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लाइफ साइकिल फंड में निवेश से पहले जान लें ये 10 जरूरी बातें, नहीं होगा बाद में पछतावा

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लाइफ साइकिल फंड एक खास टारगेट ईयर को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। ये निवेशकों को एक तय समय-सीमा के भीतर लंबी अवधि के वित्तीय लक्ष्यों को हासिल करने में मदद करते हैं

Last Updated- June 23, 2026 | 3:59 PM IST
Life Cycle Fund
प्रतीकात्मक तस्वीर | फोटो: एआई जनरेटेड

Life cycle funds: जेरोधा म्युचुअल फंड ने 2036 और 2041 में मैच्योर होने वाले दो लाइफ साइकिल फंड लॉन्च किए हैं। फरवरी 2026 में भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा इस नई कैटेगरी की शुरुआत किए जाने के बाद यह इस तरह के पहले फंड लॉन्च हैं। वहीं, ICICI प्रूडेंशियल एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC) ने भी 2031, 2036 और 2041 में मैच्योर होने वाले तीन लाइफ साइकिल फंड लॉन्च करने के लिए सेबी के पास आवेदन किया है।

लाइफ साइकिल फंड क्या हैं?

लाइफ साइकिल फंड एक खास टारगेट ईयर को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। ये निवेशकों को एक तय समय-सीमा के भीतर लंबी अवधि के वित्तीय लक्ष्यों (long-term financial goals) को हासिल करने में मदद करते हैं। जेरोधा फंड हाउस के सीईओ विशाल जैन कहते हैं, “ये कई तरह के एसेट क्लास में निवेश करते हैं, जिनमें इक्विटी, डेट और सोना-चांदी जैसी कमोडिटीज शामिल हैं।”

निवेश का आधार ग्लाइड पाथ?

इन फंड्स का सबसे अहम आधार पहले से तय ग्लाइड पाथ (Predefined Glide Path) होता है। जैन कहते हैं, “शुरुआती वर्षों में फंड का एलोकेशन ज्यादा ग्रोथ-ओरिएंटेड रहता है। जैसे-जैसे टारगेट ईयर नजदीक आता है, यह पोर्टफोलियो को व्यवस्थित तरीके से ज्यादा कंजर्वेटिव एलोकेशन (सुरक्षित निवेश) की ओर ले जाता है।” यह बदलाव अपने-आप होता है और इसके लिए निवेशक को कुछ भी करने की जरूरत नहीं होती।

निवेशक अपने निवेश अवधि (इन्वेस्टमेंट होराइजन) के आधार पर इन फंड्स का इस्तेमाल किसी भी फाइनेंशियल टारगेट के लिए कर सकते हैं। लाइफ साइकिल फंड्स अलग-अलग मैच्योरिटी पीरियड के साथ आते हैं, जिससे निवेशक अपने लक्ष्य की अवधि के हिसाब से इन्हें चुन सकते हैं।

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NPS से कैसे अलग हैं लाइफ साइकिल फंड?

नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) के लाइफ साइकिल फंड्स के उलट, ये फंड्स निवेशक की उम्र या किसी खास लक्ष्य से जुड़े नहीं होते हैं।

ये ओपन-एंडेड होते हैं। निवेशक फंड की बची हुई मैच्योरिटी और यह उनके फाइनेंशियल लक्ष्य से कितना मेल खाता है, इसके आधार पर कभी भी फंड में निवेश कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, कोई निवेशक रिटायरमेंट के लिए 15 साल के समय को ध्यान में रखते हुए आज ऐसे लाइफ साइकिल फंड में निवेश कर सकता है जो 2041 में मैच्योर होगा। वहीं, कोई दूसरा व्यक्ति होम लोन के डाउन पेमेंट या कार खरीदने जैसे पांच साल के लक्ष्य के लिए 10 साल बाद उसी फंड में निवेश कर सकता है।

एसेट एलोकेशन और रीबैलेंसिंग का झंझट खत्म

ज्यादातर निवेशकों के लिए चुनौती सिर्फ सही एसेट एलोकेशन करना ही नहीं है। इससे बड़ी चुनौती यह है कि कई सालों तक पोर्टफोलियो को अपने लक्ष्य और समय-सीमा के हिसाब से बनाए रखा जाए।

लाइफ साइकिल फंड एक फिनिश लाइन को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। निवेशक उस साल के आधार पर फंड चुन सकते हैं जब उन्हें पैसे की जरूरत पड़ने की उम्मीद हो। इसके बाद, पोर्टफोलियो समय के साथ पहले से तय एसेट-एलोकेशन के रास्ते पर आगे बढ़ता है। जैसे-जैसे निवेशक लक्ष्य वाले साल के करीब पहुंचते हैं, पोर्टफोलियो धीरे-धीरे ज़्यादा सुरक्षित (कंजर्वेटिव) होता जाता है।

