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भारतीय वृहद हालात कभी बेहतर नहीं रहे

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Last Updated- December 12, 2022 | 12:21 AM IST

बीएस बातचीत

इन्वेस्टेक इंडिया के इक्विटी प्रमुख मुकुल कोछड़ ने समी मोडक के साथ एक साक्षात्कार में बताया कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा प्रोत्साहन में नरमी और मुद्रास्फीति इक्विटी बाजारों के लिए दो सबसे बड़े जोखिम हैं। उनका कहना है कि मौद्रिक नीति को सामान्य बनाना निश्चित तौर पर बड़ा जोखिम है, लेकिन भारत अपने मजबूत वृहद परिदृश्य की वजह से बेहतर स्थिति में दिख रहा है। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश:
मौजूदा हालात में वैश्विक बाजारों और भारत को कौन से बड़े जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है?
वैश्विक इक्विटी बाजारों को जिन मुख्य जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है, उनमें केंद्रीय बैंकों द्वारा अतिरिक्त तरलता धीरे धीरे समाप्त करना और मुद्रास्फीति मुख्य रूप से शामिल हैं। जहां हमारा मानना है कि भारत के चालू खाते को सामान्य बनाने की प्रक्रिया को देखते हुए हम अमेरिकी फेडरल द्वारा रियायत वापस लेने के प्रभाव का सामना करने में सक्षम होंगे, वहीं मुद्रास्फीति ज्यादा स्पष्ट जोखिम है। अमेरिकी फेड के कदम का जिंसों जैसी वैश्विक जोखिमपूर्ण परिसंपत्तियों पर प्रभाव पड़ सकता है और हम इस परिसंपत्ति वर्ग को लेकर सतर्क हैं। मुद्रास्फीति का विभिन्न शेयरों और क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ता है और शेयर चयन को लेकर ज्यादा सतर्क रुख अपनाने की जरूरत है। खासकर भारत के लिए, राजनीति सबसे बड़ा जोखिम है। देश में राजनीतिक स्थायित्व में किसी तरह के बदलाव का भारतीय शेयर बाजार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

क्या अमेरिकी फेड के कदम से उतार-चढ़ाव को बढ़ावा मिलेगा?
हमारा चालू खाता करीब संतुलित स्थिति में है, जिसे देखते हुए हमारा मानना है कि अमेरिका में मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने के प्रभाव का सामना करने में भारत सक्षम रहेगा।

क्या इस वजह से जोखिमपूर्ण परिसंपत्तियों से ज्यादा पूंजी निकासी की आशंका देख रहे हैं?
हां। हालांकि इसकी मात्रा का अनुमान लगाना कठिन है, लेकिन मौद्रिक नीति को सामान्य बनाए जाने के प्रयास में बढ़ते जोखिम की धारणा का अनुमान लगाया जा सकता है। इक्विटी की कम लागत जोखिमपूर्ण परिसंपत्तियों के मजबूत प्रदर्शन का स्पष्ट कारण है और इसके अभाव से निश्चित तौर पर जोखिम पैदा होगा। हालांकि भारत मौद्रिक नीति के प्रभाव को लेकर पहले के मुकाबले अब ज्यादा बेहतर स्थिति में है, क्योंकि हमारा चालू खाता घाटा लगभग संतुलित है।

अगले एक साल के लिए भारतीय इक्विटी के लिए परिदृश्य कैसा है?
ऐक्टिव फंडों के अलावा हमें शेयर चयन पर भी ध्यान देने की जरूरत होगी। इस संबंध में, भारतीय इक्विटी सूचकांकों के ऊंचे मूल्यांकन के बावजूद, हम लगातार अच्छे निवेश तलाश रहे हैं। आपको यह समझना होगा कि भारतीय वृहद स्थिति पहले इतनी बेहतर कभी नहीं रही, और कई व्यवसाय अगले पांच साल में सुरक्षित आय में सक्षम होंगे।

कया निर्धारित आय विकल्प भविष्य में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है?
अल्पावधि में, यह संभव है कि मुद्रास्फीति बढऩे पर प्रतिफल में नकारात्मक बदलाव आए। हालांकि कई साल बाद, आरबीआई तरलता बनाए रखने और कोष लागत कम बनाए रखने के स्पष्ट मकसद को प्रदर्शित कर रहा है। अन्य उभरते बाजारों की तरह भारत में असर दिखने की संभावना है।

भारत के इक्विटी बाजारों ने वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले इस साल बेहतर प्रदर्शन किया है। आपके अनुसार इस अच्छे प्रदर्शन की क्या वजह रही है?
भारत के सुधरते वृहद-आर्थिक परिवेश के साथ साथ पर्याप्त वैश्विक तरलता से भारत में शेयर प्रदर्शन में मजबूती आई है। निवेश प्रवाह सकारात्मक रहा है और पूंजी उपलब्धता में सुधार से बेहतर वृद्घि (खासकर छोटी कंपनियों के लिए) की संभावना बढ़ी है। मझोली कंपनियों में वृद्घि का मुख्य कारण पूंजी उपलब्धता है और यह भारत के लिए सकारात्मक है।

क्या ऐतिहासिक औसत के मुकाबले महंगे मूल्यांकन से मध्यावधि में कमजोर प्रदर्शन को बढ़ावा मिलेगा?
यह प्रमुख बाजार के लिए सही साबित होने का अनुमान है। इसके अलावा, हम निवेश के लिए अच्छी कीमत वाले शेयरों की तलाश बरकरार रखेंगे।

आप भारत के दीर्घावधि आर्थिक परिदृश्य को किस नजरिये से देखते हैं?
भारत के आर्थिक परिदृश्य में पिछले दो दशकों के मुकाबले बेहतर बदलाव नहीं आया है, जैसा कि विभिन्न मानकों से पता चलता है, जिनमें हमारा चालू खाते में संतुलन भी मुख्य रूप से शामिल है। साथ ही, आंतरिक राजनीति स्थिर दिख रही है, और वैश्विक राजनीतिक भारत के आर्थिक परिदृश्य में सहायक है।

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First Published - October 11, 2021 | 12:21 AM IST

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