भारतीय दिवाला व शोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) के प्रथम चेयरपर्सन एम. एस. साहू ने ‘बिज़नेस स्टैंडर्ड डायलॉग’ में कहा कि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) कारोबारी चक्रों को अधिक जल्दी लाएगी व पैनी बनाएगी। इससे बाजार में काफी अधिक तनावग्रस्त परिसंपत्तियां आएंगी।
आईबीबीआई के पूर्व प्रमुख साहू ने दिवाला और अक्षमता संहिता (आईबीसी) के 10 वर्ष पूरे होने और इस पर एआई के प्रभाव के विषय में कहा, ‘यह (एआई) वास्तविकता में पारिस्थितकीतंत्र पर बोझ बढ़ा देगी।’
उन्होंने आईबीसी के तहत परिचालन लेनदारों के रूप में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के साथ खराब व्यवहार पर प्रकाश डाला। साहू ने कहा, ‘एमएसएमई को आज व्यावहारिक रूप से शून्य राशि मिल रही है… यह बड़ी चिंता का विषय है। यह कानून और इसकी समझ में बुनियादी गलती है।’
वित्तीय लेनदारों के विपरीत परिचालन लेनदार चार श्रेणियों में आते हैं। इन चारों में से प्रत्येक ‘वॉटरफॉल मैकेनिज्म’ में अलग-अलग स्तरों पर हैं। ‘वॉटरफॉल मैकेनिज्म’ पुनर्प्राप्त राशि के वितरण की प्राथमिकता तय करता है। उच्चतम स्तर पर श्रमिक, फिर कर्मचारी, उसके बाद सरकारी बकाया और अंत में आपूर्ति विक्रेता व एमएसएमई आते हैं। साहू ने वित्तीय लेनदारों के शक्तियों के दुरुपयोग और ‘कमर्शियल विजडम’ की अवधारणा की निंदा की।
साहू ने कहा, ‘95 प्रतिशत परिचालन लेनदारों के पास व्यावसायिक विवेक है और 95 प्रतिशत वित्तीय लेनदारों के पास व्यावसायिक विवेक नहीं है। उनका (एफसी) काम पाई का आकार बढ़ाना है, न कि उसे विभाजित करना।’ उन्होंने कहा कि समाधान योजना और परिसमापन दोनों ही तनाव को हल करने के समान प्रभावी तरीके हैं लेकिन मौजूदा प्रणाली में सबसे बड़ी कमी मामलों को हल करने में लगने वाले दिनों की संख्या है। आईबीबीआई के आंकड़ों के अनुसार मार्च 2026 तक आईबीसी के तहत मंजूर किए गए दावों के मुकाबले वसूली 30.56 प्रतिशत रही जबकि यह पिछले साल 32.8 प्रतिशत थी।