रिटायरमेंट के बाद हर इंसान चाहता है कि उसके पास ऐसी फाइनेंशियल सिक्योरिटी हो, जहां रिस्क कम हो और हर महीने एक तय इनकम मिलती रहे। अब तक ज्यादातर लोग इसके लिए फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर भरोसा करते रहे हैं, क्योंकि इसे सेफ माना जाता है। लेकिन बदलते दौर में गवर्नमेंट सिक्योरिटीज (G-Secs) तेजी से एक नए और मजबूत विकल्प के तौर पर सामने आए हैं। ये सीधे भारत सरकार की सॉवरेन गारंटी के साथ आती हैं, इसलिए सिक्योरिटी को लेकर भरोसा काफी ज्यादा होता है। साथ ही, इस समय इनमें करीब 6.8% से 7.2% तक की यील्ड (रिटर्न) मिल रही है, जो रिटायरमेंट के बाद रेगुलर इनकम के लिए आकर्षक मानी जा सकती है।
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि G-Secs, बैंक FD और इंश्योरेंस एन्युटी के बीच एक अच्छा बैलेंस बनाते हैं। इनमें आपको FD जैसी स्थिरता मिलती है, लेकिन एन्युटी की तरह पैसा पूरी तरह लॉक नहीं होता, यानी जरूरत पड़ने पर आप अपनी पूंजी निकाल सकते हैं। ऐसे समय में जब बाजार में उतार-चढ़ाव बना हुआ है, RBI रिटेल डायरेक्ट जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म ने आम निवेशकों के लिए सरकारी बॉन्ड में निवेश करना आसान बना दिया है। इससे वे देश की ग्रोथ में हिस्सा ले सकते हैं और अपने रिटायरमेंट को आर्थिक रूप से ज्यादा सेफ बना सकते हैं।
रिटायरमेंट के लिए आमतौर पर लोग बैंक FD या बीमा कंपनियों की एन्युटी (Annuities) स्कीम चुनते हैं, लेकिन G-Secs इन दोनों के बीच एक संतुलित विकल्प के तौर पर सामने आते हैं। बैंकबाजार के CEO और को-फाउंडर आदिल शेट्टी कहते हैं, “गवर्नमेंट सिक्योरिटीज सॉवरेन गारंटी के साथ आती हैं, इसलिए इन्हें निवेश के सबसे ‘सेफ ऑप्शन’ में गिना जाता है। ये FD जैसी स्थिरता देती हैं, लेकिन इनकी कीमतें ब्याज दरों के साथ बदल सकती हैं। साथ ही, एन्युटी की तरह पैसा जीवनभर के लिए लॉक नहीं होता, यानी जरूरत पड़ने पर इन्हें बेचा भी जा सकता है।”
वहीं, एटम प्राइव फाइनेंशियल सर्विसेज के डायरेक्टर और हेड (प्रोडक्ट एंड एडवाइजरी) करण रिझसिंघानी के मुताबिक, “इस समय G-Secs पर करीब 6.8% से 7.2% तक की यील्ड मिल रही है, जो इसे FD और एन्युटी के बीच एक मजबूत विकल्प बनाती है। चूंकि ये सरकार से जुड़े होते हैं, इसलिए इनमें भरोसा ज्यादा होता है। साथ ही, अभी यील्ड पिछले करीब 20 महीनों के हाई पर है, जिससे रिटायर लोगों के लिए अपनी इनकम को लॉक करने का अच्छा मौका मिल रहा है।”
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भले ही G-Secs में आपका मूल पैसा डूबने का खतरा (Default Risk) न के बराबर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह पूरी तरह रिस्क फ्री है। वरिष्ठ नागरिकों को इसके दो पहलुओं को समझना जरूरी है, जिसमें ब्याज दर का रिस्क और महंगाई शामिल हैं।
आदिल शेट्टी आगाह करते हुए कहते हैं, “सबसे बड़ा रिस्क ब्याज दरों में होने वाला बदलाव है। अगर बाजार में दरें बढ़ती हैं और आपको मैच्योरिटी से पहले पैसा निकालना पड़ा, तो आपको नुकसान हो सकता है। इसके अलावा, इससे होने वाली कमाई पर आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है। यदि आपके बॉन्ड तब मैच्योर होते हैं जब ब्याज दरें कम हों, तो उस पैसे को दोबारा निवेश करने पर आपको कम रिटर्न मिल सकता है।”
