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पेट्रोल-डीजल पर बड़ी टैक्स कटौती, पर समझिए सरकारी खजाने का गणित और कहां जाता है आपका पैसा?

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बढ़ते कच्चे तेल की किल्लट के बीच सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 10 रुपये घटाकर बड़ी राहत दी है, ताकि इसकी महंगाई को काबू किया जा सके

Last Updated- March 27, 2026 | 3:27 PM IST
Petrol
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

सरकार ने शुक्रवार को पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती कर दी है। अब पेट्रोल पर ये ड्यूटी घटकर 3 प्रति लीटर रुपये रह गई है, जबकि डीजल पर ये पूरी तरह खत्म हो गई है। ये फैसला ऐसे वक्त लिया गया है जब पश्चिम एशिया के तनाव की वजह से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं। इससे तेल कंपनियों (OMCs) पर खर्च का दबाव बढ़ गया था। अब 10 रुपये की कटौती से उन्हें बिना पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए घाटे से बचने में मदद मिलेगी।

फ्यूल टैक्स सरकार की कमाई का बड़ा जरिया है। ये पैसा केंद्र की एक्साइज ड्यूटी और राज्यों के वैट (VAT) से आता है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के मुताबिक, 2023-24 में पेट्रोलियम सेक्टर से 7.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा टैक्स जुटा। इसमें केंद्र को एक्साइज से करीब 2.7 से 3 लाख करोड़ रुपये मिले, जबकि राज्यों को वैट से 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा मिला।

कोविड के दौरान जब कच्चा तेल सस्ता था, तब सरकारों ने टैक्स बढ़ाकर कमाई बढ़ाई। बाद में महंगाई काबू में रखने के लिए टैक्स घटाए गए, जिससे कलेक्शन थोड़ा कम हो गया।

एक्साइज ड्यूटी क्या है?

एक्साइज ड्यूटी वो टैक्स है जो केंद्र सरकार पेट्रोल-डीजल पर हर लीटर के हिसाब से तय रकम के रूप में लेती है। इसके अलावा रोड और इंफ्रास्ट्रक्चर सेस जैसे कुछ और टैक्स भी होते हैं, जो सीधे केंद्र के पास जाते हैं। कुल मिलाकर देखें तो ये सेंट्रल टैक्स ही फ्यूल की कीमत का बड़ा हिस्सा बनाते हैं।

दिल्ली जैसे शहरों में पेट्रोल की कीमत का करीब 43% हिस्सा सेंट्रल टैक्स होता है, जबकि डीजल में ये करीब 37% है। इसके ऊपर राज्यों का VAT अलग से जुड़ता है।

टैक्स का पैसा कहां जाता है?

एक्साइज ड्यूटी वो टैक्स है जो केंद्र सरकार पेट्रोल और डीजल पर हर लीटर के हिसाब से तय रकम के रूप में वसूलती है। यानी जितना फ्यूल आप खरीदते हैं, उसी हिसाब से ये टैक्स जुड़ता जाता है। इसके अलावा रोड और इंफ्रास्ट्रक्चर सेस जैसे कुछ और अतिरिक्त टैक्स भी लगाए जाते हैं, और इनका पूरा पैसा सीधे केंद्र सरकार के पास ही रहता है। इस तरह देखें तो कुल मिलाकर सेंट्रल टैक्स फ्यूल की रिटेल कीमत का एक बड़ा हिस्सा बनाते हैं।

अगर दिल्ली जैसे शहर का उदाहरण लें, तो पेट्रोल की कीमत में करीब 43 प्रतिशत हिस्सा सेंट्रल टैक्स का होता है, जबकि डीजल के मामले में ये हिस्सा करीब 37 प्रतिशत रहता है। इसके ऊपर से राज्यों का अपना VAT भी अलग से जुड़ता है, जिससे फाइनल कीमत और बढ़ जाती है।

Also Read: सरकार का बड़ा फैसला: पेट्रोल पर एक्साइज 13 से घटाकर 3 रुपये, डीजल पर टैक्स पूरी तरह खत्म

फ्यूल टैक्स सरकार की फाइनेंस में कितना अहम?