व्यवहार-संबंधी गलतियों से बचने में करते हैं मदद

प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के फाउंडर और सीईओ विशाल धवन कहते हैं, “सुरक्षित एसेट्स की ओर यह बदलाव लक्ष्य के करीब पहुंचने पर नुकसान के जोखिम (डाउनसाइड रिस्क) को नियंत्रित करने के मकसद से किया जाता है।”

ये फंड निवेशकों को आम व्यवहार-संबंधी गलतियों से बचने में भी मदद करते हैं। धवन कहते हैं, “निवेशक सिर्फ इसलिए निवेश कर सकते हैं क्योंकि उस समय कोई एसेट क्लास आकर्षक लग रहा हो। वे किसी एसेट क्लास से इसलिए दूर रह सकते हैं क्योंकि वह आकर्षक नहीं लग रहा हो।”

कई निवेशक किसी ऐसे एसेट क्लास में मुनाफा बुक नहीं करते हैं जिसने अच्छा प्रदर्शन किया हो, क्योंकि उन्हें डर होता है कि वे शॉर्ट-टर्म फायदे से चूक जाएंगे। धवन कहते हैं, “नतीजतन, वे बहुत लंबे समय तक एग्रेसिव एसेट क्लास में बने रह सकते हैं, भले ही उन्हें जल्द ही पैसे की जरूरत हो।” वे टैक्स की चिंताओं के कारण पोर्टफोलियो बदलने में भी हिचकिचा सकते हैं।

कुछ लोग लंबी अवधि के लक्ष्यों के लिए भी डिफेंसिव एसेट क्लास का इस्तेमाल कर सकते हैं क्योंकि एग्रेसिव एसेट महंगे, अस्थिर या मैक्रोइकॉनॉमिक जोखिम वाले लग सकते हैं।

धवन कहते हैं, “लाइफ साइकिल फंड इस तरह की मनोवैज्ञानिक और व्यवहार से जुड़ी गलतफहमियों के असर को कम कर सकते हैं।”

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टैक्स के लिहाज से भी फायदेमंद

इसका एक और फायदा टैक्स से जुड़ा है। मिरे असेट शेरखान में प्रोडक्ट मैनेजमेंट की हेड, सादिया खान कहती हैं, “एसेट-एलोकेशन को रीबैलेंस करने का काम फंड लेवल पर होता है, इसलिए निवेशकों को कैपिटल गेन टैक्स नहीं देना पड़ता।”

मैच्योरिटी के समय, निवेशक पर इक्विटी के हिसाब से टैक्स लगता है, भले ही इक्विटी एलोकेशन का हिस्सा काफी कम हो गया हो। खान कहती हैं, “इक्विटी टैक्सेशन का फायदा बनाए रखने के लिए फंड आर्बिट्राज में एलोकेशन बनाए रखता है।”

जोखिम को समझें

लाइफ साइकिल फंड हर निवेशक के वित्तीय लक्ष्य की समयसीमा से पूरी तरह मेल नहीं खा सकते। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि फंड का टेन्योर पांच साल के अंतराल में होता है।

फंड का पोर्टफोलियो, निवेशक की संपत्ति और जोखिम सहने की क्षमता के आधार पर उनकी असल जरूरतों से अलग भी हो सकता है।

जोखिम लेने की क्षमता भी एक तरह का अंतर पैदा कर सकती है। खान कहती हैं, “लंबे समय के लिए निवेश करने वाले ऐसे निवेशक, जिनकी इक्विटी रिस्क लेने की क्षमता बहुत ज्यादा है, उन्हें भी इक्विटी में सिर्फ 80 फीसदी तक ही निवेश मिल सकता है।”

अगर निवेशक शुरुआती तीन सालों में ही अपना पैसा निकालता है, तो इन फंड्स पर 3 फीसदी तक का भारी रेगुलेटरी एग्जिट लोड लग सकता है।

ये मैनेज्ड सॉल्यूशन होते हैं, इसलिए इक्विटी इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी पर निवेशकों का कंट्रोल नहीं होता है। खान कहती हैं, “हो सकता है कि फंड का पोर्टफोलियो लार्ज कैप पर ज्यादा फोक्स्ड हो, जबकि निवेशक शुरुआती दौर में मिड कैप पर फोक्स्ड पोर्टफोलियो पसंद करते हों।”

निवेशकों को कंसंट्रेशन रिस्क (एक ही जगह ज्यादा निवेश का जोखिम) का भी ध्यान रखना चाहिए। किसी फाइनेंशियल टारगेट के लिए पूरा निवेश एक ही फंड में लगाने से खराब प्रदर्शन का जोखिम बढ़ सकता है।

