बीएस बातचीत
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसानों का प्रदर्शन 20 दिन से जारी है। पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल का कहना है कि केंद्र सरकार ने एमएसपी पर मौखिक आश्वासन दिया है लेकिन सरकार की वास्तविक मंशा संदिग्ध बनी हुई है। उन्होंने दिलाशा सेठ और इंदिवजल धस्माना से साक्षात्कार में आशंका जताई कि फसलों की असीमित खरीद बंद होने के साथ ही किसानों का शोषण होगा तथा असमानता बढऩे के साथ ही देश में खाद्य असुरक्षा का संकट भी बढ़ेगा। बातचीत के संपादित अंश:
केंद्र ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) जारी रखने का आश्वासन दिया है। इन कानूनों को स्वीकार करने में अब क्या अड़चन है?
इतने बड़े आंदोलन के बाद अब मौखिक आश्वासन ही मिला है। यह भी संदेहास्पद है क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) सहित अधिकांश संस्थानों ने बार-बार दोहराया है कि एमएसपी प्रणाली को खत्म किया जाना चाहिए। केंद्र जो कह रहा है और उसके विभिन्न तंत्र क्या कर रहे हैं, इसमें अंतर है। डर यह है कि फ सलों की असीमित खरीद बंद हो जाएगी और जिस तरह से एमएसपी तय की जाएगी उससे किसानों की आमदनी पर बुरा असर पड़ेगा।
किसानों और केंद्र के बीच गतिरोध दूर करने के लिए क्या समाधान है?
जिन कानूनों को इन किसानों के लिए लाभदायक बताया जा रहा है अगर वे ही इसके खिलाफ हैं तब इन कानूनों को निरस्त करना ही एकमात्र समाधान है। इन कानूनों में इतने बदलावों का प्रस्ताव है कि मूल मकसद ही खो गया है। हमें एक नए कानून की आवश्यकता है जो इन मुद्दों को नए सिरे से देखे।
पंजाब ने राज्य में केंद्रीय कृषि कानूनों को निष्प्रभावी कर दिया है। किसान फिर भी इस कानून के खिलाफ क्यों हैं?
पंजाब को अब भी इसके लिए राज्यपाल और भारत के राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने राष्ट्रपति से मिलने से इनकार कर दिया। यह आंदोलन केंद्र द्वारा बनाए गए कानूनों के खिलाफ है, यह भारत सरकार द्वारा आजमाई गई एक प्रणाली को खत्म करने का प्रयास है। किसान जिन्हें इन कानूनों का लाभार्थी बताया जा रहा है, उनका ही मानना है कि केंद्र सरकार द्वारा कानून बनाने से पहले उनसे सलाह-मशविरा करने के उनके बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित कर दिया गया है। उनका यह डर सही है कि वक्त के साथ व्यापार की शर्तें और भी खराब होती जाएंगी।
क्या पंजाब द्वारा राज्य में केंद्रीय कानूनों को निष्प्रभावी करने का कदम अदालतों में कानून की कसौटी पर खरा उतरेगा?
यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है लेकिन एक निर्वाचित सरकार होने के नाते हम अपने किसानों के हितों की रक्षा करने के अपने अधिकारों का ही पालन कर रहे हैं और नए कानूनों के कुछ प्रावधान भारत के संविधान के अनुसार राज्य के दायरे में आते हैं।
किसानों का विरोध सिर्फ पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों तक ही सीमित क्यों है?
मीडिया ने ही कुछ ऐसी तस्वीर पेश की है जैसे कि विरोध केवल इन चार राज्यों तक ही सीमित है जबकि बात सिर्फ इतनी है कि इन राज्यों के किसान और किसान संगठनों ने इसकी अगुआई की है। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के किसानों को मंडियों के कामकाज से फायदा हुआ है और उन्हें अहसास है कि अगर उनका डर सच हो जाता है तो उन्हें क्या नुकसान होगा। भारत के अन्य भागों में किसानों ने मंडियों के संचालन और एमएसपी खरीद के लाभ का अनुभव नहीं किया है इसलिए वे मार्केटिंग के बुनियादी ढांचे में सार्वजनिक निवेश के फायदे को भी नहीं समझते हैं। देश के बाकी हिस्सों में पंजाब की मंडी प्रणाली की सफलता दोहराने के बजाय किसानों को कॉरपोरेट घरानों की मर्जी पर छोडऩे का प्रस्ताव दिया जा रहा है। हम भी निवेश के लिए कॉरपोरेट घरानों का स्वागत करते हैं लेकिन ऐसी प्रणाली नहीं बना सकते जहां किसानों का शोषण हो और असमानताएं बढ़ें।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि नए कृषि कानूनों में किसानों को अपनी उपज बेचने और आय बढ़ाने के लिए अधिक विकल्प उपलब्ध हैं। क्या पंजाब उन विकल्पों के खिलाफ है जो किसानों को दिए जा रहे हैं?
