निवेशकों को अपने जोखिम प्रोफाइल के मुताबिक पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के बरअक्स अगले कुछ हफ्तों में इक्विटी में धीरे-धीरे अपना निवेश बढ़ाने का आकलन करना चाहिए। 3पी इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के मुख्य निवेश अधिकारी और फंड मैनेजर प्रशांत जैन ने अपने पोर्टफोलियो रणनीतिकार और सह-फंड मैनेजर अश्वनी कुमार के साथ मिलकर लिखे नोट में ये बातें कही हैं।
उन्होंने कहा कि निफ्टी का मौजूदा मूल्यांकन एक साल आगे की आय के 17.5 गुना पर है जो उचित है और मध्यम अवधि में करीब 12 फासदी सालाना चक्रवृद्धि रिटर्न मिलने की संभावना है और इसमें दोबारा रेटिंग की गुंजाइश है। नोट में कहा गया है, 18 महीने की अवधि और लार्ज-कैप शेयरों में 10 से 15 फीसदी की गिरावट तथा स्मॉल/मिडकैप शेयरों में इससे भी अधिक गिरावट ने समय के साथ दोबारा मूल्यांकन की गुंजाइश पैदा कर दी है।
12 फीसदी सीएजीआर की अपेक्षित आय वृद्धि बाजारों और रिटर्न के लिए मजबूत और सकारात्मक कारक है। इस प्रकार, बाजार समय के साथ अनुकूल जोखिम-लाभ अनुपात मुहैया कराते हैं। ऐस इक्विटी के आंकड़ों से पता चलता है कि युद्ध शुरू होने के बाद से निफ्टी 50 में 8.2 फीसदी की गिरावट आई है। इस दौरान निफ्टी स्मॉलकैप 250 इंडेक्स लगभग 6.9 फीसदी नीचे आया है। इन घटनाओं के कारण विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से दूर हैं और मार्च में उन्होंने अब तक उन्होंने 88,180 करोड़ रुपये की निकासी की है।
जैन और कुमार का मानना है कि युद्ध के हालात और कच्चे तेल के बाज़ार स्थिर होने पर यह बिकवाली कम हो जानी चाहिए। उनका कहना है, पिछले वर्ष अन्य उभरते बाजारों की तुलना में भारत का बेहद कमजोर प्रदर्शन, उभरते बाजारों के मुकाबले भारत के प्रीमियम का सामान्यीकरण, विदेशी निवेशकों की कम हिस्सेदारी, भारत की अर्थव्यवस्था का आकार, मजबूत वृद्धि की संभावनाएं और मजबूत आर्थिक परिस्थितियां समय के साथ विदेशी निवेशकों को न केवल बिकवाली से रोकेंगी बल्कि खरीदने के लिए भी प्रोत्साहित करेंगी।
नोट में कहा गया है कि मांग-आपूर्ति के लिहाज से भी आशावादी होने के कारण हैं। हालांकि आम धारणा यह है कि एफआईआई निवेश वापस आने पर स्थिति में सुधार होगा, लेकिन जैन और कुमार का मानना है कि इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता क्योंकि प्राथमिक बाजार शेयरों की आपूर्ति का बड़ा स्रोत रहे हैं।
उन्होंने कहा, लगभग दो तिहाई इश्यू घाटे में चल रहे हैं। इसलिए हमारा मानना है कि निकट भविष्य में ऐसे इश्यू से जुटाई जाने वाली पूंजी में भारी गिरावट आएगी। इसका मतलब यह है कि घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) के पास मौजूद इक्विटी पूंजी का बड़ा हिस्सा सेकंडरी बाजारों में जाएगा।
कच्चे तेल की कीमतों में हुई तीव्र वृद्धि के परिप्रेक्ष्य में जैन और कुमार का मानना है कि निफ्टी इंडेक्स में उन कंपनियों का एक्सपोजर कम है, जिन पर कच्चे तेल और गैस की ऊंची कीमतों का सीधा प्रभाव पड़ता है। तेल विपणन कंपनियां , पेंट, सिरैमिक्स, शहरी गैस वितरण कंपनियां, ऑटोमोबाइल, एयरलाइंस, सीमेंट, खाद्य प्रसंस्करण आदि जैसे प्रभावित सेक्टर निफ्टी व बाजारों का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा हैं।
उन्होंने कहा, इसके अलावा इनमें से अधिकांश सेक्टरों में असर अस्थायी होगा क्योंकि समय के साथ बढ़ी हुई इनपुट लागत उपभोक्ताओं पर डाल दी जाएगी। यह भी याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि शेयर मुद्रास्फीति के खिलाफ सुरक्षा का काम करते हैं क्योंकि कंपनियों का राजस्व/आय मुद्रास्फीति के अनुरूप तेजी से बढ़ती है।
इस बीच वित्त वर्ष 2025-26 में तेल की कीमतें औसतन लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल रहीं। हालांकि तेल की कीमतों का पूर्वानुमान लगाना कठिन है, खासकर अगले कुछ तिमाहियों के लिए। लेकिन अगर पूरे वित्त वर्ष 2027 में भी कीमतें औसतन 100 डॉलर प्रति बैरल रहती हैं तो जैन और कुमार का अनुमान है कि भारत के तेल आयात में 45-50 अरब डॉलर होगी।