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झूलते कारोबार ने किया निराश

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Last Updated- December 09, 2022 | 4:03 PM IST

वाहन उद्योग के लिए नए मॉडलों की रफ्तार के बावजूद यह साल बहुत अच्छा नहीं रहा।


नैनो से पर्दा उठने के साथ 2008 की शुरुआत तो अच्छी रही थी और उसके बाद टाटा मोटर्स ने जगुआर-लैंडरोवर पर कब्जा करके दुनिया भर में तहलका मचा दिया।

लेकिन उसके बाद बढ़ती लागत, रिटेल कर्ज की कमी और ठंडी मांग ने सब ठंडा कर दिया। जनवरी से नवंबर के बीच बिक्री में दरअसल पिछले साल के मुकाबले इजाफा हुआ। मुंजाल के हीरो समूह ने दोपहिया के साथ विमानन उद्योग की तरफ भी इस साल कदम बढ़ाए।

दोपहिया कंपनियों में बजाज ऑटो और टीवीएस मोटर के बीच कानूनी लड़ाई भी काफी दिलचस्प रही। इसके अलावा उत्पादन में कटौती के ऐलान भी एक के बाद एक तमाम कंपनियों की ओर से आए।

दूरसंचार में आई खुशी की कॉल

मंदी के होहल्ले के बीच दूरसंचार ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र रहा, जो प्रतिकूल परिस्थितियों को ठेंगा दिखाता रहा। दूरसंचार कंपनियों को तो मंदी का फायदा हुआ क्योंकि कंपनियों ने सफर के बजाय फोन कॉल्स से ही काम चलाना शुरू कर दिया।

नए दूरसंचार ऑपरेटरों की आमद, अतिरिक्त स्पेक्ट्रम और 3जी सेवाओं के लॉन्च की खुशखबरी मिलती रहीं। नंबर पोटर्ेबिलिटी की दिक्कत रही, लेकिन विस्तार जारी रहा। साल का अंत है और भारत में 30 करोड़ टेलीफोन उपभोक्ता हो गए हैं, इसी से सब कुछ साबित हो जाता है।

स्पेक्ट्रम आवंटन पर हायतौबा मचती रही और स्वान, यूनिटेक का मसला खूब चमका। लेकिन जापानी दिग्गज दोकोमो 13,070 करोड़ रुपये का निवेश कर भारत में आई। एमटीएन की एयरटेल और आरकॉम से बातचीत भी सुर्खियों में रही।

रिटेल के लिए मिलाजुला खेल

संगठित रिटेल के लिहाज से यह साल खासा अच्छा रहा, लेकिन कारोबारी लिहाज से मामला मिला जुला ही रहा। किरायों और लागत की मार ने पहले रिटेलरों को परेशान किया और उसके बाद ग्राहकों की कमी ने उन्हें जमकर सताया।

लेकिन विदेशी खिलाड़ियों की आमद के साथ विस्तार जारी ही रहा। रिटेल क्षेत्र में हाल फिलहाल 14,200 करोड़ रुपये के निवेश के ऐलान भी खुश करने वाले रहे। लेकिन दूसरी छमाही में मंदी का असर देखने को मिला और रिटेलरों के खजाने में सेंध लगे।

लेकिन जॉर्जियो अरमानी, रोजबी, मार्क ऐंड स्पेंसर के साथ देशी दिग्गजों के नए उपक्रमों ने उम्मीद की लौ को बुझने नहीं दिया। मगर मुकेश अंबानी के रिलायंस रिटेल को उत्तर प्रदेश में सरकारी नीतियों की वजह से तालाबंदी पर भी मजबूर होना पड़ा।

रियल्टी ने गिनी गिनती उलटी

रियल्टी उद्योग के लिए 2008 बुरे सपने की तरह साबित हुआ, जब उनका बुलबुला फूट गया। मंदी की वजह से नकदी के संकट ने बड़ी परियोजनाओं को जहां का तहां रोक दिया। हालांकि साल की शुरुआत एम्मार एमजीएफ और बीपीटीपी के कारनामों की वजह से अच्छी हुई।

लेकिन बाद में जमीन की बढ़ती कीमतों से ग्राहक बिफर गए और बैंकों की सख्ती ने कोढ़ में खाज का काम किया। आलम यह हुआ कि रियल्टी शेयर पानी मांगने लगे और बीएसई पर 14 रियल्टी शेयरों का सूचकांक 80 फीसदी गिर गया। डीएलएफ जैसी दिग्गज के शेयर भी जमीन पर आ गए।

कुछ रियल्टी कंपनियों को तो आईपीओ भी रद्द करने पड़े। लीमन ब्रदर्स की इन कंपनियों में हिस्सेदारी थी, इसलिए उसके दिवालिया होने का भी तगड़ा असर दिखा।

