US-Iran Talks: इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई सीधी बातचीत बेनतीजा खत्म हो गई। रविवार को करीब 21 घंटे तक चली इस लंबी बैठक के बाद भी दोनों पक्ष किसी समझौते पर नहीं पहुंच सके। पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई यह वार्ता काफी अहम मानी जा रही थी, क्योंकि दो हफ्ते पहले ही संघर्ष पर अस्थायी विराम लगा था और आगे की रणनीति इसी बातचीत से तय होनी थी।
अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बातचीत का नेतृत्व किया। बैठक के बाद उन्होंने मीडिया को बताया, “खराब खबर यह है कि हम किसी समझौते पर नहीं पहुंच सके और मुझे लगता है कि यह अमेरिका से ज्यादा ईरान के लिए बुरी खबर है। हमने अपनी रेड लाइन्स साफ कर दी हैं।”
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय बाद उच्च स्तर की बातचीत हुई, जिसने दोनों देशों के रिश्तों में नई हलचल पैदा कर दी है। यह वार्ता 1979 Islamic Revolution के बाद अब तक की सबसे अहम कूटनीतिक पहल मानी जा रही है।
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई J.D. Vance ने की। उनके साथ Jared Kushner और Steve Witkoff भी शामिल रहे। वहीं, ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष Mohammad Bagher Ghalibaf ने 71 सदस्यीय टीम का नेतृत्व किया।
दोनों पक्षों के बीच कई दौर की लंबी और गहन बातचीत हुई। इन चर्चाओं में कई अहम मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया, जिससे साफ है कि दांव काफी बड़े थे और हालात भी जटिल बने हुए हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच हुई लंबी बातचीत में सबसे बड़ा विवाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सामने आया। खास तौर पर यूरेनियम संवर्धन का मुद्दा दोनों देशों के बीच सहमति बनने में सबसे बड़ी बाधा बना रहा।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति के मुताबिक, वाशिंगटन चाहता था कि ईरान साफ तौर पर यह भरोसा दे कि वह न तो परमाणु हथियार बनाएगा और न ही ऐसी क्षमता विकसित करेगा जिससे वह तेजी से परमाणु हथियार तैयार कर सके। वेंस ने कहा कि कई घंटों की बंद कमरे में बातचीत के बाद भी अमेरिका इसी ठोस आश्वासन पर अड़ा रहा।
यह मांग अमेरिका के 10 सूत्रीय शांति प्रस्ताव का हिस्सा थी। यह रुख अमेरिका की पुरानी चिंता को दर्शाता है, जिसे राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप भी कई बार उठा चुके हैं।
वहीं, ईरान ने अमेरिकी शर्तों को जरूरत से ज्यादा सख्त बताया। ईरान की तस्नीम न्यूज एजेंसी के अनुसार, अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़े मुद्दों और परमाणु सामग्री हटाने जैसे प्रस्ताव भी रखे। ईरान का कहना है कि ये मांगें उन सीमाओं से आगे हैं, जिन्हें अमेरिका पहले हासिल नहीं कर सका था।
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वार्ता विफल होने के बाद अमेरिका की ओर से स्पष्ट संदेश सामने आया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने कहा कि बातचीत काफी लंबी और गंभीर रही, लेकिन आखिरकार किसी नतीजे तक नहीं पहुंच सकी।
उन्होंने बताया कि कई मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच सार्थक चर्चा हुई, लेकिन अहम मतभेद दूर नहीं हो पाए। अमेरिका ने अपने रुख और शर्तें साफ तौर पर सामने रखीं, साथ ही कुछ मामलों में लचीलापन भी दिखाया। इसके बावजूद ईरान ने इन शर्तों को स्वीकार नहीं किया।
वेंस के मुताबिक, अमेरिकी टीम ने पूरी कोशिश की और बातचीत के दौरान काफी सहयोगी रुख अपनाया, लेकिन कोई ठोस प्रगति नहीं हो सकी। उन्होंने कहा, “हम ऐसी स्थिति तक नहीं पहुंच पाए जहां ईरान हमारी शर्तों को मानने को तैयार हो।”
उन्होंने यह भी बताया कि बातचीत के दौरान उनकी लगातार संपर्क में Donald Trump से बातचीत होती रही। 21 घंटे चली इस मैराथन वार्ता के दौरान उन्होंने कई बार ट्रंप से चर्चा की।
वेंस ने कहा कि अमेरिका ने अपना “अंतिम और सर्वोत्तम प्रस्ताव” सामने रख दिया है। अब यह ईरान पर निर्भर करता है कि वह इसे स्वीकार करता है या नहीं। बातचीत को आगे बढ़ाने के संकेत भी फिलहाल नहीं दिए गए हैं और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल वॉशिंगटन लौट गया।
अमेरिका की ओर से समझौते का संकेत मिलने के कुछ ही समय बाद ईरान ने साफ कर दिया कि बातचीत किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बताया कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत के दौरान कई संदेशों और दस्तावेजों का आदान-प्रदान हुआ, लेकिन सहमति नहीं बन पाई।
बकाई के मुताबिक, पिछले 24 घंटों में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, परमाणु कार्यक्रम, युद्ध क्षतिपूर्ति, प्रतिबंधों को हटाने और क्षेत्र में जारी संघर्ष को पूरी तरह खत्म करने जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि इस कूटनीतिक प्रक्रिया की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि दूसरा पक्ष कितनी गंभीरता और ईमानदारी दिखाता है। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि ईरान अपने वैध अधिकारों से पीछे नहीं हटेगा।
वहीं, ईरान के सरकारी प्रसारक आईआरआईबी ने टेलीग्राम पर बताया कि ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने करीब 21 घंटे तक लगातार बातचीत की और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हर संभव कोशिश की। इसके बावजूद अमेरिकी पक्ष की ‘अतार्किक मांगों’ के कारण बातचीत आगे नहीं बढ़ सकी और अंततः वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म हो गई।
संघर्ष को लेकर चल रही बातचीत बेनतीजा खत्म होने के बाद अब हालात फिर से अनिश्चित हो गए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सीजफायर कायम रह पाएगा और क्या दोनों पक्ष दोबारा बातचीत की मेज पर लौटेंगे।
अमेरिका के नेता वेंस के बयान से संकेत मिलते हैं कि फिलहाल नई बातचीत की गुंजाइश कम है। उन्होंने अमेरिकी प्रस्ताव को अंतिम बताया है। हालांकि, कई जानकार अब भी मानते हैं कि कूटनीति के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं।
एशिया पैसिफिक फाउंडेशन के नॉन-रेजिडेंट सीनियर फेलो माइकल कुगेलमैन का कहना है कि अमेरिका पर घरेलू राजनीतिक दबाव है कि वह इस संघर्ष से बाहर निकलने के लिए कोई समझौता करे। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान में अमेरिकी उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि वॉशिंगटन अभी बातचीत के लिए प्रतिबद्ध है। कुगेलमैन के मुताबिक आगे और बातचीत हो सकती है, लेकिन यह साफ नहीं है कि वह पाकिस्तान में होगी या किसी और जगह।
बातचीत के टूटने का असर वैश्विक बाजारों पर भी दिख सकता है। खासकर तेल और गैस बाजार में तेज उतार-चढ़ाव की संभावना है। इसके अलावा, किसी ठोस कूटनीतिक समाधान के न निकलने से निवेशकों का भरोसा भी प्रभावित हो सकता है।