भारत के माइक्रोफाइनैंस पोर्टफोलियो में बैंकों की हिस्सेदारी में भारी गिरावट आई है। माइक्रोफाइनैंस इंस्टीट्यूशंस नेटवर्क (एमएफआईएन) की रिपोर्ट ‘माइक्रोमीटर’ के अनुसार बैंक ऋण को माइक्रोफाइनैंस श्रेणी से हटाकर खुदरा पोर्टफोलियो में डाल रहे हैं, जबकि एनबीएफसी- एफएफआई इस क्षेत्र में सुधार को आगे बढ़ा रहे हैं।
बैंकों का 30 जून, 2026 तक माइक्रोफाइनैंस पोर्टफोलियो सालाना आधार पर 28.5 प्रतिशत घटकर 83,080 करोड़ रुपये रह गया। इससे बैंक की कुल माइक्रोफाइनैंस पोर्टफोलियो में हिस्सेदारी लगभग 25 प्रतिशत हो गई। वैसे एक साल पहले बैंक की इस उद्योग के पोर्टफोलियो में हिस्सेदारी लगभग 33 प्रतिशत थी। एमएफआईएन ने कहा कि यह गिरावट ‘एमएफआई ऋण को खुदरा ऋण के तौर पर फिर से वर्गीकृत करने” की वजह से और बढ़ गई।
इसके उलट, इसी अवधि में एनबीएफसी-एमएफआई ने अपना पोर्टफोलियो 5.2 प्रतिशत बढ़ाकर 1.46 लाख करोड़ रुपये रुपये कर दिया। इससे माइक्रोफाइनैंस क्षेत्र में उनकी हिस्सेदारी एक साल पहले के लगभग 39 प्रतिशत से बढ़कर 44 प्रतिशत हो गई।
स्मॉल फाइनैंस बैंकों के पोर्टफोलियो में 6.1 प्रतिशत की गिरावट आई जबकि एनबीएफसी ने 2.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की। हालांकि, कुल माइक्रोफाइनैंस पोर्टफोलियो 30 जून को सालाना आधार पर 3.29 लाख करोड़ रुपये रहा, जो एक साल पहले 3.53 लाख करोड़ रुपये था।
इसलिए उद्योग पोर्टफोलियो में आई यह कमी आंशिक रूप से नए लोन देने में व्यापक गिरावट के बजाय रिपोर्ट की गई माइक्रोफाइनेंस कैटेगरी से लोन के बाहर जाने को दर्शाती है।