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India’s first hydrogen train: ‘आत्मनिर्भर भारत’ की ओर बड़ा कदम, जानिए देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन की पूरी डीटेल

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भारतीय रेलवे अब प्रदूषण मुक्त और टिकाऊ यात्रा की ओर एक बड़ा कदम उठा रहा है। दुनियाभर में 'हाइड्रोजन फ्यूल सेल' तकनीक को पेट्रोल-डीजल का एक बेहतर विकल्प माना जा रहा है

Last Updated- July 17, 2026 | 1:34 PM IST
Hydrogen train
भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन (फोटो: रेल मंत्रालय एक्स हैंडल)

India’s first hydrogen train: दुनियाभर में ‘हाइड्रोजन फ्यूल सेल’ तकनीक को पेट्रोल-डीजल का एक बेहतर विकल्प माना जा रहा है। भारत ने भी इस दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (17 जुलाई) को जींद-सोनीपत रूट पर देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इसके साथ ही भारत ने स्वच्छ ईंधन पर सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने की प्रति​बद्धता दिखाई है। यह पूरी तरह से भारत में ही डिजाइन और विकसित की गई है, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को साकार करती है।

देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को रेल मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत रिसर्च, डिजाइन एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइजेशन (RDSO) की ओर से तैयार किए गए डिजाइनों और तकनीकी मानकों के अनुसार डेवलप किया गया है। इस प्रोजेक्ट में हाइड्रोजन को भरने और स्टोर करने के लिए खास इंतजाम किए गए हैं। यह एक पायलट प्रोजेक्ट है, जिससे यह पता चलेगा कि भारत में हाइड्रोजन ट्रेनें कितनी सफल हो सकती हैं।

Jind-Sonipat Hydrogen Train: खास बातें

1. यह 10 डिब्बों वाली हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन है।
2. यह 1200 किलोवाट (kW) की हाइड्रोजन फ्यूल सेल पावर से चलती है।
3. इसकी अधिकतम रफ्तार 75 किमी प्रति घंटा तय की गई है, जबकि इसकी डिजाइन स्पीड 110 किमी प्रति घंटा है।
4. इस ट्रेन में लगभग 2,600 यात्री एक साथ यात्रा कर सकते हैं।
5. इसे डिजाइन करने से लेकर इसका प्रोटोटाइप बनाने तक का पूरा काम भारत में हुआ है।
6. ट्रेन जींद जंक्शन, गोहाना जंक्शन और सोनीपत के बीच चलेगी और रास्ते में आने वाले छोटे स्टेशनों पर भी रुकेगी।
7. प्रस्तावित स्टेशन: जींद सिटी, पांडु पिंडारा जंक्शन, ललित खेड़ा हॉल्ट, भंभेवा, ईसापुर खेड़ी हॉल्ट, बुटाना हॉल्ट, खंदराई हॉल्ट, राबराह हॉल्ट, लाठ हॉल्ट, मोहाना, बरवासनी हॉल्ट और सोनीपत न्यू।

Also Read: Hydrogen Train: 75 KM की रफ्तार से दौड़ेगी भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन

क्या है हाइड्रोजन ट्रेन की तकनीक?

दरअसल, हाइड्रोजन से ट्रेन के अंदर ही बिजली बनती है, जिससे यह चलती है। हाइड्रोजन ट्रेन बिजली पैदा करने के लिए एक खास रासायनिक प्रक्रिया का उपयोग करती है। इसमें ‘प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन फ्यूल सेल’ (PEMFC) तकनीक का इस्तेमाल होता है।

इस तकनीक में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच एक रिएक्शन होता है, जिससे बिजली बनती है। इस पूरी प्रक्रिया में कोई धुआं नहीं निकलता, बल्कि सिर्फ पानी की भाप और थोड़ी सी गर्मी बाहर निकलती है। इसीलिए यह पर्यावरण के लिए बिल्कुल सुरक्षित है।

हाइड्रोजन ही क्यों?

