कामत समिति ने ऋण पुनर्गठन योजना के लिए कोविड-19 से प्रभावित 26 क्षेत्रों की पहचान की है जिनमें लौह और अलौह धातु वाली कंपनियां भी शामिल हैं। यह योजना बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों द्वारा लागू की जानी है।
समिति ने समाधान योजना के कार्यान्वयन के लिए सीमांकन के तौर पर इन सभी क्षेत्रों में विभिन्न सीमाओं वाले पांच प्रमुख अनुपात चिह्नित किए हैं। ये पांच प्रमुख अनुपात हैं – कुल बाहरी देनदारी/समायोजित वास्तविक शुद्ध संपत्ति (टीओएल/समायोजित टीएनडब्ल्यू), कुल ऋण/एबिटा, वर्तमान अनुपात, ऋण सेवा कवरेज अनुपात (डीएससीआर) और औसत ऋण सेवा कवरेज अनुपात (एडीएससीआर)।
इस्पात क्षेत्र के लिए, जो कोविड-19 से पहले भी दबाव में था और वर्तमान में इस पर 2.66 लाख करोड़ रुपये का ऋण है, ऋण/एबिटा अनुपात 5.3 और अलौह क्षेत्र के लिए 4.5 रखा गया है।
इक्रा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष जयंत रॉय ने बताया कि एबिटा के मुकाबले कुल ऋण के लिए लौह और इस्पात क्षेत्र की सीमा 5.3 गुना है, जबकि अलौह धातु क्षेत्र के लिए यह 4.5 गुना है। उन्होंने कहा कि अलौह धातु कंपनियों के मुकाबले इस्पात कंपनियों की लाभ उठाने की मौजूदा क्षमता और/या मध्य अवधि के दौरान दबावग्रस्त इस्पात कंपनियों के लिए एबिटा की धीमी सुधार की उम्मीद के कारण ऐसा हो सकता है।
विश्लेषकों का कहना है कि इस क्षेत्र में मध्य आकार वाली कंपनियों के साथ यह दिक्कत रहेगी। रॉय ने कहा कि सूचीबद्ध मध्य आकार वाली 17 इस्पात कंपनियों के लिए वित्त वर्ष 2020 की पहली छमाही के बाद अनुमानित ऋण/एबिटा आठ गुना से ज्यादा था। मार्च 2019 में यह 5.6 गुना था। इस्पात क्षेत्र में लगभग 50 फीसदी उत्पादन में इस्पात की बड़ी एकीकृत कंपनियों का योगदान रहता है। शेष योगदान द्वितीयक उत्पादकों का होता है जो कोविड-19 से अधिक प्रभावित हुए हैं तथा अब भी संकट से जूझ रहे हैं। उदाहरण के लिए एकीकृत उत्पादक 85 से 90 फीसदी क्षमता स्तर पर काम कर रहे हैं, लेकिन इस क्षेत्र में औसत क्षमता उपयोग लगभग 60 फीसदी है। एक विश्लेषक का कहना है कि इससे उस समस्या का आभास होता है, जो द्वितीयक उत्पादक झेल रहे हैं।
एक द्वितीयक उत्पादक ने कहा कि बड़ी संख्या में कंपनियां अनुपात के कारण इस ढांचे का लाभ नहीं उठा पाएंगी। उन्होंने कहा कि इसके अलावा इसे दिसंबर तक बंद किया जाना है जो बहुत मुश्किल है क्योंकि मौजूदा हालात में अनुमान लगाना संभव नहीं है।
मध्य आकार की एक एल्युमीनियम कंपनी ने कहा कि इस ढांचे में हमारे जैसी कंपनियों के लिए संभावना नहीं है।
हालांकि, श्रेय इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस के वाइस चेयरमैन सुनील कनौडिय़ा ने कहा कि कामत समिति ने ऋणदाताओं को बहुत गुंजाइश प्रदान की है। अलबत्ता उन्होंने कहा है कि यह हर किसी के लिए उपयुक्त नहीं होगा। भारत में छोटी, मध्य और बड़ी कंपनियां हैं और इन सभी की अलग-अलग समस्याएं होती हैं। उन्होंने कहा कि सबके लिए एक उपाय संभव नहीं है।
इसके बावजूद कनौडिय़ा का मानना है कि कई कंपनियां इस ढांचे के तहत आएंगी। कुछ कंपनियां, खास तौर परमध्य आकार की कंपनियों के सामने एक चुनौती होगी। बैंकों को इक्विटी लेने के मामले में कुछ कमी या कुछ पुनर्गठन करना होगा अथवा अस्थायी ऋण का कुछ पुनर्गठन करना होगा तथा स्थायी ऋण निर्धारित आंकड़े पूरे कर सकता है। इस ढांचे से भी समाधान निकल सकते हैं।