अगर हम 1 जनवरी 2025 से फरवरी 2026 तक के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो कुछ दिलचस्प रुझान देखने को मिलते हैं। यह अवधि ऐसी थी जिसमें दुनिया में काफी अस्थिरता दिखी थी। यह अवधि ईरान युद्ध से पहले की है इसलिए हाल के घटनाक्रम से प्रभावित नहीं है। अलग-अलग बाजार रिटर्न के मापदंड के रूप में एक्सचेंज-ट्रेडेड फंडों को देखें तो पता चलता है कि यह वित्तीय रिटर्न का एक मजबूत दौर रहा है। इस दौरान उभरते बाजारों (ईएम) के शेयर 51.4 फीसदी, अंतरराष्ट्रीय शेयर 47 फीसदी और अमेरिकी शेयर 18.4 फीसदी बढ़े और कुल वैश्विक शेयर रिटर्न 28.3फीसदी दर्ज किया गया।
इसके उलट इसी 14 महीनों की अवधि में भारतीय शेयर 0.7 फीसदी फिसल गए और यह दुनिया का दूसरा सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला बाजार है। केवल सऊदी अरब का प्रदर्शन इससे बदतर रहा। वास्तव में भारत और सऊदी अरब ही ऐसे दो बाजार हैं जिनमें वास्तव में गिरावट आई है (सभी रिटर्न अमेरिकी डॉलर में हैं)। इस दौरान कोरिया के बाजार में तीन गुना बढ़त हुई है जबकि ब्राजील में 80 फीसदी और ताइवान में 50 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है।
हमने मात्र 14 महीनों में उभरते बाजारों के मानक (बेंचमार्क) से 5,000 आधार अंक कम प्रदर्शन किया है। भारत में अधिक निवेश करना करियर खत्म करने वाला कदम साबित हुआ है! इस लिहाज से यह समझा जा सकता है कि लगभग हर विदेशी फंड वर्तमान में भारत में कम निवेश क्यों कर रहा है। भारतीय बाजार में विदेशी स्वामित्व 15 वर्षों के निचले स्तर पर है और हम विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) को रोज ही बिकवाली करते देख रहे हैं। भारत को पिछले पांच वर्षों में शून्य शुद्ध विदेशी निवेश प्राप्त हुआ है जो वास्तव में बहुत लंबा समय है। भारत के इस असाधारण कमजोर प्रदर्शन से क्या सबक मिलते हैं?
सबसे पहले मेरे विचार से नीति निर्माताओं में आत्म संतुष्टि का भाव था। हमारे बाजारों ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया था और कई अन्य बड़े उभरते बाजारों को निवेश के योग्य नहीं माना जाता था। हमारी सोच यह थी कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं इसलिए एफपीआई दूसरे बाजार नहीं जाएंगे? यह भ्रम टूट चुका है। एफपीआई हमें पूरी तरह से नजरअंदाज कर सकते हैं। पांच साल तक शुद्ध निवेश प्रवाह शून्य रहा। पूंजी लगाने के विकल्प हमेशा मौजूद होते हैं और यह (पूंजी) केवल संभावित लाभ की तलाश में रहती है। अगर हम अच्छा जोखिम-लाभ अनुपात नहीं देंगे तो कोई नहीं आएगा।
उपरोक्त संदर्भ में क्या विदेशी निवेशकों पर पूंजीगत लाभ कर लगाने वाला दुनिया का एकमात्र बड़ा बाजार बनकर हमें संभावित रिटर्न और कम करने की वास्तव में जरूरत है? क्या अतिरिक्त कर राजस्व पूंजी प्रवाह में होने वाले कुल नुकसान के हिसाब से उचित है?
बदलते हालात के बीच भारत की साख भी कमजोर हो रही है। मूल्यांकन गुणक सिकुड़ रहे हैं। गुणक वृद्धि दर और वृद्धि की अवधि में निवेशकों के विश्वास को परिलक्षित करते हैं। कम होते गुणक दोनों में ही भरोसा कम होने का संकेत देते हैं। हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जिसे मैं वृद्धि का कठिन दौर मानता हूं। हम वृद्धि गुणक से मूल्य या बुनियादी मजबूती पर ध्यान देने की तरफ बढ़ रहे हैं। निवेशक भी अधिक रिटर्न देने पर केंद्रित निवेश योजनाओं से हटकर बुनियादी रूप से मजबूत शेयरों पर दांव खेलने लगेंगे। यह बदलाव का दौर दयनीय है क्योंकि अधिक रिटर्न की चाह रखने वाले वृद्धि पर जोर देने वाले निवेशक लगातार बिकवाली करने लगते हैं और बाद में मूल्यांकन सस्ता होने पर बुनियादी मजबूती को अधिक तवज्जो देने वाले निवेशक आकर्षित होते हैं।
भारत ने इस यात्रा की शुरुआत दुनिया के सबसे महंगे बाजार के रूप में की थी इसलिए हमें सस्ता दिखने से पहले अभी लंबा रास्ता तय करना है। मूल्य गुणक तक का सफर पूरा होने तक बाजार का प्रदर्शन खराब बना रहेगा। इसमें वर्षों लग सकते हैं। बाजार के सस्ता होने का इंतजार करने के बजाय इस जाल से निकलने का बेहतर तरीका है कि अपनी साख को पुनः प्राप्त करना और इस प्रकार वृद्धि गुणक को बढ़ाना। भारत के प्रति आकर्षण कम हो गया है क्योंकि हमारी वृद्धि दर धीमी हो गई है, आय स्थिर हो गई है और यह धारणा मजबूत हो गई है कि हम नवाचार या उत्पादन नहीं कर सकते। हमारी वृद्धि दर एक अंक में आने के साथ कोरिया जैसे बाजारों में आय में 100 फीसदी की वृद्धि देखी गई।