केंद्र सरकार के लिए पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी और सेस उसकी कुल टैक्स कमाई का करीब 18-19 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं। यानी सरकार की कमाई का एक बड़ा हिस्सा यहीं से आता है और ये उसके सबसे अहम रेवेन्यू सोर्स में शामिल है।

वहीं राज्यों के लिए भी पेट्रोलियम टैक्स काफी जरूरी होते हैं। उनकी अपनी टैक्स कमाई में इनका हिस्सा करीब 25 से 35 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। गुजरात, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में तो ये कुल कमाई का बड़ा हिस्सा बनते हैं। इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव या टैक्स में कोई भी बदलाव सीधे तौर पर सरकारों की फाइनेंस पर असर डालता है।

ड्यूटी कटौती का क्या असर?

जब केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी घटाती है, तो उसकी कमाई कम हो जाती है और आम तौर पर पेट्रोल-डीजल के दाम भी नीचे आ सकते हैं। पहले भी ऐसी कटौती से ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स का खर्च कम हुआ है, जिससे महंगाई को काबू में रखने में मदद मिली।

लेकिन आम लोगों को कितना फायदा मिलेगा, ये काफी हद तक राज्यों पर निर्भर करता है। अगर राज्य अपना VAT कम नहीं करते, तो कंज्यूमर को पूरी राहत नहीं मिल पाती और असर सीमित रह जाता है। बार-बार टैक्स घटाने से केंद्र सरकार का फिस्कल डेफिसिट भी बढ़ सकता है, जिससे सरकारी वित्त पर दबाव पड़ता है।

इस कटौती से सरकार को कितना नुकसान?

एनालिस्ट्स का मानना है कि यह कदम तेल कंपनियों (OMCs) और उपभोक्ताओं को कुछ राहत जरूर देगा, लेकिन सरकार की कमाई पर इसका बड़ा असर पड़ेगा। DRChoksey FinServ के प्रमोटर और मैनेजिंग डायरेक्टर देवेन चौकसे के मुताबिक, एक्साइज ड्यूटी में हर 1 रुपये प्रति लीटर की कटौती से सालाना करीब 14,000 से 16,000 करोड़ रुपये का राजस्व घटता है।

इसी हिसाब से देखें तो 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती से सरकार को सालाना करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। चोकसे ने कहा, “वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव के चलते ब्रेंट क्रूड करीब 115 डॉलर प्रति बैरल की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में केंद्र की यह कटौती एक तरह की फिस्कल शील्ड का काम करती है, जो रिटेल फ्यूल की कीमतों में झटका लगने से बचाती है और तेल कंपनियों के बैलेंस शीट को सपोर्ट करती है।”

कंज्यूमर और इकोनॉमी पर असर

फ्यूल टैक्स का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है। ट्रांसपोर्ट महंगा होता है और इसका असर रोजमर्रा की चीजों की कीमतों में दिखने लगता है। टैक्स ज्यादा हों तो महंगाई बढ़ती है, और कम हों तो कुछ राहत मिलती है।

इकोनॉमी के नजरिए से देखें तो ये एक तरह का संतुलन है। फ्यूल टैक्स से सरकार को खर्च चलाने के लिए लगातार कमाई मिलती है, लेकिन अगर टैक्स बहुत ज्यादा हो जाएं तो बिजनेस और कंज्यूमर, दोनों पर बोझ बढ़ जाता है। इसलिए सरकारें कच्चे तेल की कीमतों और महंगाई को देखते हुए इन टैक्स में समय-समय पर बदलाव करती रहती हैं।

फिलहाल पेट्रोल की रिटेल कीमत में सेंट्रल टैक्स का हिस्सा अभी भी बड़ा है। दिल्ली जैसे शहर में कटौती के बाद भी इसका असर दिखेगा। और अगर राज्य अपना VAT नहीं घटाते, तो आम लोगों को पूरी राहत मिलना मुश्किल रहेगा।

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First Published - March 27, 2026 | 3:27 PM IST

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