उद्योग

ईंधन लागत पास-थ्रू और सुधारों से बदली तस्वीर, दशक भर बाद बिजली वितरण कंपनियां मुनाफे में लौटीं

ईंधन की लागत को स्वतः बिजली की कीमत में शामिल किए जाने के 3 साल पहले के सरकार के फैसले ने इसमें अहम भूमिका निभाई है

Published by
सुधीर पाल सिंह   
Last Updated- January 25, 2026 | 10:41 PM IST

बिजली क्षेत्र में राजस्व सृजन में अहम भूमिका निभाने वाले बिजली वितरण क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। ईंधन की लागत को स्वतः बिजली की कीमत में शामिल किए जाने के 3 साल पहले के सरकार के फैसले ने इसमें अहम भूमिका निभाई है। दिसंबर 2022 में लागू किए गए इस एक कदम से केंद्र ने लागत के आधार पर शुल्क निर्धारण की व्यवस्था की कमी का काफी हद तक समाधान कर दिया और एक दशक से अधिक समय के बाद 2024-25 में बिजली वितरण कंपनियां मुनाफे में आ गई हैं। 

बिजली की लागत में ईंधन प्राथमिक घटक है, जिसकी कुल औसत आपूर्ति लागत (एसीएस) में हिस्सेदारी 70 से 80 प्रतिशत होती है।  बिजली वितरण कंपनियों को यह सबसे परेशान करने वाला घटक रहा है। इसकी वजह से एसीएस और औसत प्राप्त राजस्व (एआरआर) में अंतर घटाने की काफी कवायद करनी पड़ती थी।  स्थिति तब बदली, जब दिसंबर 2022 में बिजली मंत्रालय  ने बिजली अधिनियम 2005 के नियम 14 में बदलाव करते हुए ईंधन और बिजली खरीद लागत समायोजन (एफपीपीसीए) अनिवार्य कर दिया। इस नियम के कारण  ईंधन और बिजली खरीद समायोजन अधिभार (एफपीपीएएस) का बोझ स्वतः ही खरीदारों पर चला जाता है। इस बदलाव से बिजली की दरों में बदलाव को राजनीति से अलग कर दिया गया। 

इस बदलाव के बाद ऐसे राज्यों की संख्या बढ़ गई है, जहां बिजली नियामकों ने ईंधन की लागत स्वतः ही बिजली की कीमत में शामिल करने का प्रावधान कर रखा था। पिछले वित्त वर्ष (2024-25) के अंत में 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 30 ने नियम 14 के अनुरूप नियमों को जारी करते हुए इस बदलाव को लागू कर दिया। एक साल पहले यह संख्या 24 थी। पिछले वित्त वर्ष में सभी रेटेड बिजली वितरण कंपनियों के लिए 7.10 रुपये प्रति यूनिट की औसत आपूर्ति लागत में ईंधन की लागत 75 प्रतिशत, या 5.38 रुपये प्रति यूनिट थी।

 नियम 14 में बदलाव से लागत के मसले का समाधान हुआ, वहीं सटीक बिलिंग को बढ़ावा देने के लिए स्मार्ट मीटर लगाए गए। इससे एसीएस-एआरआर अंतर को  कम करने में मदद मिली। स्मार्ट मीटर लगाने से बिलिंग दक्षता बढ़ी है। 2022-23 में प्रति दिन 4,000 मीटर लगाए गए, जो 2023-24 में बढ़कर प्रति दिन 14,000 कर हो गए। मई 2025 तक यह संख्या बढ़कर 1,15,000 प्रति दिन हो गई, जिससे स्थापित स्मार्ट मीटरों की कुल संख्या 3.14 करोड़ हो गई।

आश्चर्य की बात नहीं है कि 2024-25 में, 21 युटिलिटी की बिलिंग दक्षता बिजली मंत्रालय द्वारा निर्धारित 92 प्रतिशत सीमा को पार कर गई। इसके अलावा 17 युटिलिटीज ने पिछले वित्त वर्ष में 100 प्रतिशत संग्रह दक्षता की सूचना दी। इसमें आंध्र प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक और केरल सहित वाणिज्यिक और लाइन नुकसान के पारंपरिक रूप से उच्च स्तर वाले कुछ बड़े डिस्कॉम शामिल हैं।

 बिजली उपयोगिताओं के लिए एसीएस-एआरआर अंतर 2013-14 में 78 पैसे प्रति यूनिट से मामूली रूप से घटकर 2020-21 में 65 पैसे प्रति यूनिट हो गया था, 2024-25 में तेजी से घटकर मात्र 6 पैसे प्रति यूनिट रह गया। बिजली मंत्रालय द्वारा प्रकाशित नवीनतम डिस्कॉम रैंकिंग में इसकी जानकारी दी गई है। 

फरवरी 2021 और जून 2023 के बीच बिजली सचिव रहे और इन सुधार उपायों के कार्यान्वयन की देखरेख करने वाले आलोक कुमार ने कहा, ‘ईंधन लागत को बिजली की कीमतों में शामिल किएजाने के मसले के समाधान और स्मार्ट मीटरिंग में तेजी लाने के अलावा दो अन्य कारकों ने डिस्कॉम की सेहत सुधारी है। इसमें 2021 में शुरू की गई नवीनीकृत वितरण क्षेत्र योजना (आरडीएसएस) का कार्यान्वयन और राज्यों को डिस्कॉम में अनिवार्य सुधारों से जुड़े अपने सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के 0.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त वित्तीय संसाधन जुटाने की अनुमति शामिल है।’

First Published : January 25, 2026 | 10:41 PM IST