Tata Sons IPO: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी यानी CIC का दर्जा छोड़ने की अर्जी खारिज कर दी है। इसके बाद टाटा संस के लिए शेयर बाजार में लिस्ट होने से बचना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। अब ध्यान उन कानूनी और ढांचागत तैयारियों पर है, जिन्हें नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक कारोबार करने वाले टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी को आरंभिक सार्वजनिक पेशकश यानी IPO के लिए आवेदन करने से पहले पूरा करना होगा।
वकीलों के मुताबिक इसकी शुरुआत टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन यानी AOA से होगी। कंपनी 2017 में प्राइवेट लिमिटेड यूनिट में बदल गई थी। इसके तहत शेयरों के ट्रांसफर और नए शेयरधारकों के एंट्री पर ऐसी पाबंदियां लगाई गई थीं, जो पब्लिक लिस्टिंग के नियमों के मुताबिक नहीं हैं।
तारक्ष लॉयर्स एंड कंसल्टेंट्स के पार्टनर तन्मय बंथिया के मुताबिक टाटा संस को दोबारा सार्वजनिक कंपनी में बदलने और बाजार नियामक की लिस्टिंग से जुड़ी बुनियादी शर्तें पूरी करने के लिए इन पाबंदियों को हटाना होगा। इसके लिए कंपनी के बोर्ड को विशेष प्रस्ताव पारित करने होंगे।
सिंघानिया एंड कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर रोहित जैन ने कहा कि टाटा ट्रस्ट्स की नियंत्रक हिस्सेदारी और ट्रस्ट से जुड़ी किसी भी संचालन व्यवस्था की जानकारी देने, संबंधित पक्षों के लेनदेन और वास्तविक लाभार्थी स्वामित्व के नजरिये से जांच करनी पड़ सकती है।
उन्होंने कहा, “मौजूदा शेयरधारकों की हिस्सेदारी को सोच-समझकर कम करने और रणनीतिक रूप से शेयरों की बिक्री से बाजार में उपलब्ध शेयरों की संख्या बढ़ सकती है और कीमत तय करने की प्रक्रिया बेहतर हो सकती है। आखिरकार, अधिक पारदर्शिता, बोर्ड की स्वतंत्रता, जानकारी देने की मजबूत व्यवस्था और पूंजी ढांचे को आसान बनाना IPO की तैयारी के लिए अहम होगा।”
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टाटा संस में 66 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ टाटा ट्रस्ट्स सबसे बड़ा शेयरधारक है। न्यूनतम सार्वजनिक हिस्सेदारी की शर्त पूरी करने के लिए एक्सपर्ट्स का मानना है कि नए शेयर जारी करने के बजाय मौजूदा शेयरधारकों की ओर से ऑफर फॉर सेल यानी OFS लाया जाना सबसे संभावित रास्ता है।
करीब 18.4 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले शापूरजी पालोनजी यानी SP समूह को ऐसे OFS के लिए स्वाभाविक दावेदार माना जा रहा है। SP समूह अपने कर्ज का बोझ कम करने के लिए लंबे समय से टाटा संस की लिस्टिंग पर जोर देता रहा है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस रास्ते से टाटा संस नियमों से जुड़ी शर्तें पूरी कर सकती है और टाटा ट्रस्ट्स को कंपनी पर अपना नियंत्रण भी ढीला नहीं करना पड़ेगा।
अकॉर्ड ज्यूरिस के मैनेजिंग पार्टनर अलय राजवी ने कहा कि टाटा संस की पहली प्राथमिकता समयसीमा को लेकर आरबीआई से स्थिति साफ करना और आईपीओ की विस्तृत योजना तैयार करना होगी। उन्होंने कहा कि कंपनी को अपने वैल्यूएशन, सार्वजनिक हिस्सेदारी की जरूरत और जानकारी देने की व्यवस्था का दोबारा आकलन करना होगा।
राजवी ने कहा, “शापूरजी पालोनजी समूह की हिस्सेदारी को संभावित रूप से ऑफर फॉर सेल में शामिल किया जा सकता है, हालांकि इस पर उसका अंतिम रुख अभी साफ नहीं है।”
राजवी ने कानूनी चुनौती की संभावना का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, “टाटा संस RBI के फैसले को चुनौती दे सकती है, लेकिन जब तक किसी अदालत से उसे प्रभावी अंतरिम राहत नहीं मिलती, कंपनी को लिस्टिंग की तैयारी करनी चाहिए।”
नियामकीय विकल्प लगातार सीमित होने के बीच 17 सितंबर को होने वाली बोर्ड की बैठक में लिस्टिंग और उससे जुड़े दूसरे मुद्दों पर आगे के कदमों पर विचार किए जाने की उम्मीद है।