हमें सभी नई तकनीकों में पिछड़ा हुआ माना जाता है चाहे वह इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी), नवीकरणीय ऊर्जा, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) या स्वचालन हो। एआई को हमारी सबसे बड़ी मजबूती यानी सस्ते में उपलब्ध उच्च-गुणवत्ता वाले दफ्तरों में काम करने वाली प्रतिभाओं को कमजोर करने वाला माना जाता है। कई लोगों का मानना है कि भारत मध्यम-आय के जाल में फंस जाएगा।
हमें गति बढ़ाने और यह विश्वास दिलाने की जरूरत है कि हमारी वृद्धि दर टिकाऊ है। एआई और व्यापार बाधाओं की दुनिया में हम 7-8 फीसदी सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि कैसे हासिल कर सकते हैं? क्या हम अपनी उत्पादकता और प्रतिस्पर्द्धात्मकता में मौलिक रूप से सुधार करने के लिए पर्याप्त प्रयास कर रहे हैं? हमें भारत में नई तकनीकों पर किए जा रहे कार्यों और हम कैसे प्रतिस्पर्द्धा कर सकते हैं इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। यह सच नहीं है कि हम नवाचार नहीं कर सकते। हमें यह धारणा बदलने की जरूरत है।
एआई कारोबार का दायरा सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर और विद्युतीकरण से आगे निकलने के साथ वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों और नई तकनीक के प्रसार के लिए आवश्यक सेवाओं की ओर बढ़ रहा है। इससे भारत को भी लाभ होना चाहिए। जैसे-जैसे बाजार एआई निवेश पर रिटर्न पर ध्यान केंद्रित करेगा हमारी ताकत और अधिक स्पष्ट हो जाएगी।
भारत में विभिन्न उद्योगों में कई दीर्घकालिक चक्रवृद्धि लाभ उत्पन्न करने की क्षमता है। इस पर फिर से ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। हमारी वृद्धि स्थिर और पूर्वानुमानित है। एआई व्यापार ने उभरते बाजारों में विकास को गति दी है मगर यह प्रारंभिक और चक्रीय है। शेयरधारक मूल्य आर्थिक विकास, उद्यमशीलता की ऊर्जा और अनुशासित पूंजी आवंटन के माध्यम से तय होता है। भारत एक ऐसा दुर्लभ बाजार है जिसमें ये तीनों गुण मौजूद हैं।
एक और स्पष्ट निष्कर्ष यह है कि हमारे बाजार घरेलू प्रवाह पर निर्भर हैं। इन्होंने ही हमें बचाए रखा है। निवेशकों ने लगभग दो वर्षों से कोई लाभ नहीं कमाया है। हमें उम्मीद करनी होगी कि वे धैर्य बनाए रखेंगे और प्रवाह अपनी गति बनाए रखेंगे। कोई भी नीतिगत परिवर्तन नहीं होना चाहिए जिससे ये प्रवाह जोखिम में पड़ें।
विदेशी निवेश नहीं होने, घरेलू निवेश में ठहराव आने और कोई लाभ न मिलने के बावजूद प्रारंभिक सार्वजनिक पेशकश (आईपीओ) बाजार बेहद मजबूत रहा है। पिछले दो वर्षों में आईपीओ के जरिए लगभग 43 अरब डॉलर जुटाए गए हैं साथ ही थोक सौदों और नियोजन के जरिए अतिरिक्त 100 अरब डॉलर जुटाए गए हैं। इन जारी किए गए शेयरों और प्लेसमेंट ने सभी नए निवेश खींच लिए हैं जिससे द्वितीयक बाजारों में दिलचस्पी स्पष्ट रूप से और कम हो गई है। बाजार से मजबूत लाभ प्राप्त करने के लिए आईपीओ और प्लेसमेंट का प्रवाह धीमा करना होगा।
मेरा मानना है कि निवेशक इन नए निर्गमों को लेकर पहले से ही सतर्क और चुनिंदा हो रहे हैं। कई निर्गमों के प्रस्ताव भी हैं मगर उनमें कई बाजार में नहीं आ पाएंगे और कम से कम उस कीमत पर तो नहीं जिसकी उम्मीद कंपनियां या बैंकर कर रहे हैं। कंपनियों को मूल्यांकन के मामले में अधिक लचीला और यथार्थवादी होना होगा नहीं तो वे नए निर्गम जारी नहीं पाएंगे।
भारत इस समय थोड़ी मुश्किल में है। खराब प्रदर्शन और कम स्वामित्व काफी निचले स्तर पर पहुंच चुके हैं। इसमें से कुछ आर्थिक हालात पर निर्भर हैं और अपने आप ठीक हो जाएंगे। हालांकि, हमें अपनी वृद्धि से जुड़ी साख दोबारा हासिल करना होगी। इसके लिए सरकार और कंपनियों के साथ ही निवेशकों की भी भूमिका है। हम कभी-कभी स्वयं ही अपने सबसे बड़े आलोचक होते हैं।
मुझे लगता है कि हमारी नवाचार की कमी और प्रतिस्पर्द्धा करने में असमर्थता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है और यह धारणा कुछ हद तक निवेशकों द्वारा ही फैलाई गई है। मेरा मानना है कि हम अपनी वृद्धि की रफ्तार फिर हासिल कर लेंगे और भारत को मूल्य वृद्धि तक सीमित नहीं किया जाएगा। अगर मेरा अनुमान दुरुस्त है तो आने वाले महीने निवेश के लिए अच्छे साबित होंगे। अगर मैं गलत होता हूं तो हमें आगे और भी कमजोर प्रदर्शन का सामना करना पड़ेगा।
(लेखक अमांसा कैपिटल से जुड़े हैं)