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SME IPO होंगे सस्ते? सेबी ला रहा बड़ा सुधार, डीलिस्टिंग से लेकर लिस्टिंग लागत तक बदल सकते हैं नियम

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सूत्रों के मुताबिक बाजार नियामक ऐसे उपायों पर विचार कर रहा है जिनसे एसएमई के लिए एक्सचेंजों तक पहुंच और सूचीबद्धता ढांचे का फायदा उठाना आसान हो जाए

Last Updated- July 09, 2026 | 10:55 PM IST
SEBI
प्रतीकात्मक तस्वीर

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) लघु एवं मझोले उद्यमों (एसएमई) के लिए दूसरे दौर के सुधारों पर विचार कर रहा है। इनमें अन्य सुधारों के साथ पूंजी जुटाने पर लागत कम करने उपाय, सूचीबद्धता समाप्त करने (डीलिस्टिंग) के लिए ढांचा और देश भर में एसएमई तक पहुंच बेहतर बनाना शामिल हैं।

सूत्रों के मुताबिक बाजार नियामक ऐसे उपायों पर विचार कर रहा है जिनसे एसएमई के लिए एक्सचेंजों तक पहुंच और सूचीबद्धता ढांचे का फायदा उठाना आसान हो जाए। सेबी ने नियामकीय ढांचे की समीक्षा के लिए दिसंबर 2025 में बाहरी विशेषज्ञों की एक सलाहकार समिति बनाई थी। समिति की सिफारिशों के आधार पर बाजार नियामक ने प्रतिभूति बाजार में एसएमई द्वारा पूंजी जुटाने के ढांचे के मूल्यांकन की इजाजत दे दी है।

इस मामले से वाकिफ लोगों के मुताबिक सेबी एसएमई से जुड़ी लागत जैसे मर्चेंट बैंकिंग की फीस और मार्केट-मेकिंग लागत आदि की समीक्षा कर रहा है। हालांकि, सेबी ने हेराफेरी रोकने के लिए अपनी निगरानी व्यवस्था मजबूत कर ली है। पिछले दो वर्षों में इससे जुड़े कई आदेश आए हैं। बाजार नियामक निष्क्रिय कंपनियों को हटाने के लिए एसएमई की सूचीबद्धता बिना किस समस्या के समाप्त करने के ढांचे पर भी विचार कर सकता है। सेबी इसलिए ऐसा कर रहा है क्योंकि ऐसी कंपनियां हेराफेरी का शिकार हो सकती हैं।

ऐसे कई एसएमई में फर्जीवाड़े एवं हेराफेरी की घटनाओं के बाद बाजार नियामक ने वित्तीय पहलुओं पर अधिक ध्यान देते हुए सूचीबद्धता से जुड़े नियम-कायदे सख्त कर दिए थे। इसने एसएमई के लिए मेनबोर्ड पर स्थानांतरित होने से जुड़े नियमों को भी मजबूत किया था।

हालांकि, कुछ विशेषज्ञ यह तर्क दे सकते हैं कि केवल मर्चेंट बैंकिंग फीस कम करने से मदद नहीं मिलेगी मगर नियामक भारत के विभिन्न क्षेत्रों के एसएमई को सूचीबद्धता ढांचा का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करने के उपायों पर भी विचार कर रहा है।

चार्टर्ड अकाउंटेंट मोहित बासेर ने कहा,‘मर्चेंट बैंकिंग की लागत कम करने या सीमित करने से शायद अधिक फायदा न हो। असल में इसका उल्टा असर भी हो सकता है क्योंकि संसाधन जुटाने और निर्गम प्रबंधित करने में लगने वाली मेहनत के मुकाबले कम फायदे को देखते हुए मर्चेंट बैंकर ऐसे सार्वजनिक निर्गमों से बच सकते हैं।’

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First Published - July 9, 2026 | 10:49 PM IST

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