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देश के श्रम कानूनों में प्रयुक्त शब्द ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा को लेकर एक बार फिर उच्चतम न्यायालय में व्यापक कानूनी समीक्षा होने जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को संकेत दिया कि इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार के लिए नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ गठित की जाएगी। यह पीठ औद्योगिक संबंध संहिता 2020 और उससे पहले लागू औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के तहत ‘इंडस्ट्री’ शब्द के दायरे को स्पष्ट करेगी।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi और न्यायमूर्ति Vipul M Pancholi शामिल थे, ने बताया कि बड़ी पीठ 17 मार्च से इस मामले की सुनवाई शुरू करेगी और संभावना है कि बहस अगले दिन तक पूरी कर ली जाएगी।
इस संदर्भ में सात न्यायाधीशों की एक ऐतिहासिक पीठ द्वारा लगभग पचास वर्ष पहले दिए गए फैसले पर पुनर्विचार किया जाएगा। वर्ष 1975 में न्यायमूर्ति V R Krishna Iyer ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में ‘इंडस्ट्री’ की पहचान के लिए जो कानूनी कसौटी तय की थी, उसे अब दोबारा परखा जाएगा। खासतौर पर उस निर्णय के पैरा 140 से 144 में निर्धारित सिद्धांतों की वैधता और व्याख्या पर संविधान पीठ विचार करेगी।
1975 के फैसले में अदालत ने ‘ट्रिपल टेस्ट’ का सिद्धांत विकसित किया था। इसके अनुसार कोई भी संस्था या प्रतिष्ठान तभी ‘इंडस्ट्री’ माना जाएगा जब
वहां नियमित और व्यवस्थित गतिविधियां संचालित होती हों,
नियोक्ता और कर्मचारी के बीच संगठित सहयोग मौजूद हो,
वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन अथवा वितरण इस उद्देश्य से किया जा रहा हो कि मानव की जरूरतों या इच्छाओं की पूर्ति हो सके।
इस व्यापक व्याख्या के कारण क्लब, अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान और अन्य सेवा आधारित संस्थाएं भी श्रम कानूनों के दायरे में आ गई थीं। अब यह देखा जाएगा कि क्या यह व्याख्या वर्तमान कानूनी और सामाजिक संदर्भ में उपयुक्त है या नहीं।
संविधान पीठ यह भी जांचेगी कि औद्योगिक विवाद संशोधन अधिनियम 1982, जिसे पारित तो किया गया था लेकिन कभी लागू नहीं किया गया, क्या ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा पर कोई कानूनी असर डालता है। इसके साथ ही औद्योगिक संबंध संहिता 2020 के प्रावधानों का मौजूदा व्याख्या पर क्या प्रभाव पड़ता है, इस पर भी विस्तार से विचार होगा।
मामले का एक अहम पहलू यह भी है कि क्या सरकार द्वारा संचालित कल्याणकारी योजनाएं या सार्वजनिक संस्थाओं की सामाजिक सेवाएं श्रम कानूनों के तहत औद्योगिक गतिविधि मानी जा सकती हैं। अदालत यह भी तय करेगी कि राज्य के कौन से कार्य ऐसे हैं जो औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2(ज) के दायरे से बाहर रखे जा सकते हैं।
अदालत ने बताया कि इस मामले में पर्याप्त केस मैनेजमेंट पहले ही हो चुका है। पक्षकारों को 28 फरवरी 2026 तक अपने अतिरिक्त या अद्यतन लिखित तर्क दाखिल करने की अनुमति दी गई है। दोनों पक्षों के नोडल वकीलों को याचिकाओं, दस्तावेजों और साक्ष्यों का नया संकलन तैयार करने का निर्देश दिया गया है।
याचिकाकर्ताओं को अपनी दलीलें रखने के लिए तीन घंटे का समय दिया गया है, जबकि प्रत्युत्तर के लिए एक अतिरिक्त घंटा निर्धारित किया गया है। अदालत ने वकीलों से आपसी समन्वय बनाकर तय समयसीमा में बहस पूरी करने और रजिस्ट्री की प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं का पालन करने को कहा है।
यह मामला श्रम कानूनों के भविष्य और सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थाओं की कानूनी स्थिति को प्रभावित कर सकता है। संविधान पीठ का फैसला आने वाले समय में श्रमिकों के अधिकारों और संस्थानों की जवाबदेही को नई दिशा दे सकता है।