341,000 करोड़ रुपये कम करने में किया है। कुल मिलाकर सरकार ने वृद्धि दर और राजस्व में बढ़ोतरी को लेकर एक बड़ा दांव खेला है, लेकिन मेरे विचार से यह जोखिम लेना सही ही था। मुझे लगता है कि वित्त वर्ष 2022 में नॉमिनल जीडीपी की वृद्धि दर 14.4 प्रतिशत से संभवत: अधिक रहेगी और राजस्व की स्थिति उम्मीद से अधिक बेहतर रहेगी।  
कुल व्यय में कोई बढ़ोतरी नहीं किए जाने के बीच पूंजीगत व्यय के लिए बजट में प्रावधान 26 प्रतिशत बढ़ाकर 554,236 करोड़ रुपये किया गया है (पूंजीगत व्यय में 115,000 करोड़ रुपये इजाफा हुआ है)। पूंजीगत व्यय में यह बढ़ोतरी और ब्याज के मद में 116,801 करोड़ रुपये का प्रावधान सब्सिडी में नाटकीय कमी करने के बाद किया गया है। कोविड-19 को मात देने के लिए दिए कुछ प्रोत्साहन वापस लिए जाने के बाद वित्त वर्ष 2022 में सब्सिडी में 260,000 करोड़ रुपये तक कमी आने का अनुमान है।
करों में बढ़ोतरी करने और राजकोषीय स्थिति तेजी से मजबूत बनाने की दिशा में काम करने के बजाय वित्त मंत्री ने राजकोषीय घाटा सीमित करने की प्रक्रिया को राजस्व की स्थिति से जोड़ दिया है। अगर सरकार ने इस समय राजकोषीय घाटा नियंत्रित करने पर अधिक जोर दिया होता तो इससे बाजार सहित निवेशकों के मनोबल पर बुरा असर होता। वित्त मंत्री की यह रणनीति वाजिब है और सरकार को इससे राजकोषीय मोर्चे पर हाथ और अधिक खोलने का विकल्प मिलता है। यह अच्छी बात है कि सरकार ने एफआरबीएम अधिनियम और रेटिंग एजेंसियों की परवाह  किए बिना एक खाका तैयार किया है।
संरचनात्मक स्तर पर निश्चित तौर पर कुछ सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। सरकार ने निजीकरण की दिशा में आगे बढऩे की दिशा में अपना रुख स्पष्ट कर दिया है और इसमें अब किसी तरह की हिचकिचाहट नहीं दिख रही है। यह बात भी ईमानदारी से स्वीकार कर ली गई है कि हम राजस्व के लिए 2 करोड़ करदाताओं पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकते और हमें अधिक रकम का बंदोबस्त करने के लिए सरकारी परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी बेचनी होगी। इस संबंध में पहले भी कई घोषणाएं हुई थीं। सरकार के पास उपलब्ध जमीन बेच कर रकम जुटाने पर भी खासा जोर दिया गया है। हालांकि इसके लिए सरकार को क्रियान्वयन के मोर्चे पर काफी मुस्तैदी दिखानी होगी।
वित्तीय प्रणाली के लिए दो सार्वजनिक बैंकों एवं एक सामान्य बीमा कंपनी के निजीकरण का निर्णय काफी साहस भरा है। यह दिखाता है कि कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर मुश्किलें झेलने के बाद भी सरकार कठिन एवं चुनौतीपूर्ण समझे जाने वाले आर्थिक सुधारों से पीछे हटते नहीं दिखना चाहती है। अगर भारत को वास्तव में 7-8  प्रतिशत दर से आगे बढऩा है तो इसे ऋण आवंटन में 14-15 प्रतिशत वृद्धि को पूरा समर्थन देना होगा। सार्वजनिक बैंक कम से कम अपनी मौजूदा हालत में तो ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं। निजीकरण और सार्वजनिक बैंकों का आपस में विलय ही एक रास्ता दिख रहा है। अब लगता है कि सरकार ने यह बात पूरी तरह समझ ली है। सार्वजनिक बैंकों के फंसे कर्ज लेने के लिए परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनी की स्थापना से बैंकों का बहीखाता साफ-सुथरा हो जाएगा और उन्हें दोबारा कर्ज आवंटन शुरू करने में मदद मिलेगी।  
बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा बढ़ाकर 74 प्रतिशत करने से इस क्षेत्र को नई पूंजी प्राप्त करने और कारोबार बढ़ाने में मदद मिलेगी। बुनियादी ढांचे के लिए दीर्घ अवधि की पूंजी मुहैया कराने में बीमा क्षेत्र अहम भूमिका निभा सकता है। इस क्षेत्र को अधिक से अधिक पूंजी हासिल करने और कारोबार आगे बढ़ाने की इजाजत देना एक स्वागत योग्य कदम है। 20,000 करोड़ रुपये की शुरुआती पूंजी के साथ ढांचागत क्षेत्र पर केंद्रित नए डेवलपमेंट फाइनैंस इंस्टीट्यूशन (डीएफआई) की स्थापना और अगले तीन वर्षों में इसका बहीखाता बढ़ाकर 500,000 करोड़ रुपये करना आक्रामक लेकिन जरूरी कदम है। क्रियान्वयन पर निश्चित तौर पर सबकी नजरें होंगी।
एक ही संहिता में ज्यादातर वित्तीय बाजार नियामकों को लाने से पारदर्शिता बढ़ेगी और कानूनों में भी निरंतरता बनी रहेगी। बजट में सरकार ने रीट और इन्विट ढांचों पर अधिक जोर देने की कोशिश की है। एफपीआई को इन इकाइयों द्वारा जारी बॉन्ड खरीदने की इजाजत दी गई है और टीडीएस नियम भी सरल बनाने की पहल की गई है। कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार की मदद के लिए एक स्थायी संस्थागत ढांचा तैयार करने की कोशिश की गई है और इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि आईएलऐंडएफएस जैसी घटनाएं दोबारा नहीं हों। बिजली वितरण क्षेत्र को उबारने के लिए बजट में अतिरिक्त 300,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। यह उम्मीद की जानी चाहिए कि पूर्व में आई इसी तरह की योजना के मुकाबले यह अधिक कारगर होगा। कराधान के मोर्चे पर सरकार ने चीजें सरल बनाने की दिशा में अतिरिक्त प्रयास किए हैं। हालांकि  इस मोर्चे पर क्रियान्वयन कैसा रहेगा यह देखने वाली बात होगी।
हालांकि बाजार से 967,708 करोड़ रुपये उधारी लेने की आवश्यकता को देखते हुए बॉन्ड बाजार थोड़ा चिंतित जरूर दिख सकता है। यह एक बड़ा आंकड़ा है क्योंकि सरकार ने वित्त वर्ष 2021 में 535,000 करोड़ रुपये उधारी लेने का लक्ष्य रखा था। बॉन्ड पर प्रतिफल 16 आधार अंक तक बढ़ गया है। हालांकि इस वर्ष हम बाजार से 12,37,788 करोड़ रुपये उधार लेने में कामयाब रहे हैं, जिनमें लघु बचत का योगदान 480,000 करोड़ रुपये रहा है। आरबीआई को बॉन्ड बाजार की चिंताएं दूर करनी चाहिए। अच्छी बात यह रही कि डॉलर के मुकाबले रुपया स्थिर रहा।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि वित्त मंत्री ने अच्छा बजट पेश किया है। बाजार भी राहत महसूस कर रहा है। सरकार वृद्धि दर और परिसंपत्तियों की बिक्री पर बड़ा दांव लगा रही है। इसके साथ ही इसने आर्थिक सुधार जारी रखने की इच्छाशक्ति दिखाई है। शेयर निवेशकों को भी अधिक चिंतित नहीं होना चाहिए।

First Published : February 2, 2021 | 12:39 AM IST