एयर इंडिया के संस्थापक जेआरडी टाटा किसी भी चीज पर बारीक नजर रखते थे और मामूली ब्योरे में भी दिलचस्पी लेते थे। उनके इस जुनून के बारे में सभी जानते हैं। उनके लिए कोई भी ब्योरा या जानकारी छोटी नहीं होती था, खासतौर पर जब उस बात का विमानन कंपनी से संबंध हो।
उन्होंने 17 मई, 1966 को एयर इंडिया के महाप्रबंधक (हॉस्पिटैलिटी) को एक पत्र लिखा था जिससे यह अंदाजा मिलता है कि उनकी छोटी सी छोटी चीजों में भी कितनी अहम भागीदारी रही है। उन्होंने उस पत्र में शिकायत की कि ऑमलेट कुछ ज्यादा ही पक गए थे। शायद इसका समाधान यह था कि उन्हें विमान के उड़ान भरने से पहले थोड़ा पका लिया जाए और फिर विमान में परोसने से ठीक पहले दोबारा गर्म किया जाए। उड़ान भरने और हवाई अड्डे पर विमान के उतरने से ठीक पहले परोसी जाने वाली मिठाइयों के बारे में उन्होंने लिखा था। उन्होंने इसे चखा और पत्र में लिखा कि इनका स्वाद ‘बालों के लोशन’ की तरह था और उन्होंने यह भी सवाल पूछा कि सिर्फ सेब, संतरे और केले जैसे फल की पेशकश करने के बजाय विमानन कंपनी उस समय नाशपाती क्यों नहीं खरीद रही जबकि उस फल का मौसम था? उसी पत्र में, टाटा ने महाप्रबंधक को अन्य विमानन कंपनियों की तरह ही ट्रॉली पर ड्रिंक्स परोसने का निर्देश दिया ताकि मेहमान अपने पसंदीदा पेय पदार्थ चुन सकें।
जेआरडी टाटा की इसी लगन, भागीदारी और प्रतिबद्धता ने एयर इंडिया को वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त ब्रांड बना दिया जो भारतीय आतिथि-सत्कार की गर्मजोशी का प्रतीक बन गया। फरवरी 1978 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक पत्र में, टाटा के विमानन कंपनी से बाहर निकलने पर (जो कि उनके पूर्ववर्ती मोरारजी देसाई के कार्यकाल के दौरान हुआ था) खेद व्यक्त करते हुए, विमान की साज-सज्जा और एयर होस्टेस की साडिय़ों से लेकर विमान सेवाओं की छोटी से छोटी बातों का खयाल रखने के लिए सराहना की थी।
अब जब एयर इंडिया सरकार द्वारा दशकों तक (कु) प्रबंधन किए जाने के बाद एक बार फिर से टाटा के पाले में लौटने के लिए तैयार है तो क्या इस ब्रांड में नए मालिक समान स्तर की दिलचस्पी दिखाएंगे? इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि क्या एयर इंडिया को नया जीवन मिलेगा?
मोगे समूह के संदीप गोयल का कहना है कि टाटा की मौजूदा पीढ़ी की दो सबसे महत्त्वपूर्ण खासियत है, विश्वास और गंभीरता। गोयल का कहना है, ‘एयर इंडिया ने उपभोक्ताओं का भरोसा खो दिया है और टाटा की तालिका में सबसे पहले भरोसा ही आता है। वे एयर इंडिया ब्रांड में फिर से विश्वास बहाली की कोशिश कर सकते हैं। इन वर्षों में, मूल ब्रांड एयर इंडिया की स्थिति बेहद खराब हो गई है और यह ‘सी’ क्लास बन गया है। इसे नए मालिकों के द्वारा ठीक किया जा सकता है।’
ब्रांड, एयर इंडिया ने हाल के वर्षों में खराब प्रदर्शन किया है क्योंकि विमानन कंपनी की विमान सेवाओं में देरी और उड़ान रद्द होने जैसी शिकायतें बढ़ गई है और अब यात्री भी किफायती विमानन सेवाओं को तरजीह दे रहे हैं। हालांकि एयर इंडिया के पास का एक ऐसा मॉडल है जिसके तहत छोटे स्टेशनों को केंद्र से जोडऩा और बेहतर कनेक्टिविटी की पेशकश करना शामिल है जबकि किफायती विमानन कंपनियां प्रमुख शहरों से जुड़ी होती हैं। लेकिन बेहतर कनेक्टिविटी, बैगेज आदि के लिए उदार नियमों, विमान में भोजन और व्यापक अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी के बावजूद इस ब्रांड को मदद नहीं मिली है। एयर इंडिया हमेशा उपभोक्ता शिकायतों को दूर करने और लंबित/रद्द घरेलू उड़ानों के लिए भुगतान करने में सबसे ऊपर है। पिछले साल, एक स्थानीय उड़ान में एक चूहे के घुसने की रिपोर्ट आई जिसकी वजह से उड़ान रद्द करनी पड़ी थी। इससे भी विमानन कंपनी की छवि तेजी से खराब हुई।