एफएमसीजी ने मनाईं खुशियां

एफएमसीजी कंपनियों की सेहत पर 2008 में कोई बुरा असर नहीं हुआ और उन्हें मुनाफे की खुराक मिलती रही। बड़े-बड़े अधिग्रहण, नए सौदे, बेहतरीन उत्पाद और ग्राहकों के प्यार ने इस क्षेत्र को मंदी से बिल्कुल बेअसर रखा।

इमामी ने झंडु फार्मास्युटिकल को तकरीबन 700 करोड़ रुपये में खरीदा और डाबर ने फेम केयर में 240 करोड़ रुपये लगाकर 72 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी। इसी से पता चलता है कि यह क्षेत्र मंदी से अछूता रहा।

डाबर, गोदरेज कंज्यूमर और मैरिको ने अधिग्रहण से नए बाजार भी हासिल किए और सबसे बड़ी बात यह रही कि ग्रामीण इलाकों से इन कंपनियों को खासे ग्राहक मिले। ज्यादातर बड़ी कंपनियों ने गांवों से कमोबेश 50 फीसदी राजस्व हासिल किया, जो उनके लिए अच्छे भविष्य का संकेत है।

आईटी को लगा मंदी का झटका

लगातार कई साल से शानदार कारोबारी इजाफा करने वाली आईटी कंपनियों को इस बार एक के बाद एक परेशानी मिलीं। शुरुआत तो अच्छी रही, लेकिन साल के मध्य में डॉलर के 40 रुपये से नीचे पहुंचते ही उनके मुनाफे पर सेंध लगनी शुरू हो गई क्योंकि विदेशी ग्राहकों से कमाई कम हो गई।

हालांकि डॉलर सुधर गया, लेकिन अमेरिका और यूरोप की मंदी ने इन्फोसिस, टीसीएस, विप्रो और सत्यम के साथ तमाम बड़ी कंपनियों को परेशान कर दिया। सौदों में देर और ग्राहक कंपनियों की पतली हालत ने इन कंपनियों को भी दिक्कत में डाल दिया।

हालांकि सिटी ग्रुप की कंपनियों के अधिग्रहण जैसे कारनामे भारतीय दिग्गजों ने किए, लेकिन सत्यम के साथ जुड़ा विवाद साल बीतते-बीतते स्वाद कड़वा कर गया।

टीवी, फ्रिज पर भी पड़ी मार

कंज्यूमर डयूरेबल्स बनाने वाली कंपनियों ने साल की शुरुआत तो अच्छे तरीके से की और उन्हें ग्राहक भी खूब मिले। बजट के बाद और होली के आसपास बिक्री खूब हुई, लेकिन दिवाली आते-आते हालात बदल गए।

कच्चे माल ने उनकी लागत को बढ़ाया, जिससे मार्जिन पर असर पड़ा। उसके बाद डॉलर की बढ़ती कीमत ने आयात महंगा किया और आखिर में मंदी की वजह से ग्राहकों की संख्या में गिरावट आई।

त्योहारी सीजन में भी इस बार सैमसंग, एलजी, सोनी, गोदरेज, फिलिप्स और व्हर्लपूल जैसी कंपनियों की बिक्री उम्मीद से कम ही रही।

साल के अंत तक तो कई कंपनियों ने उत्पादन में कटौती और छंटनी की बात भी कह डाली। एसी और महंगे फ्रिज जैसे उत्पादों की बिक्री तो पटरी से बिल्कुल ही उतर गई है।

जमीन पर गिरा विमानन उद्योग

हवाई सफर कराने वाली कंपनियों के लिए यह साल अच्छा नहीं रहा। एटीएफ की बढ़ती कीमत ने उन्हें मारा और उसके बाद वैश्विक मंदी ने रही सही कसर पूरी कर दी। वैश्विक विमानन उद्योग को हुए घाटे का तकरीबन एक तिहाई हिस्सा तो भारतीय कंपनियों को ही झेलना पड़ा है।

हालांकि एक दूसरे से हाथ मिलाकर और सरकारी मदद से कंपनियों ने यह साल गुजार ही दिया। जेट एयरवेज और किंगफिशर ने हाथ मिलाकर सबको चौंका दिया और देशी-विदेशी कंपनियों की उड़ानों में कमी भी खास बात रही।

खुशगवार पहलू यही रहा कि दुनिया में 31 एयरलाइंस दिवालिया हुईं और उनमें भारत की कोई भी नहीं थी। हालांकि जेट ईंधन की कीमत गिरीं, लेकिन मंदी की वजह से कॉर्पोरेट जगत ने सफर कम कर दिया और बात वहीं आ गई।

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First Published - December 30, 2008 | 11:32 PM IST

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