देश में बीमा अंककों की संख्या काफी कम है और यह हमारे जैसे आकार वाले देश के लिहाज से उपयुक्त नहीं है। इसलिए देश में शीघ्र अति शीघ्र बीमा अंककों की संख्या को बढ़ाकर कम से कम 1,000 से 1,200 करने की जरूरत है। यह बात भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) के चेयरमैन सुभाष चंद्र खूंटिया ने कही है। फिलहाल देश में केवल 458 पूर्ण विकसित बीमा अंकक हैं। 2019 में यह संख्या 439 थी और एक साल में महज 19 और बीमा अंकक जुड़े हैं।
बीमा अंकक का कार्य वित्त निवेशों और अन्य दूसरे संभावित जोखिम वाले उद्यमों के जोखिमों का आकलन और प्रबंधन करना होता है। बीमा उद्योग में जोखिम अंकन के तहत जीवन प्रत्याशा से जुड़े विभिन्न कारकों का विश्लेषण, मृत्यु दर तालिका तैयार कना आदि होता है जिससे अनुमान का पता चल पाता है।
खूंटिया ने कहा, ‘यदि हम देश में बीमा अंककों की संख्या पर गौर करें तो यह हमारे जैसे देश के आकार वाले के लिए उपयुक्त नहीं है। फिलहाल देश में केवल 458 पूर्ण तरह से विकसित बीमा अंकक हैं। इसके अलावा इस क्षेत्र में बीमा अंककों की संख्या बेमेल तरीके से बिखरा हुआ है। सामान्य बीमा विशेषज्ञता वाले बीमा अंककों संख्या कम है।’
उन्होंने कहा, ‘हमारे पास जितनी संख्या में बीमा कंपनियां हैं और जितना बड़ा हमारा बीमा कारोबार है वह वैश्विक बीमा उद्योग का 1.7 फीसदी है, इसको मद्देनजर रखते हुए इस तथ्य पर विचार करें कि वैश्विक स्तर पर 60,000 बीमा अंकक हैं, तो उस लिहाज से मुझे लगता है कि देश में शीघ्र अति शीघ्र हमारे पास कम से कम 1,000-1,200 बीमा अंकक होने चाहिए।’
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि कभी कभी नियामक को बीमा उद्योग में जरूरी संख्या में बीमा अंकक नहीं मिल पाते हैं।
आभासी रूप से आयोजित बीमा अंकक कॉनक्लेव 2021 में बोलते हुए खूंटिया ने कहा कि बीमा उद्योग द्वारा आईएफआरएस 17 लेखांकन प्रणाली में बदलाव करने की जरूरत है। पिछले वर्ष आईआरडीएआई ने अंतरराष्ट्रीय वित्त रिपोर्टिंग मानक 17 (आईएफआरएस 17) में इंटरनैशनल अकाउंटिंग स्टैंडड्र्स बोर्ड (आईएएसबी) द्वारा अंतिम संशोधन जारी करने तक बीमा क्षेत्र में भारतीय लेखांकन मानकों के क्रियान्वयन को टाल दिया था।
नियामक ने 1 अप्रैल, 2020 के बाद से आईएफआरएस 17 के समतुल्य भारतीय लेखांकन मानक 117 और भारतीय लेखांकन मानक 109 के क्रियान्वयन की योजना बनाई थी लेकिन आईएएसबी ने आईएफआरएस 17 में संशोधन करने का निर्णय ले लिया। नियामक बीमा क्षेत्र में जोखिम आधारित ऋण शोधन क्षमता लाने की प्रक्रिया में भी है। फिलहाल बीमाकर्ताओं को अपनी देयताओं की 1.5 गुना संपत्ति रोक कर रखने की जरूरत है। लेकिन एक बार जोखिम आधारित पूंजी फ्रेमवर्क की व्यवस्था आ जाने पर बीमाकर्ताओं को अपने कारोबार के अनुपात में ही पूंजी रखनी पड़ेगी। यदि वे अधिक जोखिम वाले कारोबार में हैं तो उन्हें अधिक पूंजी रोक कर रखने की आवश्यकता होगी।