करण रिझसिंघानी के मुताबिक, “फिलहाल कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें (110 डॉलर के पार) और कमजोर होता रुपया महंगाई बढ़ा सकता है। मार्च महीने में ही यील्ड में 35-45 बेसिस पॉइंट की बढ़त देखी गई है, जिससे बॉन्ड की कीमतों में गिरावट आई है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए सलाह यही है कि वे बॉन्ड को मैच्योरिटी तक अपने पास रखें। ऐसा करने से उन्हें बाजार के उतार-चढ़ाव से फर्क नहीं पड़ेगा और उन्हें फ्रिक्स रिटर्न मिलता रहेगा।”
एक समय था जब सरकारी बॉन्ड में सिर्फ बड़े संस्थान या बैंक ही निवेश कर पाते थे, लेकिन अब दरवाजा छोटे निवेशकों के लिए भी खुल गया है। इस प्रक्रिया पर बात करते हुए शेट्टी कहते हैं, “अब निवेश की प्रक्रिया बहुत आसान और डिजिटल हो गई है। निवेशक RBI रिटेल डायरेक्ट (RBI Retail Direct) प्लेटफॉर्म के जरिए सीधे सरकारी बॉन्ड में निवेश कर सकते हैं। इसमें आप प्राइमरी ऑक्शन (नया बॉन्ड जारी होते समय) में हिस्सा ले सकते हैं और सेकेंडरी मार्केट (पुराने बॉन्ड की खरीद-बिक्री) में भी ट्रेड कर सकते हैं।”
करण रिझसिंघानी इसमें और विकल्प जोड़ते हुए बताते हैं कि, “RBI प्लेटफॉर्म के अलावा, निवेशक गिल्ट म्यूचुअल फंड (Gilt Mutual Funds) या स्टॉक एक्सचेंज (NSE/BSE) के जरिए भी G-Secs में पैसा लगा सकते हैं। इक्विटी मार्केट की अस्थिरता को देखते हुए अब रिटेल निवेशकों की भागीदारी इसमें तेजी से बढ़ रही है।”
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बॉन्ड मार्केट का एक सीधा नियम है: जब ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो बॉन्ड की कीमतें गिरती हैं, और जब दरें गिरती हैं, तो कीमतें बढ़ती हैं।
आदिल शेट्टी समझाते हैं, “लॉन्ग टर्म निवेशकों को अंतरिम उतार-चढ़ाव की चिंता तभी करनी चाहिए जब वे मैच्योरिटी से पहले निकलना चाहते हों। अगर आप बॉन्ड को अंत तक रखते हैं, तो आपको वही फिक्स्ड ब्याज और मूलधन मिलेगा जिसका वादा किया गया था।”
इस पर रिझसिंघानी का कहना है, “मैक्रो फैक्टर्स (जैसे महंगाई और तेल) की वजह से फिलहाल यील्ड बढ़ी हुई है। बढ़ती दरों वाला माहौल उन लोगों के लिए अच्छा है जो नए सिरे से निवेश करना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें बेहतर रिटर्न (Reinvestment opportunity) मिलेगा। लेकिन जिन्होंने पहले से निवेश कर रखा है, उन्हें अपनी होल्डिंग बनाए रखनी चाहिए ताकि कैपिटल लॉस न हो।”
सिर्फ G-Secs में पूरा पैसा लगाना सही रणनीति नहीं है, बल्कि बेहतर यही है कि एक संतुलित (balanced) पोर्टफोलियो बनाया जाए, जिसमें अलग-अलग तरह के निवेश शामिल हों।
रिझसिंघानी एक खास रणनीति का सुझाव देते हैं:
आदिल शेट्टी भी इस बात से सहमति जताते हुए कहते हैं, “G-Secs को FD या शॉर्ट-टर्म निवेश के साथ जोड़कर रखना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि आपके पास आपात स्थिति के लिए हमेशा नकदी उपलब्ध रहे और आपको घाटे में अपने बॉन्ड बेचने की मजबूरी न हो।”
दोनों एक्सपर्ट्स इस बात पर एकमत हैं कि रिटायरमेंट के लिए G-Secs सिक्योरिटी और रेगुलर इनकम का एक मजबूत आधार दे सकते हैं। अगर इन्हें मैच्योरिटी तक रखने के इरादे से निवेश किया जाए, तो सरकारी गारंटी के साथ ये बुढ़ापे में आर्थिक सहारा बन सकते हैं।