भारतीय स्टेट बैंक के सेवानिवृत्त मुख्य महाप्रबंधक समीर कुमार नाथ को पिछले महीने कोलकाता पुलिस ने गिरफ्तार किया था। वह 74 साल के हैं। उन्हें बैंक ने स्पेन्टेक्स इंडस्ट्रीज लिमिटेड के निदेशक मंडल में नामित निदेशक के रूप में नियुक्त किया था और उन्होंने 17 सितंबर, 2015 से लेकर 1 दिसंबर, 2017 के बीच अपना एक कार्यकाल पूरा किया था। स्पेन्टेक्स इंडस्ट्रीज ने कर्ज का भुगतान नहीं किया है। नागपुर की इस कंपनी ने कर्मचारियों की 3.29 करोड़ रुपये से कुछ अधिक भविष्य निधि (पीएफ) राशि हस्तांतरित नहीं की थी। मुझे नहीं पता कि नाथ या एसबीआई ने कर्ज की वसूली करने वाले अधिकारी द्वारा दिए गए नोटिस का जवाब क्यों नहीं दिया। शायद उन्होंने बैंक का ध्यान इस ओर नहीं दिलाया। जून में कर्ज वसूली अधिकारी ने कोलकाता पुलिस को नाथ को गिरफ्तार करने और उन्हें जल्द से जल्द नागपुर लाने के लिए लिखा जब तक कि चूककर्ता क्षेत्रीय पीएफ आयुक्त, नागपुर को राशि का भुगतान न कर दे। कपड़ा कंपनी स्पेन्टेक्स इंडस्ट्रीज के कर्ज निपटान का मामला राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के पास लंबित है, जिसने इसके अंतरिम समाधान के विशेषज्ञ पेशेवर की नियुक्ति की है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन, नागपुर ने इनके सामने अपना दावा दर्ज किया था। नाथ को कोलकाता में कुछ दिन पुलिस हिरासत में बिताने पड़े। वह 22 अगस्त को रिहा हुए। उनकी रिहाई तब हुई जब नागपुर के क्षेत्रीय पीएफ आयुक्त -2, (अनुपालन और वसूली) शशांक रायजादा ने एसबीआई के सक्रिय होने के बाद गिरफ्तारी वारंट पर आगे नहीं बढ़ने का फैसला किया। सवाल यह है कि क्या नाथ की गिरफ्तारी उचित थी?
नामित निदेशक के रूप में नाथ को कंपनी के निदेशक मंडल की बैठकों में हिस्सा लेने की वजह से एसबीआई के हितों की रक्षा करनी थी जो उन बैंकों के कंसोर्टियम का प्रमुख बैंक जिसने स्पेन्टेक्स को कर्ज दिया था। हालांकि उनकी कोई कार्यकारी भूमिका नहीं थी और वह कंपनी के रोजमर्रा के कामों में भी शामिल नहीं थे। मामूली फीस को छोड़कर उन्हें इस काम के लिए बैंक से कोई पारिश्रमिक नहीं मिला। अब एक ओर नाथ की गिरफ्तारी से कर्ज चूक करने वाली कंपनियों के नामित निदेशकों के बीच एक डर पैदा होगा जिनके ऋणों की निपटान प्रक्रिया जारी है, वहीं दूसरी तरफ विदर्भ इंडस्ट्रीज पावर बनाम ऐक्सिस बैंक के मामले में 12 जुलाई, 2022 को उच्चतम न्यायालय के एक फैसले में फंसे कर्ज के समाधान की प्रक्रिया में एनसीएलटी की भूमिका पर सवाल खड़े हुए हैं। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की धारा 7(5) के तहत बैंक द्वारा कॉरपोरेट ऋणशोधन समाधान प्रक्रिया शुरू करने से जुड़े आवेदन को स्वीकार करने का एनसीएलटी का अधिकार ‘विवेकाधीन’ है और यह ‘अनिवार्य’ नहीं है। भले ही ऋणशोधन समाधान का आवेदन पूरा हो लेकिन एनसीएलटी इस तरह के आवेदन स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है बल्कि यह समाधान की प्रक्रिया स्थगित कर सकता है।फंसे कर्ज की तेजी से वसूली के लिए आईबीसी 1 दिसंबर, 2016 से लागू हुआ। इत्तफाक से पुणे की इस्पात उत्पाद निर्माता कंपनी इनोवेटिव इंडस्ट्रीज बनाम आईसीआईसीआई बैंक के मामले में उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की थी जो अगस्त 2017 में आईबीसी के तहत दायर पहला मामला था। अदालत ने कहा कि जिस समय निर्णायक प्राधिकरण संतुष्ट हो जाता है कि भुगतान में चूक हुई है तब आवेदन स्वीकार किया जाना चाहिए।
