भारत में अक्सर लोग सोचते हैं कि एक बार वसीयत (Will) लिख दी, तो संपत्ति के बंटवारे की सारी टेंशन खत्म। लेकिन कानूनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। सिर्फ एक वैध वसीयत होना इस बात की गारंटी नहीं है कि आपके जाने के बाद परिवार को संपत्ति आसानी से मिल जाएगी। कानूनी पेचीदगियां, अधूरी कागजी कार्रवाई और गलतफहमियां कई बार वसीयत होने के बावजूद वारिसों को महीनों और सालों तक अदालतों या बैंकों के चक्कर काटने पर मजबूर कर देती हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय परिवारों में यह मान लिया जाता है कि उत्तराधिकार की प्लानिंग (Succession Planning) का मतलब सिर्फ वसीयत लिखना है। जबकि हकीकत यह है कि वसीयत के साथ-साथ सही कागजात, नॉमिनी, एग्जीक्यूटर (वसीयत लागू करने वाला) और संपत्तियों के रिकॉर्ड का आपस में तालमेल होना भी उतना ही जरूरी है।
सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि वसीयत छोड़ते ही बैंक, म्यूचुअल फंड, हाउसिंग सोसायटियां और रजिस्ट्रार तुरंत संपत्ति वारिसों के नाम ट्रांसफर कर देंगे। व्यवहार में ऐसा बहुत कम होता है। ASL पार्टनर्स के एसोसिएट पी सी रॉय कहते हैं, “संस्थानों को यह अधिकार है कि वे संपत्ति ट्रांसफर करने से पहले वसीयत की प्रामाणिकता, उसे सही तरीके से तैयार किए जाने और उस पर किसी अन्य दावे के न होने की पूरी जांच करें।”
यही वजह है कि वित्तीय संस्थान वसीयत देखने के बाद भी कई और कागजात मांगते हैं। इनमें प्रोबेट ऑर्डर (कोर्ट से वसीयत की मंजूरी), इंडेमनिटी बॉन्ड, एफिडेविट, नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC), KYC रिकॉर्ड, या लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन शामिल हैं।
सिरिल अमरचंद मंगलदास की पार्टनर (को-हेड – प्राइवेट क्लाइंट) राधिका गग्गर के मुताबिक, कागजात की जरूरत इस बात पर निर्भर करती है कि संपत्ति किस तरह की है, उसमें कोई नॉमिनी या जॉइंट होल्डर है या नहीं, या फिर परिवार में कोई विवाद तो नहीं है।
कई मामलों में जहां प्रोबेट (कोर्ट की मंजूरी) जरूरी नहीं भी होता, वहां भी बैंक और सोसायटियां खुद को भविष्य के मुकदमों से बचाने के लिए कोर्ट के दस्तावेज मांगती हैं। एकॉर्ड ज्यूरिस के मैनेजिंग पार्टनर आलय रिजवी कहते हैं, “वित्तीय संस्थान और हाउसिंग सोसायटियां बहुत फूंक-फूंक कर कदम रखती हैं, क्योंकि उनके पास उत्तराधिकार के विवादों पर अंतिम फैसला सुनाने का कानूनी अधिकार नहीं होता।”
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वसीयत लिखते समय लोग अक्सर ‘एग्जीक्यूटर’ के रोल को गंभीरता से नहीं लेते। एग्जीक्यूटर वह व्यक्ति होता है जिसे वसीयत को लागू करने की जिम्मेदारी दी जाती है। अगर वसीयत का एग्जीक्यूटर समय पर उपलब्ध न हो, उसकी मृत्यु हो जाए, वह जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दे, या उसका पता न चले, तो पूरी प्रक्रिया ठप हो जाती है।
डी एम हरीश एंड कंपनी की एडवोकेट खुशी परमार बताती हैं, “ऐसे मामलों में वसीयत तो वैध रहती है, लेकिन वारिसों को ‘लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन विथ द विल एनेक्स्ड’ के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। इस प्रक्रिया में लंबा समय लगता है क्योंकि बैंक और रजिस्ट्रार अक्सर दावों को स्वीकार करने के लिए एग्जीक्यूटर की मौजूदगी या सहमति पर अड़े रहते हैं।”
