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Iran-Israel conflict: इजरायल-ईरान टकराव से तेल बाजार में भूचाल, भारत की जेब पर कितना पड़ेगा असर?

इजरायल और ईरान के बढ़ते तनाव से होर्मुज जलडमरूमध्य पर खतरा मंडरा रहा है, जिससे वैश्विक तेल कीमतों में उछाल और भारत के आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है।

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सुधीर पाल सिंह   
Last Updated- March 01, 2026 | 10:52 AM IST

Iran-Israel conflict: पश्चिम एशिया में इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता टकराव वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए नई चिंता लेकर आया है। यदि हालात और बिगड़ते हैं तो कच्चे तेल और एलएनजी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है। इसका सीधा प्रभाव भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों पर पड़ेगा, जहां कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य की अहमियत

भारत को प्रतिदिन करीब 2.6 मिलियन बैरल कच्चा तेल पश्चिम एशियाई देशों से मिलता है। इनमें इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं। इन देशों से आने वाला अधिकांश तेल Strait of Hormuz से होकर गुजरता है। यह जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की दृष्टि से बेहद संवेदनशील मार्ग है, क्योंकि दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत पेट्रोलियम तरल पदार्थ और 20 प्रतिशत एलएनजी की आवाजाही इसी रास्ते से होती है।

यदि इस मार्ग में किसी तरह की रुकावट आती है या जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ेगी और कीमतों में तेजी आ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही वास्तविक आपूर्ति बाधित न हो, लेकिन केवल भू-राजनीतिक जोखिम के कारण ही कच्चे तेल की कीमतों में प्रीमियम जुड़ सकता है।

भारत पर संभावित आर्थिक दबाव

ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का मतलब भारत के लिए अधिक आयात बिल है। इससे रुपये पर दबाव बढ़ सकता है और राजकोषीय संतुलन प्रभावित हो सकता है। साथ ही, शिपिंग और बीमा लागत में वृद्धि से तेल की अंतिम लागत और बढ़ जाएगी।

वर्तमान में ब्रेंट क्रूड की कीमतें हालिया तनाव के कारण 65 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 72 से 73 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच चुकी हैं। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है और अन्य तेल उत्पादक देशों की उत्पादन इकाइयां भी प्रभावित होती हैं, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

वित्त वर्ष 2024-25 में भारत के लगभग 50 प्रतिशत कच्चे तेल और 54 प्रतिशत एलएनजी आयात इसी मार्ग से होकर आए थे। ऐसे में लंबे समय तक अवरोध देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकता है।

आपूर्ति बनाए रखने के विकल्प

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपने आयात स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में काम किया है। आपात स्थिति में देश अपने सामरिक पेट्रोलियम भंडार का उपयोग कर सकता है। इसके अलावा अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों से अतिरिक्त खरीद की जा सकती है।

हालांकि, इन वैकल्पिक स्रोतों से आने वाले तेल को भारत पहुंचने में अधिक समय लगता है और समुद्री भाड़ा भी ज्यादा पड़ता है। पश्चिम एशिया से तेल सामान्यतः पांच से सात दिन में भारत पहुंच जाता है, जिससे वह लॉजिस्टिक दृष्टि से अधिक सुविधाजनक है।

विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि रूसी कच्चे तेल की कुछ खेपें इस समय हिंद महासागर और अरब सागर क्षेत्र में तैरती हुई स्थिति में हैं। जरूरत पड़ने पर इन्हें अल्पकालिक आपूर्ति के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

क्या लंबा चलेगा संकट

विश्लेषकों का आकलन है कि पूर्ण नाकाबंदी की संभावना फिलहाल कम है, क्योंकि खाड़ी के अधिकांश तेल उत्पादक देशों की अर्थव्यवस्था निर्यात पर निर्भर है। साथ ही, क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी और खाड़ी सहयोग परिषद देशों की समुद्री क्षमता को देखते हुए किसी भी बड़े अवरोध को लंबे समय तक बनाए रखना आसान नहीं होगा।

फिर भी, यदि तनाव व्यापक संघर्ष में बदलता है तो इसका असर केवल तेल तक सीमित नहीं रहेगा। गैस आपूर्ति, शिपिंग मार्ग और वैश्विक व्यापार पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

First Published : March 1, 2026 | 10:28 AM IST