यात्रा और खाने के शौकीन पत्रकार वीर सांघवी बचपन से ही एयर इंडिया में सफर करते रहे हैं। उनका कहना है कि सत्तर केदशक की शुरुआत तक एयर इंडिया का सफर काफी शानदार रहा लेकिन इसके बाद इसको लेकर खराब धारणा बनाना समस्या का ‘अति-सरलीकरण’ करना है। सांघवी कहते हैं, ‘सत्तर के दशक की शुरुआत में वैश्विक तेल की कीमतों में वृद्धि की वजह से बाजार की गति बदलने के साथ ही ब्रांड को नुकसान होने लगा था। रईस लोगों ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के साथ विमान में सफर करने की बात कहकर असंतोष जताना शुरू कर दिया। पुराने एयर इंडिया में केवल अमीर लोग ही यात्रा करते थे लेकिन खाड़ी की यात्रा में तेजी आने से वह रुझान खत्म हो गया।’ उनका मानना है कि एयर इंडिया ब्रांड को इस वजह से नुकसान हुआ क्योंकि विमानन कंपनी का संचालन नागरिक उड्डयन मंत्रालय में संयुक्त सचिवों द्वारा किया जाने लगा जिनकी इस विमानन कंपनी के दीर्घकालिक भविष्य में कोई दिलचस्पी नहीं थी। एयर इंडिया किसी भी अन्य सरकारी क्षेत्र की कंपनी की तरह बन गई।
टाटा समूह के पूर्व ब्रांड संरक्षक मुकुंद राजन बताते हैं कि एयर इंडिया के कर्मचारियों की तकनीकी क्षमता और इसके पायलटों के उड़ान कौशल की वर्षों से अच्छी प्रतिष्ठा रही है। राजन ने कहा, ‘इसके सेवा मानकों, रखरखाव और विमानों के प्रबंधन की वजह से इसकी प्रतिष्ठा पर असर पड़ा है। ग्राहक निश्चित रूप से एक बड़े बदलाव की उम्मीद करेंगे जिसके लिए अन्य बातों के साथ ही, उत्साही युवा पेशेवरों को शामिल करने, केबिन क्रू केकौशल प्रशिक्षण, सुविधाओं के बड़े पैमाने पर नयापन लाने और निवेश करने की आवश्यकता है।’ वह बताते हैं कि 1970 के दशक में एक वक्त ऐसा था, जब एयर इंडिया ने सिंगापुर इंटरनैशनल एयरलाइंस (एसआईए) कर्मियों के प्रशिक्षण और विकास का समर्थन किया था और इसे दुनिया में सबसे बेहतर में से एक बनने में मदद की थी।
राजन कहते हैं, ‘यह उचित होगा कि उस निवेश का इस्तेमाल अब एयर इंडिया के कर्मचारियों की एक नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करने में मदद के साथ की जाए जो काफी हद तक विस्तारा की तरह ही हो। निश्चित रूप से, ग्राहक विश्वस्तरीय प्रदर्शन से कम की उम्मीद नहीं करेंगे जिसे टाटा पहले ही ‘ताज होटल्स’ में दिखा चुके हैं जो होटल के क्षेत्र में शानदार और लक्जरी सेवाएं देने के लिए मशहूर है।’ टाटा समूह ने 2013 में मलेशिया की विमानन कंपनी एयर एशिया के साथ साझेदारी कर एक नई विमानन कंपनी की घोषणा की और बाद में एसआईए के साथ साझेदारी के जरिये विस्तारा लॉन्च किया।
जब टाटा के पूर्व सलाहकार संजय सिंह ने डीजीसीए के एक अधिकारी से पूछा कि भारत में एक विमानन कंपनी शुरू करने के लिए आवेदन कैसे लिखा जाए तो अधिकारी ने जवाब दिया, ‘टाटा का हिस्सा होते हुए आपसे परामर्श लेने की अपेक्षा नहीं की जाती है बल्कि परामर्श देने की अपेक्षा की जाती है।’ सिंह ने यह टिप्पणी अपने एसआईए के समकक्षों को दी। इसके तुरंत बाद आवेदन देने के लिए दोनों पक्षों ने एक आंतरिक टीम बनाई। सिंह कहते हैं, ‘डीजीसीए के पास दिए गए आवेदन में एक भी वाक्य ऐसा नहीं था जिसे किसी सलाहकार ने लिखा हो।’ एक दशक पहले, टाटा ने भारत में विमानन क्षेत्र का एक नया खाका तैयार किया था। अब एयर इंडिया सक्षम हाथों में वापस आ गई है तो यह ब्रांड राहत की सांस ले सकता है।