बीमा कंपनियों का विलय स्थगित

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 15, 2022 | 5:08 AM IST

केंद्र सरकार ने आज कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र की 3 साधारण बीमा कंपनियों के विलय की प्रक्रिया रोकने का फैसला किया गया है। मंत्रिमंडल की बैठक के बाद सरकार ने कहा कि अब इन कंपनियों की मुनाफा के साथ वृद्धि पर जोर होगा। मंत्रिमंडल ने तीन बीमा कंपनियों में 12,450 करोड़ रुपये डालने का फी फैसला किया है, जिसमें इस साल फरवरी में डाला गया 2,500 करोड़ रुपये भी शामिल है।
पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा, ‘मौजूदा स्थिति को देखते हुए विलय की प्रक्रिया फिलहाल रोक दी गई है और इसके बजाय अब उनके सॉल्वेंसी और पूंजी डालने के बाद उनके लाभ देने वाले विकास पर होगा।’
12,500 करोड़ रुपये में से सरकार तत्काल 3,475 करोड़ रुपये देगी और शेथ 6,475 करोड़ रुपये बाद में दिए जाएंगे। इस साल बजट में सरकार ने इन तीन इकाइयों के पुनर्पूंजीकरण के लिए 6,950 करोड़ रुपये रखे थे क्योंकि यह तीनों कंपनियां सॉल्वेंसी अनुपात के मोर्चे पर जूझ रही थीं।
सार्वजनिक क्षेत्र की तीन साधारण बीमा कंपनियों में दिल्ली की ओरिंटएल इंश्योरेंस कंपनी, कोलकाता की नैशनल इंश्योरेंस कंपनी और चेन्नई की यूनाइटेड इंडिया इंश्यरेंस कंपनी लिमिटेड शामिल हैं।
कैबिनेट ने नैशनल इंश्योरेंस कंपनी की प्राधिकृत पूंजी बढ़ाकर 7,500 करोड़ रुपये और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस की 5,000 करोड़ रुपये करने को मंजूरी दे दी है।
पीआईबी की विज्ञप्ति मेंं कहा गया है, ‘पूंजी डाले जाने से  इन तीन सार्वजनिक क्षेत्र की साधारण बीमा कंपनियों को अपनी वित्तीय और सॉल्वेंसी की स्तिति सुधारने और अर्थव्यवस्था की बीमा की जरूरतें हासिल करने, बदलावों को समाहित करने और संसाधन के लिए क्षमता बञढ़ाने और जोखिम प्रबंधन में सुधार करने में मदद मिलेगी।’
सार्वजनिक क्षेत्र की एक बीमाकर्ता के अधिकारी ने कहा, ‘मौजूदा कोविड के दौर में विलय की प्रक्रिया कठिन होती।’ 
उद्योग के विशेषज्ञों ने कहा कि विलय के पीछे पूरा मकसद विलय के बाद बनी इकाई को सूचीबद्ध कराना और पूंजी जुटाना और सरकारी इक्विटी कम करना था। मौजूदा परिदृश्य में तीनों फर्में अच्छी स्थिति में नहीं हैं और अगर ऐसे में इनका विलय कर सूचीबद्धता कराई जाती तो इससे सरकार की उम्मीदें कम ही पूरी होतीं। आश्विन प्रकाश एडवाइजरी सर्विसेज के मैनेजिंग पार्टनर आश्विन पारेख ने कहा, ‘दरअसल किसी भी तरीके से विलय प्रक्रिया की राह नहीं निकल रही थी। विलय का अंतिम लक्ष्य आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) लाना था और कंपनियों की वित्तीय हालत को देखते हुए आईपीओ व्यावहारिक नहीं होता तो फिर विलय का क्या मतलब बनता है।’
उन्होंने कहा, ‘आदर्श रूप में उन्हें कंपनियों को उपलब्ध बेहतरीन दाम पर निजी क्षेत्र को बेचना चाहिए था। उचित मूल्य पर कंपनियों को कुछ बाजार हिस्सेदारी मिल जाती, कम से कम कारोबारी स्थिति सुधर जाती। अनन्यथा यह धीरे धीरे कारोबार समेटने की ओर जा रही हैं।’
2018-19 के केंद्रीय बजट में सरकार ने 3 सार्वजनिक क्षेत्र की साधारण बीमा कंपनियों के विलय और नई इकाई की शेयर बाजार में सूचीबद्धता की मंशा की घोषणा की थी। महामारी के कारण विलय की प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया क्योंकि सरकार का ध्यान महामारी की ओर केंद्रित हो गया।
इस साल जनवरी में इन सभी तीनों फर्मों के बोर्ड ने विलय को मंजूरी दे दी ती। पिछले साल 3 फर्मों ने ईवाई को विलय का खाका पेश करने के लिए नियुक्त किया था। उसने प्रक्रिया दिसंबर 2020 या जुलाई से शुरू होने के 18 महीने में में पूरा करने की सिफारिश की थी।
वित्त वर्ष 20 की तीसरी तिमाही में नैशनल इंश्योरेंस का सॉल्वेंसी रेश्यो 1.01 था, जबकि नियामकीय जरूरत 1.5 की होती है। सॉल्वेंसी रेश्यो बीमा कंपनियों की वित्तीय सेहत का मुख्य संकेतक होता है। गैर जीवन बीमा कर्ताओं के मुनाफे के मापन के लिए इसका संयुक्त अनुपात 173 प्रतिशत रहा है। अगर संयुक्त अनुपात 100 से नीचे रहता है तो फर्म मुनाफे में होती है।

First Published : July 9, 2020 | 12:07 AM IST