बुधवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हुआ। इसकी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों का छह हफ्ते के उच्चतम स्तर पर पहुंचना और घरेलू मुद्रा के प्रति धारणा बिगड़ना थी। स्थानीय मुद्रा मंगलवार के 96.24 प्रति डॉलर के बंद भाव के मुकाबले 96.57 प्रति डॉलर पर बंद हुई।
मंगलवार को रुपये में 0.22 फीसदी की बढ़त हुई थी। लेकिन बुधवार की गिरावट से उस बढ़त का ज्यादातर हिस्सा खत्म हो गया। दो महीने के निचले स्तर पर चल रही स्थानीय मुद्रा ने इस साल 20 मई को 96.83 प्रति डॉलर का रिकॉर्ड क्लोजिंग निचला स्तर छुआ था।
एचडीएफसी सिक्योरिटीज के वरिष्ठ शोध विश्लेषक दिलीप परमार ने कहा, मंगलवार को थोड़ी बढ़त के बाद कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और भूराजनीतिक अनिश्चितता के कारण भारतीय रुपये पर दबाव बना हुआ है। अमेरिकी टैरिफ को लेकर फिर से पैदा हुई चिंताओं ने भी मनोबल और कमजोर कर दिया है। इस महीने अब तक रुपया 1.97 फीसदी कमजोर हुआ है। चालू वित्त वर्ष में इसमें 1.82 फीसदी की गिरावट आ चुकी है। ईरान संघर्ष बढ़ने के बाद से इसमें 5.79 फीसदी की गिरावट आई है।
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी के ट्रेजरी प्रमुख और कार्यकारी निदेशक अनिल कुमार भंसाली ने कहा, ईरान से जुड़े बढ़ते भूराजनीतिक तनाव के कारण तेल की कीमतें एक महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं, जिससे भारत का तेल आयात बिल बढ़ गया और रुपये पर दबाव पड़ा। वैश्विक स्तर पर जोखिम से बचने की प्रवृत्ति ने उभरते बाजारों की ज्यादातर मुद्राओं के मुकाबले डॉलर को मजबूती दी। सरकारी बैंकों की डॉलर बिक्री, जो संभवतः आरबीआई की ओर से की गई थी, ने रुपये की कीमत में और ज्यादा गिरावट रोकने में मदद की।
ईरान पर लगातार अमेरिकी सैन्य हमलों और ईरान की जवाबी कार्रवाई से इलाके में बड़े संघर्ष का डर बढ़ गया है। लाल सागर में जहाजों के लिए खतरे और होर्मुज स्ट्रेट से आवाजाही कम होने से कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर चिंता पैदा हो गई हैं। ब्रेंट क्रूड की कीमत तेजी से बढ़कर 93.5–95.50 डॉलर प्रति बैरल हो गई, जो पिछले बंद भाव से 3 से 5 फीसदी अधिक है और लगभग छह हफ्तों में यह उसका उच्चतम स्तर है। ट्रेडरों ने इस डर से जोखिम प्रीमियम को कीमतों में शामिल किया कि पश्चिम एशिया से होने वाले निर्यात में रुकावट आ सकती है। भारत के तेल आयात बिल में बढ़ोतरी का असर पूरे सत्र के दौरान रुपये पर दिखा।
सरकारी बैंकों की डॉलर बिक्री ने स्थानीय मुद्रा में ज्यादा गिरावट रोकने में मदद की। इस दौरान भारतीय शेयर बाजार में भी गिरावट आई, जिससे विदेशी निवेशकों की रुपये वाली संपत्तियों में दिलचस्पी कम हुई। अमेरिकी डॉलर इंडेक्स 101.10–101.15 के आस-पास लगभग स्थिर या थोड़ा नीचे रहा।