यही कारण है कि कानूनी जानकार हमेशा वसीयत में एक से ज्यादा विकल्प रखने की सलाह देते हैं। दिल्ली हाई कोर्ट की एडवोकेट प्राची दुबे कहती हैं, “सबसे सही तरीका यह है कि वसीयत के अंदर ही एक वैकल्पिक (Alternate) एग्जीक्यूटर का नाम भी डाला जाए। इसके अलावा एग्जीक्यूटर ऐसा होना चाहिए जो भरोसेमंद हो, परिवार की संपत्तियों से वाकिफ हो और जरूरत के समय उपलब्ध रहे।”
उत्तराधिकार के मामलों में देरी हमेशा परिवार के झगड़ों की वजह से ही नहीं होती, बल्कि साधारण कागजी गलतियां भी सालों का वक्त बर्बाद कर देती हैं। जानकारों ने कुछ ऐसी आम कमियों का जिक्र किया है जो अक्सर सामने आती हैं:
खुशी परमार कहती हैं कि एक और बड़ी लापरवाही कोर्ट से प्रोबेट या उत्तराधिकार प्रमाण पत्र मिलने के बाद होती है। लोग सोचते हैं कि काम पूरा हो गया, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में संपत्ति को अपने नाम दर्ज कराने (म्यूटेशन) की प्रक्रिया बाकी रह जाती है। इसके बिना वारिस न तो संपत्ति बेच सकते हैं, न उस पर लोन ले सकते हैं और न ही टैक्स चुका सकते हैं।
लेगम सोलिस के फाउंडर शशांक अग्रवाल का कहना है कि संपत्तियों के बिखरे हुए रिकॉर्ड और बिना हस्ताक्षर वाली या विरोधाभासी वसीयतें ही सबसे बड़ी वजह हैं जिससे मामले कोर्ट-कचहरी में खिंच जाते हैं। कई बार तो परिवारों को यह भी नहीं पता होता कि उनके बुजुर्गों ने कहां-कहां निवेश किया है, खासकर डिजिटल एसेट्स, डीमैट अकाउंट, इंश्योरेंस पॉलिसी और पुराने बैंक खातों की जानकारी अक्सर किसी के पास नहीं होती।
भारत में सबसे आम गलतफहमी यह है कि किसी खाते या संपत्ति में जिसे नॉमिनी (नामांकित व्यक्ति) बनाया गया है, खाताधारक की मौत के बाद वही उसका असली मालिक बन जाता है। कानूनी तौर पर यह पूरी तरह गलत है।
एडवोकेट खुशी परमार साफ करती हैं, “नॉमिनी केवल एक अस्थायी कस्टोडियन (रखवाला) होता है, अंतिम मालिक नहीं।”
बैंकों और वित्तीय संस्थानों की नजर में नॉमिनी का काम सिर्फ पैसा या एसेट संभालना है, जब तक कि वह वसीयत या उत्तराधिकार कानून के तहत असली वारिसों को ट्रांसफर न हो जाए।
राधिका गग्गर ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने भी 2023 के ‘शक्ति यजदानी बनाम जयानंद जयंत सालगॉन्कर’ मामले में इसी कानूनी स्थिति को दोबारा साफ किया है। इसलिए अगर वसीयत और नॉमिनेशन में अलग-अलग नाम हैं, तो वसीयत में लिखे नाम को ही प्राथमिकता मिलती है।
जब वसीयत में संपत्तियों का बंटवारा बराबरी से नहीं होता, तो परिवार में कलह होना आम है। वसीयत को कोर्ट में यह कहकर चुनौती दी जा सकती है कि इसे दबाव, धोखाधड़ी या मानसिक अस्वस्थता की स्थिति में लिखवाया गया था। इस टकराव को कम करने के लिए पारदर्शिता बहुत जरूरी है।
एलारा लॉ ऑफिसेज की पार्टनर सुप्रिया मजूमदार एक व्यावहारिक सुझाव देती हैं, “अगर कोई अपनी संपत्ति का असमान बंटवारा कर रहा है, तो उसे वसीयत के साथ एक स्पष्टीकरण नोट छोड़ना चाहिए या एक वीडियो रिकॉर्डिंग बना देनी चाहिए, जिसमें वह अपनी मर्जी और ऐसा करने की वजह साफ-साफ बता सके।” इसके अलावा एग्जीक्यूटर को भी चाहिए कि वह सभी वारिसों के साथ खुलकर बात करे, कागजात साझा करे और किसी भी तरह के अनौपचारिक वादों से बचे।
उत्तराधिकार की योजना बनाना जीवन में केवल एक बार का काम नहीं है। शादियां, तलाक, बच्चों का जन्म, किसी की मृत्यु या नई संपत्तियों की खरीद-बिक्री के हिसाब से वसीयत को समय-समय पर अपडेट (रिवाइज) करते रहना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई कानूनी खामी न बचे।