Vedanta Demerger: अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांत लिमिटेड अब पांच अलग-अलग कंपनियों में बंट रही है और 1 मई 2026 इसकी रिकॉर्ड डेट रही। यानी इसी दिन यह तय हुआ कि किन निवेशकों को नई बनने वाली कंपनियों के शेयर मिलेंगे। इस बड़े कॉरपोरेट बदलाव के बाद फिलहाल बाजार का फोकस कंपनी के मूल बिजनेस से हटकर इस बात पर आ गया है कि फंड मैनेजर और बड़े निवेशक अपने पोर्टफोलियो को कैसे संतुलित कर रहे हैं। खासकर पैसिव फंड्स, जो इंडेक्स को फॉलो करते हैं, उन्हें नियमों के कारण मजबूरी में बदलाव करने पड़ रहे हैं।
डिमर्जर का सबसे सीधा असर निफ्टी नेक्स्ट 50 इंडेक्स में देखने को मिला है। पहले इस इंडेक्स में वेदांत का वजन करीब 5.2 प्रतिशत था, जो अब घटकर लगभग 2.3 प्रतिशत रह गया है। इस बदलाव का मतलब यह है कि इंडेक्स को फॉलो करने वाले ईटीएफ और अन्य पैसिव फंड्स को अपने पोर्टफोलियो में वेदांत की हिस्सेदारी घटानी पड़ी। राइट रिसर्च की फाउंडर और फंड मैनेजर सोनम श्रीवास्तव के मुताबिक, निफ्टी नेक्स्ट 50 में वेटेज में बदलाव ही वह कारण है, जिसका सबसे पहले असर पैसिव निवेशकों पर पड़ा। इस वजह से बाजार में एक तरह की ‘मेकैनिकल सेलिंग’ यानी तकनीकी कारणों से बिकवाली देखने को मिली।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस बिकवाली का बड़ा हिस्सा पहले ही बाजार में एडजस्ट हो चुका है। 30 अप्रैल को हुए खास प्री-ओपन प्राइस डिस्कवरी सेशन में वेदांत के शेयर की कीमत में तेज गिरावट देखी गई थी। शेयर का भाव 770 रुपये से ज्यादा से गिरकर करीब 289.50 रुपये तक आ गया था। सोनम श्रीवास्तव का कहना है कि इस सेशन में काफी हद तक फंड्स की रीबैलेंसिंग पहले ही हो गई थी।
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वहीं, सेबी रजिस्टर्ड रिसर्च एनालिस्ट और स्मॉलकेस के फंड मैनेजर शशांक उदुपा का भी मानना है कि अब मौजूदा स्तर, जो करीब 270 रुपये के आसपास है, वहां से बहुत ज्यादा एकतरफा बिकवाली नहीं दिखेगी। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि शॉर्ट टर्म में शेयर में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है क्योंकि बाजार अभी इस बड़े बदलाव को पूरी तरह समझने की कोशिश कर रहा है।
डिमर्जर के बाद वेदांत के चार नए बिजनेस- वेदांता एल्यूमिनियम, पावर, ऑयल एंड गैस और आयरन एंड स्टील, अलग कंपनियों के रूप में सामने आएंगे, लेकिन अभी इनकी लिस्टिंग नहीं हुई है। इन कंपनियों के शेयर बाजार में आने में करीब 4 से 8 हफ्तों का समय लग सकता है। इस दौरान एक खास तरह की स्थिति बनती है, जहां इन कंपनियों को इंडेक्स में ‘डमी स्टॉक’ की तरह दिखाया जाता है, जिनकी वैल्यू तय रहती है लेकिन इनमें ट्रेडिंग नहीं हो सकती।
शशांक उदुपा के मुताबिक, पैसिव फंड्स इन शेयरों की वैल्यू को अपने पोर्टफोलियो में दिखा तो सकते हैं, लेकिन खरीद-बिक्री नहीं कर सकते। इससे उनके प्रदर्शन और इंडेक्स के प्रदर्शन के बीच अंतर यानी ‘ट्रैकिंग एरर’ आ सकता है। सोनम श्रीवास्तव ने भी कहा कि यह बीच का समय काफी जटिल होता है और इसे अक्सर कम समझा जाता है। फंड मैनेजर आमतौर पर अलग-अलग हिस्सों की वैल्यू का अनुमान लगाने के लिए सम-ऑफ-द-पार्ट्स मॉडल का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इसके बावजूद ट्रैकिंग एरर को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं होता।
डिमर्जर के बाद अब निवेश का नजरिया भी बदल रहा है। पहले वेदांता एक बड़ी, विविध बिजनेस वाली कंपनी थी, लेकिन अब हर बिजनेस अलग कंपनी बन जाएगा। ऐसे में एक्टिव फंड मैनेजर अब हर बिजनेस को अलग-अलग देखकर निवेश का फैसला करेंगे। शशांक उदुपा के अनुसार, पहले बाजार वेदांता को एक ही इकाई के रूप में देखता था, जिससे हर बिजनेस की सही वैल्यू सामने नहीं आ पाती थी। अब जैसे एल्यूमिनियम बिजनेस को सीधे हिंडाल्को या नाल्को जैसी कंपनियों से तुलना की जा सकेगी। इससे हर यूनिट का असली प्रदर्शन और क्षमता साफ दिखेगी।
सोनम श्रीवास्तव ने बताया कि वेदांता एल्यूमिनियम पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी और कुछ अनुमान इसके शेयर की कीमत 400 रुपये से ज्यादा होने की संभावना बताते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि एक्टिव फंड मैनेजर वेदांत से दूर नहीं जा रहे हैं, बल्कि अब वे इसे हिस्सों में बांटकर देख रहे हैं और तय कर रहे हैं कि किस कंपनी में निवेश करना ज्यादा सही रहेगा।