मेरा अनुभव बताता है कि रियल एस्टेट कारोबार की सफलता की पुरानी कहानियां आम तौर पर नए हालात में लागू नहीं होती हैं।
हमें हालात के साथ खुद को बदलना आना चाहिए यानी जैसा समय हो, वैसी ही कारोबारी नीतियां भी हों। अकीरा मोरी
अगर अकीरो मोरी सरीखे लोगों के अनुभवों से सीख लेकर और वक्त की चाल भांपकर रियल एस्टेट सेक्टर खुद को बदल लेता तो आज तस्वीर कुछ और ही होती।
कम से कम 2001 से 2007 के स्वर्णिम दौर में लगातार नित नई और बुलंद इमारतों को खड़ा करने वाले इन कारोबारियों के पैरों तले जमीन 2008 में यूं अचानक तो न खिसक जाती।
जबकि प्रॉपर्टी के मुंहमांगे दाम वसूल कर दोनों हाथों से लड्डू बटोरने में व्यस्त इन कारोबारियों को मंदी की आहट पाते ही 2007 के आखिर से विशेषज्ञ चेताने लगे थे।
इसके बावजूद उन्होंने मोटा मुनाफा कमाने के लिए ऊंचे दामों की अपनी रणनीति बरकरार रखी। और अगर कुछ ने हालात के साथ अपने को बदला भी तो मामूली तौर पर।
उन्होंने भी कीमत सीधे-सीधे न घटाकर प्रॉपर्टी के साथ तमाम तरह की आकर्षक योजनाओं के साथ लोगों को लुभाने की रणनीति अपनाई।
वैसे दाम न घटाने के पीछे उनकी भी कुछ मजबूरियां भी थीं। मसलन, मंदी के आने से पहले ही ये कारोबारी ऊंची कीमतों पर तमाम जगहों पर बड़ी-बड़ी जमीनें खरीद कर ऊंची लागतों पर ढेरों प्रोजेक्ट खड़े चुके थे।
चांदी काटने की इसी होड़ ने रियल एस्टेट के ताबूत में पहली कील ठोंकी, और वह यह कि बड़े शहरों में मांग से कहीं ज्यादा सप्लाई हो गई।
अब हालत यह है कि इन योजनाओं में इतनी बड़ी तादाद में रकम फंसाने के बाद इन्हें खरीदारों को चिराग लेकर ढूंढ़ना पड़ रहा है।
जाहिर है, ऊंची लागत में तैयार किए प्रोजेक्ट्स और गधे के सिर के सींग की तरह से गायब खरीदारों ने उन्हें सांप-छछूंदर वाली हालत में पहुंचा दिया है।
और जब तैयार प्रोजेक्ट ही न बिक पा रहे हों तो ऐसे में नए प्रोजेक्ट शुरू करना तो उनके लिए आ बैल मुझे मार वाली मिसाल ही है।
नए की तो खैर बात ही छोड़िए, धराशाई हो चुके शेयर बाजार, ऊंची ब्याज दरें और मंदी से घबराकर कर्ज बांटने में फूंक-फूंक कर कदम रख रहे बैंकों के चलते उनके लिए अधबने प्रोजेक्ट को ही पूरा करने के लिए धन जुटाने में खासे पापड़ बेलने पड़ रहे हैं।
मांग में कमी का आलम तो यह है कि चाहे वह रिहाइशी संपत्ति हो या फिर ऑफिस या रिटेल, सभी जगह यह इस साल अब तक 30 फीसदी तक गिर चुकी है।
हालत यह है कि चंद दिनों पहले रियल एस्टेट की महारथी कंपनी डीएलएफके चेयरमैन के.पी. सिंह को सार्वजनिक रूप से यह दुखड़ा रोना पड़ गया कि घरों के लिए खरीदार ढूंढ़े नहीं मिल रहे हैं।
हालांकि इसके बाद डीएलफ के साथ-साथ यूनीटेक ने भी मरता क्या न करता कि तर्ज पर कीमतों में 10 फीसदी कटौती का ऐलान कर दिया। और यह सिलसिला यहीं नहीं थमा, बल्कि बिल्डरों के दो प्रमुख संगठनों ने भी मिलकर दामों में 5 से 10 फीसदी की कमी कर दी।
इसके अलावा, एस्टेट एजेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया के आंकड़े बता रहे हैं कि ग्रेटर नोएडा, नोएडा, गुड़गांव और मुंबई जैसे शहरों में रिटेल क्षेत्र में भी किराए में 15 से 30 प्रतिशत की कमी आ चुकी है।
इसके बावजूद उन्हें राहत नहीं मिल सकी क्योंकि गिरावट का सिलसिला देखकर ग्राहक भी चौकन्ने हो गए। वे कीमतें और गिरने की आस में दम साध कर बैठ गए।
ग्राहकों की यह रणनीति उनके लिए और महंगी साबित हो रही है क्योंकि ऊंची ब्याज दरों के चलते अगर एक साल उनकी प्रॉपर्टी नहीं बिकी तो उसकी कीमत का अमूमन 20 प्रतिशत खर्च उन्हें और झेलना पड़ जाएगा।
अब रियल एस्टेट सेक्टर और दाम घटाने की बजाय बैंकों से गुहार लगा रहा है कि वे ब्याज दर घटाकर 7 फीसदी कर दें। जबकि हाल ही में जारी हुई गोल्डमैन साच की एक रिपोर्ट साफ कह रही है कि महंगाई के चलते लोगों पर बढ़ा बोझ ।
मंदी के चलते गिरी बोनस- वेतन बढ़ोतरी पर गाज के चलते उनके सामने संपत्तियों के दाम में तकरीबन 30 फीसदी तक कमी करने के अलावा कोई चारा नहीं है।
ऐसे में अहम सवाल यह उठता है कि बैंक ब्याज दरें घटाएं या फिर रियल एस्टेट कारोबारी दाम और कम करें? इसी का जवाब बिानेस स्टैंडर्ड ने व्यापार गोष्ठी के माध्यम से देशभर के प्रबुध्द पाठकों, कारोबारियों और विशेषज्ञों से जानने की कोशिश की है।