China Energy Strategy: पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने पूरी दुनिया को ऊर्जा संकट की ओर धकेल दिया है… लेकिन दुनिया का सबसे बड़ा तेल खरीदार चीन इस झटके से उतना नहीं डगमगाया, जितना बाकी देश। न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, चीन इस तरह के संकट के लिए सालों से तैयारी कर रहा था।
रिपोर्ट बताती है कि युद्ध के कारण तेल सप्लाई पर असर पड़ा, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम रास्तों के प्रभावित होने से एशिया में ऊर्जा संकट गहरा गया। लेकिन चीन ने पहले से ही बड़े पैमाने पर तेल का भंडारण कर रखा था।
इसके अलावा, उसने ऊर्जा के दूसरे स्रोतों पर भी जोर दिया, जिससे वह इस संकट में अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में बना हुआ है।
चीन लंबे समय से अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए विदेशों पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। एक समय वह पेट्रोल-डीजल वाहनों का सबसे बड़ा बाजार था, लेकिन अब वह इलेक्ट्रिक वाहनों में दुनिया का नंबर वन बाजार बन चुका है। इससे तेल की मांग धीरे-धीरे घट रही है। इसके साथ ही चीन ने सौर, पवन और जल ऊर्जा में भारी निवेश किया है, जिससे उसकी ऊर्जा व्यवस्था ज्यादा विविध और सुरक्षित हो गई है।
रिपोर्ट का एक अहम पहलू यह है कि चीन अब कोयले का इस्तेमाल करके कई जरूरी केमिकल्स बना रहा है, जो पहले कच्चे तेल से बनते थे। यह तकनीक पहले जर्मनी ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस्तेमाल की थी। अब चीन ने इसे बड़े पैमाने पर अपनाया है। 2020 में जहां चीन ने करीब 155 मिलियन टन कोयले का इस्तेमाल केमिकल बनाने में किया था, वहीं 2024 तक यह बढ़कर 276 मिलियन टन हो गया और 2025 में इसमें और 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
चीन ने अपनी इंडस्ट्री को भी इस तरह विकसित किया है कि वह विदेशी कंपनियों पर कम निर्भर रहे। पहले चीन को केमिकल्स के लिए DuPont, Shell और BASF जैसी विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन अब चीन खुद इन उत्पादों का बड़ा सप्लायर बन गया है। आज दुनिया का करीब तीन-चौथाई पॉलिएस्टर और नायलॉन चीन में बनता है।
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान जब चीन के साथ ट्रेड वॉर शुरू हुआ, तब चीन ने अपनी रणनीति और तेज कर दी। सरकार ने घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने, नई तकनीक विकसित करने और सप्लाई चेन को मजबूत करने पर जोर दिया, ताकि बाहरी दबावों से बचा जा सके।
चीन ने 2004 में ही आपातकालीन तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) बनाना शुरू कर दिया था। हाल के महीनों में उसने अपने भंडार को और तेजी से बढ़ाया है। हालांकि, आज भी चीन अपनी जरूरत का करीब 75 प्रतिशत तेल आयात करता है, लेकिन अब उसकी निर्भरता पहले जैसी कमजोर स्थिति में नहीं है।
जब कई एशियाई देशों जैसे वियतनाम और फिलीपींस को ऊर्जा की कमी का सामना करना पड़ा, तब उन्होंने चीन से मदद मांगी। चीन ने भी कहा कि वह क्षेत्रीय देशों के साथ मिलकर ऊर्जा सुरक्षा पर काम करने को तैयार है। रिपोर्ट में बताया गया है कि उर्वरक जैसे उत्पादों में चीन को फायदा मिला है। जहां अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमत 40 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गई, वहीं चीन में कोयले से बनने वाले उर्वरक की कीमत काफी कम बनी रही।
हालांकि चीन अभी भी दुनिया का सबसे बड़ा तेल और गैस आयातक है, लेकिन उसकी रणनीति साफ है। ऊर्जा और कच्चे माल के मामले में आत्मनिर्भर बनना। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन इस संकट को अपने आत्मनिर्भर बनने के रास्ते में एक और मजबूती के रूप में देख सकता है।
कुल मिलाकर, यह युद्ध चीन का नहीं है… लेकिन इसके असर से बचने की तैयारी उसने बहुत पहले ही शुरू कर दी थी। यही वजह है कि आज वह बाकी देशों के मुकाबले इस संकट को बेहतर तरीके से झेल पा रहा है।