दुनिया भर में भले ही एस्ट्राजेनेका-ऑक्सफर्ड टीके की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं लेकिन भारत में देशव्यापी टीका अभियान जारी रखने के लिए इस टीके को सुरक्षित पाया। एस्ट्राजेनेका-ऑक्सफ र्ड टीके का निर्माण पुणे की कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया कर रही है जो मात्रा के लिहाज से दुनिया की सबसे बड़ी टीका निर्माता कंपनी है। टीकाकरण के बाद राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली किसी विपरीत घटनाओं (एईएफ आई) से जुड़ी समिति के एक वरिष्ठ सदस्य ने कहा कि टीकाकरण के बाद मरे लोगों की 38 ऑटप्सी रिपोर्टों के अध्ययन में कुछ भी ऐसा नहीं मिला जिससे उनके मरने या किसी प्रतिकूल स्थिति के पैदा होने का संबंध टीकाकरण से हो। 2008 के बाद से एईएफ आई समिति से जुड़े रहे व्यक्ति ने कहा, ‘अब तक 71 मौतें हुईं हैं। हमें अब तक 38 ऑटप्सी रिपोर्ट मिली है। यह साबित करने के लिए कोई तथ्य मौजूद नहीं हैं कि इनका ताल्लुक टीकाकरण से है।’
उन्होंने यह भी कहा कि टीकाकरण के बाद प्रतिकूल घटनाओं की समीक्षा एक निरंतर प्रक्रिया है और देश में पोलियो, खसरा सहित प्रत्येक टीके लगाए जाने के बाद इसका पालन किया जाता है। उनका कहना है, ‘कोविशील्ड और कोवैक्सीन के लिए यह समीक्षा जारी रहेगी। हम एक या दो दिन में विस्तृत समीक्षा रिपोर्ट पेश करने की उम्मीद करते हैं।’ इस बीच, नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) वी के पॉल ने कहा कि जहां तक खून के थक्के बनने जैसी घटनाओं का एस्ट्राजेनेका के साथ संबंध होने को लेकर चिंताएं थीं उस पर यूरोपियन मेडिकल एजेंसी (ईएमए) ने कहा है कि टीकाकरण अभियान को रोकना एहतियाती उपाय है।
पॉल ने देश में कोविड की स्थिति का साप्ताहिक ब्योरा देते हुए कहा, ‘भारत के समूह के संज्ञान में भी यह मुद्दा पिछले कुछ दिनों में आया है और यह सुनियोजित तरीके से इस मामले पर नजर रख रहा है। हमें इस संबंध में कोई चिंताजनक संकेत नहीं मिले है। कोविशील्ड के साथ हमारा टीकाकरण कार्यक्रम पूरे उत्साह के साथ चलेगा।’ पॉल ने यह भी कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कहा है कि इस मुद्दे की जांच होनी चाहिए लेकिन टीकाकरण का दायरा बढ़ाने की प्रक्रिया निलंबित नहीं की जानी चाहिए। वह कहते हैं, ‘हम इसके प्रति सजग है ताकि हमारे पास उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर इस चिंता का समाधान किया जाए। हम मिल रही जानकारी पर भी नजर बनाए हुई हैं।’ विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अधिकारी ने भी बुधवार को कहा कि भले ही स्वास्थ्य अधिकारियों को लग रहा हो कि खून के थक्के और एस्ट्राजेनेका टीके के बीच एक संबंध है लेकिन ऐसे मामले बेहद ‘दुर्लभ’ हैं। डब्ल्यूएचओ की एक समिति इस मुद्दे पर विचार कर रही है। संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य एजेंसी और ईएमए भी खून के थक्के और एस्ट्राजेनेका टीके के बीच संबंध होने की संभावनाओं की जांच कर रहे हैं।
फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, डेनमार्क, नॉर्वे, आइसलैंड, ऑस्ट्रिया, एस्टोनिया, बुल्गारिया, रोमानिया, लिथुआनिया, लक्जमबर्ग और लातविया सहित कई यूरोपीय देशों ने टीके के इस्तेमाल को ‘एहतियाती उपाय’ केतौर पर अस्थायी रूप से रोक दिया है। ये देश ईएमए की जांच के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं। इससे पहले के सप्ताह में एस्ट्राजेनेका ने कहा कि यूरोपीय संघ और ब्रिटेन में 1.7 करोड़ से अधिक लोगों के टीका लगाए जाने के बाद मिले सुरक्षा डेटा की सावधानी से की गई समीक्षा के बाद टीके की वजह से सांस लेने में तकलीफ, नसों में खून के थक्के जमने या थ्रोम्बोसाइटोपेनिया के बढ़ते जोखिम का कोई सबूत नहीं मिला है। मुंबई के एक वरिष्ठ डॉक्टर कोविड-19 से जुड़े राज्यों के कार्यबल का हिस्सा हैं और वह टीकाकरण प्रक्रिया की बारीकी से निगरानी कर रहे हैं। उनका कहना है कि नागरिकों के बीच खून के थक्के बनने के मामले आम हैं।
उन्होंने कहा, ‘हमने भारत में 2 करोड़ से अधिक लोगों को टीका लगाया है और कुछ लोग पहले से ही किसी अन्य बीमारी से ग्रस्त हो सकते हैं। हमारे अस्पताल के दो केंद्रों पर रोजाना 1,000 से अधिक लोगों को टीका लगाया जा रहा है। मुझे अब तक किसी भी प्रतिकूल घटना की जानकारी नहीं मिली है।’