पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने टेक्सास में नई तेल रिफाइनरी बनाने की घोषणा की है। यह अमेरिका में करीब 50 साल बाद बनने वाली पहली नई रिफाइनरी होगी। ट्रंप ने कहा कि यह प्रोजेक्ट 300 अरब डॉलर की बड़ी डील का हिस्सा है। उन्होंने इस निवेश के लिए मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज को धन्यवाद भी दिया।
हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि इस प्रोजेक्ट में रिलायंस कितना निवेश करेगी। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इस समझौते से कंपनी को अमेरिका और वेनेजुएला से कच्चा तेल हासिल करने में फायदा मिल सकता है। माना जा रहा है कि अमेरिका ने इस परियोजना के लिए रिलायंस को इसलिए चुना क्योंकि कंपनी के पास भारी और मुश्किल कच्चे तेल को प्रोसेस करने की अच्छी तकनीक और लंबा अनुभव है।
तेल रिफाइनरी की ताकत केवल उसकी क्षमता से तय नहीं होती। यह भी अहम होता है कि वह कच्चे तेल को कितनी कुशलता से ज्यादा कीमत वाले ईंधन में बदल सकती है। इसी क्षमता को मापने के लिए नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स का इस्तेमाल किया जाता है।
नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स एक तरह का पैमाना है, जो बताता है कि कोई रिफाइनरी तकनीक के मामले में कितनी आधुनिक और ताकतवर है। इससे यह भी पता चलता है कि वह भारी और मुश्किल कच्चे तेल को कितनी आसानी से काम के ईंधन में बदल सकती है। यह इंडेक्स 1960 में अमेरिकी इंजीनियर विल्बर एल. नेल्सन ने बनाया था।
आम तौर पर साधारण रिफाइनरी का स्कोर 5 से कम होता है, जबकि बहुत एडवांस रिफाइनरी का स्कोर 10 से ज्यादा होता है। सीधी भाषा में समझें तो जितना ज्यादा स्कोर, उतनी ज्यादा आधुनिक और सक्षम रिफाइनरी।
नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स यह बताता है कि कोई रिफाइनरी तकनीक के मामले में कितनी एडवांस है। जिन रिफाइनरियों का यह स्कोर ज्यादा होता है, वे भारी और सस्ते कच्चे तेल से भी पेट्रोल, डीजल और जेट ईंधन जैसे महंगे ईंधन बना सकती हैं। ऐसी रिफाइनरियों में खास मशीनें लगी होती हैं, जो भारी तेल को तोड़कर हल्का ईंधन बना देती हैं।
इससे कंपनियां सस्ता तेल खरीदकर उससे ज्यादा कीमत वाले उत्पाद बना पाती हैं, जिससे उनका मुनाफा बढ़ता है। वहीं साधारण रिफाइनरियां ज्यादा एडवांस नहीं होतीं। वे आम तौर पर सिर्फ बुनियादी प्रक्रिया से तेल साफ करती हैं, इसलिए उनमें कम कीमत वाले उत्पाद जैसे फ्यूल ऑयल ज्यादा बनते हैं।
नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स के अनुसार अमेरिका का रिफाइनिंग सिस्टम दुनिया के सबसे एडवांस सिस्टम में से एक माना जाता है। खासकर अमेरिका के गल्फ कोस्ट इलाके की रिफाइनरियां तकनीकी रूप से काफी विकसित हैं और दुनिया के बड़े रिफाइनिंग केंद्रों में गिनी जाती हैं।
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार इन रिफाइनरियों में ऐसे एडवांस सिस्टम हैं जो अलग-अलग प्रकार के कच्चे तेल को प्रोसेस कर सकते हैं, जिसमें भारी और अधिक सल्फर वाला तेल भी शामिल है। इससे अमेरिका को रिफाइनिंग के क्षेत्र में मजबूत बढ़त मिलती है और वह बड़ी मात्रा में तैयार ईंधन का निर्यात भी करता है।
उदाहरण के लिए, फिलिप्स 66 की फर्नडेल रिफाइनरी का नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स करीब 7.7 है। वहीं कंपनी की लॉस एंजेलिस रिफाइनरी का स्कोर करीब 14.3 है, जो ज्यादा एडवांस तकनीक को दिखाता है। इसी तरह पीबीएफ एनर्जी की छह रिफाइनरियों का औसत इंडेक्स लगभग 12.7 है।
रिलायंस इंडस्ट्रीज के अनुसार गुजरात के जामनगर में स्थित उसका रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स के मामले में दुनिया में सबसे आगे है। इसका स्कोर करीब 21.1 बताया जाता है, जो इसे दुनिया की सबसे जटिल और सबसे बड़ी सिंगल साइट रिफाइनरी बनाता है।
इस कॉम्प्लेक्स की कच्चे तेल को प्रोसेस करने की क्षमता करीब 14 लाख बैरल प्रतिदिन है। यहां बड़ा समुद्री टर्मिनल भी है, जहां छोटे केमिकल टैंकर से लेकर दुनिया के सबसे बड़े क्रूड ऑयल टैंकर तक आ सकते हैं।
रिलायंस के अनुसार यह रिफाइनरी दुनिया भर के 216 से ज्यादा तरह के कच्चे तेल को प्रोसेस कर चुकी है।
जामनगर रिफाइनरी की सबसे बड़ी खासियत इसकी बहुत अधिक तकनीकी क्षमता है। यहां दुनिया का सबसे बड़ा पेटकोक गैसीफायर लगाया गया है, जो कोयले और पेटकोक दोनों पर चल सकता है। इससे कंपनी कच्चे तेल से अधिकतम ऊर्जा और उत्पाद निकाल सकती है।
इसके अलावा यहां दुनिया के सबसे बड़े पैरा-जाइलीन कॉम्प्लेक्स में से एक और बहुत बड़ा रिफाइनरी ऑफ-गैस क्रैकर भी मौजूद है। इन सुविधाओं की वजह से यह रिफाइनरी बाजार की मांग के अनुसार पेट्रोल और डीजल के उत्पादन में तेजी से बदलाव कर सकती है और घरेलू तथा निर्यात दोनों बाजारों के लिए काम कर सकती है।
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वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार माना जाता है, जो करीब 303 अरब बैरल है। लेकिन वहां का कच्चा तेल काफी भारी और गाढ़ा होता है। इसमें सल्फर और दूसरी अशुद्धियां भी ज्यादा होती हैं, इसलिए इसे पेट्रोल, डीजल या दूसरे ईंधन में बदलना आसान नहीं होता। देश का ज्यादातर तेल ओरिनोको बेल्ट नाम के इलाके में मिलता है। यह तेल इतना गाढ़ा होता है कि कई बार इसे जमीन से निकालने और पाइपलाइन से ले जाने के लिए खास तकनीक या हल्के तेल के साथ मिलाना पड़ता है। तेल रिफाइनिंग में सिर्फ बड़ी रिफाइनरी होना ही काफी नहीं होता।
यह भी जरूरी है कि रिफाइनरी के पास मुश्किल और भारी कच्चे तेल को प्रोसेस करने की अच्छी तकनीक हो। रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी का नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स बहुत ज्यादा है। इसका मतलब है कि कंपनी के पास भारी और मुश्किल कच्चे तेल को प्रोसेस करने की मजबूत क्षमता है। इसी वजह से माना जा रहा है कि अमेरिका ने टेक्सास की नई रिफाइनरी परियोजना में रिलायंस को पार्टनर चुना, क्योंकि कंपनी के पास वेनेजुएला जैसे देशों के भारी कच्चे तेल को प्रोसेस करने का अच्छा अनुभव है।