साल 2026 की पहली तिमाही में चीन की अर्थव्यवस्था ने रफ्तार पकड़ी है। तिमाही आधार पर 1.3% की बढ़त दर्ज हुई, जो पिछली तिमाही के 1.2% से ज्यादा है। आंकड़े बताते हैं कि ग्रोथ पटरी पर लौटती दिख रही है। यह उछाल साल 2024 के अंत के बाद सबसे मजबूत माना जा रहा है। सरकार के लगातार सपोर्ट ने इस रफ्तार को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है।
ऊपर से सब ठीक दिखता है, लेकिन अंदर की कहानी कुछ और है। अधिकारियों ने साफ संकेत दिया है कि देश में उत्पादन तो तेजी से हो रहा है, लेकिन बाजार में मांग उतनी मजबूत नहीं है। यानी फैक्ट्रियां चल रही हैं, सामान बन रहा है, लेकिन खरीदार पीछे छूट रहे हैं। यही असंतुलन चीन की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चिंता बनता जा रहा है।
चीन की मुश्किलें सिर्फ अपने घर तक सीमित नहीं हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता, व्यापार से जुड़े तनाव और कमजोर होती दुनिया की अर्थव्यवस्था का असर भी चीन पर साफ दिख रहा है। ऐसे हालात में आगे की राह और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
इस सुस्ती को तोड़ने के लिए चीन सरकार ने बड़ा दांव खेला है। बजट घाटा बढ़ाकर जीडीपी के करीब 4% तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही ज्यादा सरकारी बॉन्ड जारी किए जाएंगे, ताकि बाजार में पैसा डाला जा सके और आर्थिक गतिविधियों को फिर से तेज किया जा सके।
चीन का सेंट्रल बैंक भी इस लड़ाई में पीछे नहीं है। वह ढीली मौद्रिक नीति के जरिए अर्थव्यवस्था को सहारा देता रहेगा। लेकिन बढ़ती महंगाई ने उसकी चाल को सीमित कर दिया है। ब्याज दरों में बड़ी कटौती अब आसान नहीं है, इसलिए हर कदम सोच समझकर उठाना होगा।
महीने के अंत में होने वाली पोलितब्यूरो की बैठक बेहद अहम मानी जा रही है। यहीं तय होगा कि चीन आगे कौन सा रास्ता चुनता है और कैसे इन चुनौतियों से निपटता है। (AP के इनपुट के साथ)