इसका मतलब है कि एक बार जब एनसीएलटी ऋण और चूक के बारे में आश्वस्त हो जाए तब कर्ज लेने वाली कंपनी के खिलाफ कॉर्पोरेट ऋणशोधन समाधान की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। एनसीएलटी के पास चूककर्ता के खिलाफ किसी बैंक की याचिका खारिज करने का कोई विवेकाधिकार नहीं है। ताजा फैसले से फंसे कर्ज की वसूली की प्रक्रिया को एक नया मोड़ मिला जो अब तक धीमी ही रही है। इसमें कहा गया है कि एनसीएलटी ऋण निपटान के मामले को स्वीकार करते समय अपनी समझ से फैसले ले सकता है क्योंकि वित्तीय संस्थान या बैंक जो कंपनी को कर्ज आदि देने के लिए जुड़े हैं (फाइनैंशियल क्रेडिटर्स) उनके लिए प्रावधान की धारा 9 (5) में ‘होगा’ शब्द के बजाय ‘हो सकता है’ का इस्तेमाल किया गया है, जो परिचालन देनदारों (ऑपरेशनल क्रेडिटर्स) के मामले में अनिवार्य हो जाता है। यह वित्तीय देनदारों जैसे बैंकों और गैर-बैंकों तथा परिचालन देनदारों (फाइनैंशियल क्रेडिटर्स) या उन संस्थाओं के बीच अंतर करता है जिन पर ऋण बकाया है या कारोबारी लेनदेन की राशि बकाया है।
यह आदेश बिजली उत्पादन कंपनी विदर्भ इंडस्ट्रीज द्वारा दायर एक विशेष अनुमति याचिका पर दिया गया था जिसने ऐक्सिस बैंक के नेतृत्व में छह बैंकों के कंसोर्टियम से लिए गए ऋण का पुनर्भुगतान नहीं किया था। जनवरी 2020 में ऐक्सिस बैंक ने एनएलसीटी में आईबीसी की धारा 7 के तहत कॉर्पोरेट ऋणशोधन क्षमता एवं समाधान के लिए पहल की थी क्योंकि इसका 533 करोड़ रुपये का निवेश फंस गया था। कंपनी ने इस पर रोक लगाने की मांग की थी क्योंकि महाराष्ट्र विद्युत नियामक आयोग (एमईआरसी), बिजली अपील न्यायाधिकरण (एपीटीईएल) और उच्चतम न्यायालय के सामने विभिन्न कार्यवाही लंबित थी। कार्यवाही में वित्त वर्ष 2015 से कोयले की कीमत बढ़ने से शुल्क में संशोधन के कारण विदर्भ इंडस्ट्रीज पर 1,730 करोड़ रुपये के बकाये के चलते उच्चतम न्यायालय के सामने एपीटीईएल के आदेश के खिलाफ एमईआरसी द्वारा दायर अपील शामिल है। तर्क यह था कि बिजली की कीमत से संबंधित विवाद को एमईआरसी द्वारा सुलझाया जाना था जिसके चलते भुगतान चूक बढ़ी और कंपनी ने पर्याप्त राशि मिलने की उम्मीद की थी ताकि यह कर्ज चुका सके। एनसीएलटी के मुंबई पीठ और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) द्वारा स्थगन की अर्जी खारिज किए जाने के बाद कंपनी ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वित्तीय ऋण के मामले में भले ही एनसीएलटी कर्ज और चूक के बारे में आश्वस्त हो लेकिन उसके पास अन्य कारणों से भी याचिका को अस्वीकार करने का विवेकाधिकार है। आईबीसी की धारा 7 में ‘होगा’ के बजाय ‘हो सकता है’ शब्द का इस्तेमाल किया गया और कर्ज संकट तथा संसाधनों की कमी से जूझ रही कंपनियों को अपने ऋणों के पुनर्भुगतान में अस्थायी चूक के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए। एनसीएलटी द्वारा समाधान योजनाओं की मंजूरी के बाद आईबीसी के तहत मामलों को सुलझाने में लगने वाला औसत समय बढ़ रहा है। 31 मार्च, 2021 तक 354 मामलों के लिए यह समय 406 दिन का था जो 31 मार्च, 2022 तक 494 मामलों में बढ़कर 449 दिन हो गया था। अप्रैल और जून 2022 के बीच 23 मामलों के लिए लिया गया औसत समय बढ़कर 709 दिन हो गया है। इस प्रक्रिया में मुकदमेबाजी के समय को छोड़कर समाधान के समय का आकलन किया जाता है। 30 जून, 2022 तक बंद हुए कुल 3,637 मामलों में से 1,703 या 46.6 प्रतिशत मामलों को बिक्री के माध्यम से बंद कर दिया गया है। इससे वित्तीय लेनदारों द्वारा उनके दावों के संबंध में मूल्य की प्राप्ति कम हुई है क्योंकि बिक्री मूल्य में लगातार कमी आ रही है। जून 2022 तक, लगभग 500 समाधान योजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिससे लेनदारों के दावों में 7.67 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले लगभग 31 प्रतिशत या 2.35 लाख करोड़ रुपये की वसूली हुई है। दिसंबर 2016 से कानून लागू होने के बाद से हर तिमाही में वसूली की दर में लगातार गिरावट आ रही है। सितंबर 2021 के अंत में यह 35.89 प्रतिशत और दिसंबर 2021 में 33.10 प्रतिशत था। आगे की देरी से इस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। एक बार जब किसी मामले को एनसीएलटी के विवेक पर छोड़ा जाता है तब और अधिक देरी होगी, परिसंपत्तियों का मूल्य कम हो जाएगा, और उधार देने वालों के लिए वसूली और अधिक कठिन हो जाएगी जिससे फंसे कर्ज की समाधान प्रक्रिया को झटका लगेगा।