जिन संस्थाओं के हित इससे जुड़े हैं यह उनके द्वारा फैलाया जा रहा एक बड़ा झूठ है। सर छोटूराम ने 1938 में मंडी कानून बनाया जिससे किसानों को देश में कहीं भी अपनी उपज बेचने की आजादी थी लेकिन व्यापारियों को मंडी परिसर से ही उपज खरीदनी पड़ती थी और व्यापारियों पर राज्य का नियमन था। ये नए कानून किसानों को कहीं भी बेचने की स्वतंत्रता देने के बजाय वास्तव में व्यापारियों को किसान के खेत से खरीदने की स्वतंत्रता देते हैं। नए विकल्पों को छोड़ दें। केंद्र सरकार वास्तव में आजमाए हुए विकल्प को खत्म कर रही जिससे देश में एक बार फिर खाद्य असुरक्षा बढ़ेगी। मौजूदा व्यवस्था की वजह से ही भारत जैसे विशाल देश में आज लोग भूखे नहीं रहते। लोगों की आजीविका छीनना, किसानों को कंगाल करना, राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा को खतरे में डालना निंदनीय। मौजूदा मंडी प्रणाली में भी विकल्प दिया जा सकता है। नए कानूनों में कारोबारियों को विनियमित करने और जवाबदेही के दायरे से मुक्त कर दिया गया है। ये कानून पारदर्शी नहीं हैं और किसानों को दीवानी अदालत से कानूनी सहारा लेने से भी रोकते हैं। जब बिक्री लेन-देन दर्ज नहीं किए जाएगा जैसा कि इस कानून के मुताबिक होगा तब सरकार कोई डेटा हासिल करने की स्थिति में ही नहीं होगी जिससे कि वह कोई फैसला ले सके। जब व्यापारी खेतों से उपज खरीदेंगे तब वे किसी नियमन के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे और वे मंडियों में आने से मना कर देंगे तब मंडी विफल हो जाएगी। मंडी मूल्य प्राप्ति के लिए एक मंच देती है और जब वह बंद होगा तब किसानों को नुकसान होगा।
अगर मंडी के लेन-देन को कर के दायरे में लाया जाता है तो क्या इससे किसानों की एक प्रमुख मांग पूरी होगी? हालांकि पंजाब में मंडी कर ज्यादा है तो क्या इसे और कम किया जाएगा?
किसान मंडी शुल्क का भुगतान नहीं करते हैं। खरीदार इनका भुगतान करते हैं। मंडी मार्केटिंग और ग्रामीण बुनियादी ढांचे के निर्माण और रखरखाव के लिए एक निश्चित कमीशन वसूलती है। पंजाब में देश का सबसे अच्छा मार्केटिंग बुनियादी ढांचा है और इसे बनाए रखना होगा। हमने कुछ वस्तुओं के लिए शुल्क कम कर दिए हैं मसलन फल और सब्जियां ताकि विविधता को बढ़ावा दिया जा सके। मंडियों में सुधार की जरूरत है। पंजाब ने शुरुआत की है और इस साल की शुरुआत में कानून में बदलाव किया गया था ताकि व्यापारी ट्रेडिंग लाइसेंस के लिए ऑनलाइन आवेदन देकर लाइसेंस ले सकें और राज्य में कहीं भी व्यापार कर सकें।
कुछ का कहना है कि किसानों के विरोध को अतिवादी भुना रहे हैं। आपका इन आरोपों पर क्या कहना है?
जब आपके पास कोई तर्क नहीं है और आपको पता है कि प्रदर्शनकारियों ने आपकी साजिश को उजागर किया है तो सबसे आसान तरीका है कि उन पर आरोप लगाए जाएं। एक दिन वे आरोप लगाते हैं कि दक्षिणपंथी लोगों का इस आंदोलन पर दबदबा है दूसरे दिन उनका आरोप है कि वामपंथी लोगों का दबदबा है। इन आरोपों से स्थिति सख्त हो जाएगी। इसके बजाय केंद्र को अपनी बयानबाजी में नरमी बरतने की जरूरत है। मेरा सुझाव है कि उन्हें विरोध प्रदर्शन वाली जगहों पर जाने और किसानों से बात करने की जरूरत है।
केंद्र ने विवाद समाधान तंत्र पर मोटे तौर पर सहमति जताई है। आप उसमें और परिवर्तन करने का सुझाव देते हैं?
केंद्र का विवाद समाधान तंत्र कहां है? जब किसान रेल पटरियों पर विरोध कर रहे थे तब उन्होंने किसानों से बात तक नहीं की। अब भी यह स्पष्ट नहीं है कि केंद्र की ओर से वार्ता का नेतृत्व कौन कर रहा है। पहले कृषि मंत्री बात कर रहे थे अब इस भूमिका में गृह मंत्री आ गए हैं। इससे पहले रक्षा मंत्री और रेल मंत्री भी वार्ता में शामिल थे। इससे साफ है कि केंद्र के पास कोई प्रक्रिया या तंत्र नहीं है। दृष्टिकोण यही है कि इसको टाला जाए ताकि विरोध-प्रदर्शन फीका पड़ जाए लेकिन इस बार यह कारगर नहीं हो रहा है।