उतार-चढ़ाव में इजाफा और पिछले खराब रिटर्न ने वैयक्तिक निवेशकों के मनोबल पर असर डाला है। देसी शेयर बाजार में खुदरा निवेशकों की प्रत्यक्ष हिस्सेदारी कई वर्षों के निचले स्तर पर आ गई है। अलबत्ता, वे म्युचुअल फंडों के जरिये अप्रत्यक्ष रूप से इक्विटी में अपनी बचत का निवेश करना जारी रखे हुए हैं।
प्राइम डेटाबेस के आंकड़ों के अनुसार नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) पर सूचीबद्ध कंपनियों के कुल बाजार पूंजीकरण में खुदरा निवेशकों की हिस्सेदारी 31 दिसंबर, 2025 को समाप्त तिमाही में घटकर चार साल के निचले स्तर 7.25 फीसदी पर आ गई। खुदरा निवेशकों का मतलब ऐसे लोगों से है, जिनके पास किसी एक कंपनी में 2 लाख रुपये तक के शेयर हैं।
धनाढ्य निवेशकों यानी एचएनआई, जिनके पास एक ही कंपनी में 2 लाख रुपये से ज्यादा के शेयर हैं, की मौजूदगी भी घटी है और सितंबर तिमाही में उनकी हिस्सेदारी 2.09 फीसदी से घटकर 2.03 फीसदी रह गई। नतीजतन, खुदरा और अमीर निवेशकों का कुल स्वामित्व तीन साल के निचले स्तर 9.28 फीसदी पर आ गया।
बाजार के जानकारों ने वैयक्तिक स्तर पर प्रत्यक्ष निवेश की वैल्यू में गिरावट का मुख्य कारण स्मॉल और मिड-कैप शेयरों में तेज गिरावट को बताया। निफ्टी अभी जनवरी 2026 के अपने बंद उच्चस्तर से महज 1.8 फीसदी दूर है, जबकि निफ्टी स्मॉल कैप इंडेक्स 11.6 फीसदी दूर है। व्यापक बाजार में गिरावट के कारण खुदरा निवेशक 2025 में 1,714 करोड़ रुपये के शुद्ध बिकवाल बन गए, जबकि 2024 में उन्होंने 1.67 लाख करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की थी। पिछले साल 12 महीनों में से सात महीनों में खुदरा निवेशक शुद्ध बिकवाल रहे।
इक्विनॉमिक्स के संस्थापक जी. चोकालिंगम ने कहा, स्मॉल और मिडकैप सेगमेंट के कुछ शेयरों में 20 फीसदी से 50 फीसदी तक की गिरावट आई है। आम तौर पर वैयक्तिक निवेशकों का इन सेगमेंट में ज्यादा निवेश होता है। पिछले एक साल में कुल बाजार पूंजीकरण में अग्रणी 250 शेयरों का हिस्सा तेजी से बढ़ा है जबकि मिड और स्मॉलकैप शेयरों के बाजार पूंजीकरण में गिरावट ज्यादा तेज रही है।
चोकालिंगम ने कहा कि आने वाली तिमाही में खुदरा और एचएनआई शेयरधारिता की वैल्यू बहाल हो सकती है क्योंकि स्मॉल और मिडकैप सेगमेंट में मूल्यांकन कम हो गए हैं और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के बाद बाजार के मनोबल में सुधार हुआ है।
प्रत्यक्ष व्यक्तिगत स्वामित्व में कमी आई। लेकिन घरेलू संस्थागत दबदबा और मजबूत हुआ। घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) की होल्डिंग 30 सितंबर, 2025 के 18.28 फीसदी के स्तर से बढ़कर 18.72 फीसदी के अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गईं, जिसे तिमाही के दौरान 2.1 लाख करोड़ रुपये के शुद्ध निवेश से समर्थन मिला। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से घरेलू म्युचुअल फंडों के निवेश की वजह से हुई, जिनकी हिस्सेदारी बढ़कर रिकॉर्ड 11.1 फीसदी हो गई।
प्राइम डेटाबेस समूह के प्रबंध निदेशक प्रणव हल्दिया ने कहा, आने वाली तिमाही में म्युचुअल फंड विदेशी निवेशकों को पीछे छोड़ सकते हैं। यह रुझान 2016 में नोटबंदी के बाद शुरू हुआ और कोविड-19 के दौरान इसमें तेज़ी आई। एसआईपी के जरिये लगातार मिले खुदरा निवेश के बल पर म्युचुअल फंडों ने इस तिमाही में शुद्ध रूप से 1.1 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया जबकि विदेशी संस्थागत निवेशकों ने 11,765 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी की।
लगातार बिकवाली के दबाव के बीच दिसंबर तिमाही में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की हिस्सेदारी और गिरकर 13 साल के निचले स्तर 16.6 फीसदी पर आ गई। इसके बावजूद, एफपीआई निवेशक कैटेगरी में सबसे असरदार आवंटक के तौर पर उभरे। इस तिमाही में एफपीआई के मालिकाना हक वाले शेयरों की औसत कीमत में 7.1 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। इसके बाद घरेलू संस्थानों का नंबर आया, जिनके शेयरों की औसत कीमत में 2.4 फीसदी का इजाफा हुआ। इसके उलट, खुदरा निवेशकों के मालिकाना हक वाले शेयरों की औसत कीमत में 10.3 फीसदी की गिरावट आई, जो स्वामित्व वाली सभी श्रेणियों में सबसे बड़ी थी।