हाइड्रोजन में बहुत अधिक ऊर्जा होती है। उदाहरण के लिए, हाइड्रोजन में 120 MJ/Kg ऊर्जा होती है, जबकि डीजल में सिर्फ 43 MJ/Kg। इसका मतलब है कि कम ईंधन में ट्रेन ज्यादा दूर तक जा सकती है। यह आज के समय में रेल परिवहन के लिए सबसे साफ और प्रदूषण मुक्त तकनीक है। इसमें टूट-फूट कम होती है और यह पर्यावरण को नुकसान भी नहीं पहुंचाती।

अत्याधुनिक सुरक्षा तकनीक से लैस

भारतीय रेलवे ने हाइड्रोजन ट्रेन के संचालन के लिए सुरक्षा का एक बहुत ही मजबूत और व्यापक ढांचा तैयार किया है। इसके अंतर्गत हाइड्रोजन को स्टोर करने, उसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाने और उसके इस्तेमाल से जुड़ी हर प्रक्रिया की लगातार निगरानी की जाती है। इस काम के लिए रेलवे ने खास ‘स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर’ बनाए हैं और समय-समय पर ऑडिट की व्यवस्था भी की है।

हाइड्रोजन ट्रेन की देखरेख के लिए दिल्ली के शकूरबस्ती में विशेष रखरखाव केंद्र तैयार किया गया है, जहां केवल प्रशिक्षित और प्रमाणित कर्मचारी ही काम करेंगे। शुरुआती दौर में ट्रेन के साथ तकनीकी स्टाफ भी मौजूद रहेगा और हाइड्रोजन भरने की पूरी प्रक्रिया पर 24 घंटे निगरानी रखी जाएगी।

सुरक्षा के मामले में ट्रेन में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। ट्रेन के प्रोडक्शन, स्टोरेज और रिफिलिंग सेंटर्स पर हाइड्रोजन लीक का पता लगाने वाले सेंसर्स और आग को पहचानने वाले ‘फ्लेम डिटेक्टर्स’ लगाए गए हैं। इन सुरक्षा सेंसरों की नियमित जांच और सफाई की जाती है।

ट्रेन के अंदर हवा का आवागमन लगातार बना रहे, इसके लिए खास वेंटिलेशन सिस्टम लगाया गया है। अगर सिस्टम में गर्मी, आग या धुएं जैसी कोई भी असामान्य चीज महसूस होती है, तो ट्रेन का सिस्टम अपने आप हाइड्रोजन की सप्लाई को बंद कर देता है।

इसके अलावा, लोको पायलट के केबिन में एक खास स्क्रीन लगाई गई है, जिससे पायलट को पूरी ट्रेन की स्थिति की जानकारी हर समय मिलती रहती है। किसी भी आपातकालीन स्थिति में ट्रेन को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए केबिन में एक स्पेशल मोड भी दिया गया है, ताकि सुरक्षा के साथ कोई समझौता न हो।

ये भी पढ़ें… देश को मिली पहली Hydrogen Train; जींद-सोनीपत के बीच की दूरी करेगी तय, पीएम मोदी ने दिखाई हरी झंडी

जींद में बना रिफ्यूलिंग स्टेशन

हाइड्रोजन ट्रेन के लिए हाइड्रोजन की सप्लाई सुनि​श्चित करने के लिए भारतीय रेलवे ने जींद (हरियाणा) में भारत का सबसे बड़ा ‘रेलवे हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग स्टेशन’ बनाया है। यह स्टेशन तीन चरणों में काम करता है। सबसे पहले, यहां बिजली का उपयोग करके पानी से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अलग किया जाता है (इसे ‘इलेक्ट्रोलेसिस’ कहते हैं)। इस प्रक्रिया से बनी हाइड्रोजन को सुरक्षित टैंकों में स्टोर कर लिया जाता है।

दूसरे चरण में, हाइड्रोजन को बहुत अधिक दबाव (500 बार) पर कंप्रेस किया जाता है, ताकि कम जगह में ज्यादा हाइड्रोजन जमा की जा सके। आखिरी चरण में, दो अलग-अलग डिस्पेंसरों की मदद से ट्रेन में हाइड्रोजन भरी जाती है। यहां 350 बार के नियंत्रित दबाव पर ईंधन भरा जाता है, जिससे ट्रेन के दोनों पावर कारों में एक साथ हाइड्रोजन भरी जा सकती है और ट्रेन का रुकने का समय कम हो जाता है।

सुविधा एक बार में लगभग 3,000 किलो हाइड्रोजन स्टोर कर सकती है, जो ट्रेन के नियमित संचालन के लिए पर्याप्त है। इस पूरी स्टोरेज और सप्लाई सिस्टम को ‘पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव्स सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन’ (PESO) से सुरक्षा की मंजूरी भी मिली हुई है।

सस्टेनेबल रेल यात्रा की ओर एक बड़ा कदम

हाइड्रोजन ट्रेन सिर्फ एक नई ट्रेन की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह भविष्य में हाइड्रोजन से चलने वाली रेल सेवाओं के लिए एक पूरी व्यवस्था और मजबूत ढांचा तैयार कर रही है। यह प्रोजेक्ट हमें यह समझने में मदद करेगा कि इस तकनीक को कैसे इस्तेमाल करना है, ट्रेन का रखरखाव कैसे करना है और इसके नियम क्या होने चाहिए। इससे भविष्य में बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन ट्रेनों को चलाने के लिए जरूरी तकनीकी मजबूती मिलेगी।