सख्त और समय-आधारित ‘ग्लाइड पाथ’ में निवेशक की कैश-फ्लो जरूरतों का ध्यान नहीं रखा जा सकता है।

सेबी में रजिस्टर्ड इन्वेस्टमेंट एडवाइजर और सहजमनी डॉट कॉम के फाउंडर अभिषेक कुमार कहते हैं, “ये फंड शुरुआती वर्षों में इक्विटी में उतार-चढ़ाव और बाद के वर्षों में ब्याज दरों में बदलाव से प्रभावित होते हैं।”

किसे निवेश करना चाहिए?

लाइफ साइकिल फंड उन लोगों के लिए सही हो सकते हैं जो अभी निवेश की शुरुआत कर रहे हैं। नए निवेशक अक्सर कुछ बुनियादी गलतिया करते हैं, जैसे कि उस एसेट क्लास में निवेश करना जो उस समय सबसे आकर्षक लग रहा हो। धवन कहते हैं, “लाइफ साइकिल फंड हर चरण में यह तय करने की जरूरत को कम कर देता है कि कौन सा एसेट क्लास चुना जाए।”

ये फंड उन निवेशकों के लिए भी सही हो सकते हैं जो सिर्फ एक या कुछ ही इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करना पसंद करते हैं। ये उन लोगों के लिए भी बेहतर हो सकते हैं जो अपने निवेश पर बार-बार नजर नहीं रखना चाहते।

ये फंड व्यस्त पेशेवरों, नए निवेशकों और ऐसे लोगों के लिए उपयोगी हो सकते हैं, जिनके पास एसेट एलोकेशन का एक्टिव रूप से संभालने के लिए समय, जानकारी या रुचि नहीं है और जो यह जिम्मेदारी किसी पेशेवर फंड मैनेजर को सौंपना चाहते हैं।

जो निवेशक समय-समय पर पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग और एसेट एलोकेशन से जुड़े फैसले लेने में कठिनाई महसूस करते हैं, उनके लिए भी ये फंड एक अच्छा विकल्प हो सकते हैं। इसके अलावा, जिन निवेशकों के पास वित्तीय सलाहकार (फाइनेंशियल एडवाइजर) नहीं है, उनके लिए भी लाइफ साइकिल फंड उपयोगी साबित हो सकते हैं।

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सही फंड कैसे चुनें?

शुरुआत मैच्योरिटी की तारीख से करें। फंड का टारगेट ईयर उस साल से मेल खाना चाहिए जब निवेशक को पैसे की जरूरत पड़ने की उम्मीद हो।

इसके बाद, ‘ग्लाइड पाथ’ को देखें। देखें कि फंड ज्यादा जोखिम वाले एसेट क्लास से एलोकेशन को कम करने या बदलने की क्या योजना बना रहा है। धवन कहते हैं, “यह देखें कि क्या वह ग्लाइड पाथ आपके लक्ष्य, समय-सीमा और जोखिम लेने की क्षमता के अनुकूल है।”

निवेशकों को निवेश करने से पहले खर्च के स्ट्रक्चर और एग्जिट लोड की भी जांच करनी चाहिए।

फंड के पोर्टफोलियो को ध्यान से देखें। धवन कहते हैं, “इक्विटी और डेट, दोनों तरफ के रिस्क की जांच करें।” याद रखें कि डेट वाला हिस्सा भी उतना रिस्की हो सकता है जितना निवेशक के लिए ठीक न हो।

लिक्विडिटी भी उतनी ही जरूरी है। कुमार कहते हैं, “निवेशकों को यह देखना चाहिए कि क्या उन्हें तीन साल के एग्जिट-लोड पीरियड के खत्म होने से पहले पैसे की जरूरत पड़ सकती है।” शॉर्ट-टर्म के पैसे को ऐसे प्रोडक्ट में नहीं लगाना चाहिए जिसमें जल्दी पैसे निकालने पर भारी पेनल्टी लगती हो।

क्या करें और क्या न करें?

परफॉर्मेंस पर नजर रखें क्योंकि लाइफ साइकल फंड का अभी तक कोई ट्रैक रिकॉर्ड नहीं है।

निवेश का बंटवारा उसी लक्ष्य से जुड़े मौजूदा एसेट्स (जैसे रिटायरमेंट के लिए EPF और NPS) के हिसाब से करें।

इन फंड्स का इस्तेमाल शॉर्ट-टर्म या इमरजेंसी के पैसों के लिए न करें।

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First Published - June 23, 2026 | 3:58 PM IST

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