तरजीही इक्विटी सूचीबद्धता की संख्या ढाई दशक से भी ज्यादा समय में अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। प्राइमडेटाबेस डॉटकॉम के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में तरजीही शेयरों की लिस्टिंग की संख्या 1,307 रही।
यह वर्ष 2000-01 से उपलब्ध सबसे अधिक आंकड़ा है। यह वित्त वर्ष 2025 में देखी गई 986 ऐसी सूचीबद्धताओं से 33 प्रतिशत ज्यादा है। इस आंकड़े में हर अलॉटमेंट की लिस्टिंग को एक अलग घटना माना गया है और निर्गम के लिए सूचीबद्धता की तारीख को माना गया है, न कि उस तारीख को जब शेयर अलॉट किए गए थे। इन तरजीही इक्विटी इश्यू की कुल कीमत लगभग 1.49 लाख करोड़ रुपये थी, जो रिकॉर्ड में तीसरी सबसे ज्यादा है। इससे पहले ऊंचा स्तर वित्त वर्ष 2019 (लगभग 1.96 लाख करोड़) और वित्त वर्ष 2020 (लगभग 1.63 लाख करोड़ रुपये) दर्ज किया गया था।
तरजीही इक्विटी निर्गम तब होता है, जब कोई कंपनी कुछ चुनिंदा इकाइयों के समूह को इक्विटी जारी करती है। इनमें प्रवर्तक या गैर-प्रवर्तक समूह के निवेशक शामिल हो सकते हैं। वित्त वर्ष 2026 के कुल निर्गमों में से लगभग 60 प्रतिशत गैर-प्रवर्तक संस्थाओं को जारी किए गए थे।
कुछ बड़े गैर-प्रवर्तक निर्गम उन कंपनियों के आए, जिनमें निजी क्षेत्र का ऋणदाता आईडीएफसी फर्स्ट बैंक (लगभग 7,500 करोड़ रुपये) और फार्मास्युटिकल कंपनी बायोकॉन (6,950 करोड़ रुपये) शामिल हैं। सबसे बड़ा निर्गम वोडाफोन आइडिया (36,950 करोड़ रुपये) का था, जिसने अपनी स्पेक्ट्रम नीलामी की बकाया रकम को इक्विटी में बदलने का विकल्प चुना। कम से कम 244 लिस्टिंग में एसएमई सेगमेंट की कंपनियां भी शामिल थीं, जिससे पता चलता है कि तरजीही इश्यू का इस्तेमाल सिर्फ बड़ी कंपनियों तक ही सीमित नहीं है।
एक छोटे निवेश बैंक ‘रिपलवेव इक्विटी एडवायजर्स’ में पार्टनर मेहुल सावला ने कहा कि तरजीही इक्विटी निर्गम आमतौर पर किसी बड़े निवेश के दौरान या ऐसी कंपनी के लिए फंड जुटाने के लोकप्रिय तरीके होते हैं जो आर्थिक रूप से अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही हो और जिसके पास पूंजी जुटाने के अन्य रास्ते सीमित हों। कुछ कंपनियों में सेक्टर से जुड़े कारणों से भी हलचल देखने को मिल सकती है, जिनमें फाइनैंशियल सेवा कंपनियां भी शामिल हैं।
उन्होंने कहा, ‘कम से कम एनबीएफसी (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों) और बैंकों के लिए इक्विटी उनकी वृद्धि के लिए मूल जरूरत है, खासकर ऐसे हालात में जब जमा दर धीमी हो तो यह रुझान जारी रहने की संभावना होती है।’
सावला ने कहा कि कुछ तरजीही इक्विटी निर्गम शेयरों के रूप में आ सकते हैं, जबकि कुछ में वारंट के जरिये कुछ हिस्सा शामिल हो सकता है। वारंट के तहत हिस्सेदारी लेने के लिए पहले कुछ आंशिक भुगतान करना होता है और बाकी रकम तब दी जाती है जब वारंट शेयरों में बदले जाते हैं। प्रवर्तकों को अक्सर वारंट के जरिये तरलता का प्रबंधन करना ज्यादा आसान लगता है। निजी इक्विटी और दूसरे वित्तीय निवेशक वारंट को ज्यादा पसंद कर सकते हैं। इसकी वजह यह कि इससे रिटर्न की दर बेहतर हो जाती है और पूंजी भी कम ही समय के लिए लगानी होती है।
प्राइम डेटाबेस के प्रबंध निदेशक प्रणव हल्दिया का कहना है कि तेजी से पूरा करने की प्रक्रिया और खास निवेशकों पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता से यह पसंदीदा विकल्प होता है, खासकर बाजार के उतार-चढ़ाव वाले दौर में।
हल्दिया के अनुसार, मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव और उसके परिणामस्वरूप पैदा हुई अस्थिरता को देखते हुए यह रुझान मौजूदा वित्त वर्ष में जारी रहने की संभावना है।