यह पहल भारत सरकार के ‘नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन’ और ‘नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन’ के लक्ष्य को पूरा करने में बहुत सहायक है। जैसे-जैसे भारतीय रेलवे आधुनिक हो रही है, यह प्रोजेक्ट भविष्य में और अधिक हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की नींव रख रहा है। कुल मिलाकर, यह कदम भारत में परिवहन प्रणाली को और अधिक सुरक्षित, आधुनिक और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में एक बहुत महत्वपूर्ण शुरुआत है।

दुनिया के मुकाबले भारत कहां है?

दुनियाभर में हाइड्रोजन ट्रेनों की तकनीक अभी शुरुआत (नये दौर) में है। जर्मनी पहला ऐसा देश है जिसने हाइड्रोजन से चलने वाली पैसेंजर ट्रेनों की व्यावसायिक शुरुआत की है। इसके अलावा फ्रांस, इटली, चीन और जापान जैसे देश भी इस पर काम कर रहे हैं, लेकिन उनकी ट्रेनें आमतौर पर केवल 2 से 4 डिब्बों वाली होती हैं और वे मुख्य रूप से छोटे रूटों पर चलती हैं।

इस मामले में भारत की हाइड्रोजन ट्रेन तकनीक और आकार (scale), दोनों में बहुत आगे और महत्वाकांक्षी है। सिर्फ ट्रेन ही नहीं, भारत ने जींद में देश का सबसे बड़ा ‘हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग स्टेशन’ भी बनाया है। इस तरह भारत ने केवल ट्रेन ही नहीं, बल्कि हाइड्रोजन से जुड़ी पूरी व्यवस्था (इकोसिस्टम) तैयार की है, जिसमें ट्रेन, ईंधन भरने की सुविधा, सुरक्षा के कड़े इंतजाम और संचालन के नियम शामिल हैं।

हाइड्रोजन ट्रेन पर्यावरण के अनुकूल

हाइड्रोजन ट्रेन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें ‘जीरो टेलपाइप एमिशन’ होता है, यानी ट्रेन के पीछे से कोई धुआं नहीं निकलता। डीजल इंजनों के विपरीत, जो कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और काला धुआं छोड़ते हैं, हाइड्रोजन फ्यूल सेल से केवल शुद्ध पानी की भाप और थोड़ी सी गर्मी बाहर निकलती है। इसके अलावा, यह ट्रेन चलते समय बहुत कम आवाज करती है, जिससे पटरियों के आसपास रहने वाले लोगों को शोर-शराबे से बड़ी राहत मिलेगी।

हालांकि, एक जरूरी बात यह है कि हाइड्रोजन ट्रेन तभी पूरी तरह ‘ग्रीन’ (पर्यावरण के अनुकूल) मानी जाएगी जब उसे बनाने में इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा भी साफ-सुथरी हो। यदि हाइड्रोजन को कोयले या जीवाश्म ईंधन से बनाया जाए, तो प्रदूषण कम नहीं होगा। इसीलिए, भारत सरकार ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ पर जोर दे रही है। इसमें सौर ऊर्जा जैसे प्राकृतिक और रिन्यूएबल सोर्सेज का उपयोग करके पानी से हाइड्रोजन अलग की जाती है, जिससे यह तकनीक वास्तव में पर्यावरण को बचाने में मददगार साबित होती है।

भारत में हाइड्रोजन ट्रेनों का भविष्य

जींद-सोनीपत प्रोजेक्ट से जो अनुभव मिलेगा, उसका उपयोग करके भारतीय रेलवे अब ‘हेरिटेज रूट्स’ पर भी हाइड्रोजन तकनीक लाने की योजना बना रही है, जैसेकि कालका-शिमला रेलवे रूट। ये कदम यह दिखाते हैं कि भारतीय रेलवे अब सिर्फ एक छोटे प्रयोग (पायलट प्रोजेक्ट) से आगे बढ़कर एक बड़े राष्ट्रीय कार्यक्रम की तरफ बढ़ रही है। यह पहल न केवल टिकाऊ परिवहन में भारत को दुनिया का लीडर बनाएगी, बल्कि ‘नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन’ और भारत के ‘नेट जीरो’ (प्रदूषण मुक्त) लक्ष्य को पूरा करने में भी बड़ी भूमिका निभाएगी।

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First Published - July 17, 2026 | 1:27 PM IST

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