सरकार वोडाफोन कर विवाद में मध्यस्थता पंचाट के फैसले को चुनौती देने का मन बनाने के बाद अंतरराष्ट्रीय पेंशन एवं बीमा फंडों को भी साधने में जुट गई है। एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि सरकार इन संस्थानों को भरोसे में लेने और उन्हें आवश्स्त करने में पीछे नहीं रहना चाहती है।
शुक्रवार को हेग के मध्यस्थता पंचाट ने भारत सरकार के साथ चल रहे कर विवाद में निर्णय वोडाफोन इंटरनैशनल होल्डिंग बीवी के पक्ष में सुनाया था। वोडाफोन इंटरनैशनल होल्डिंग बीवी संकटग्रस्त दूरसंचार कंपनी वोडाफोन आइडिया लिमिटेड की मातृ कंपनी है। वित्त मंत्रालय का स्पष्ट मत है कि जब भी कंपनी पंचाट का फैसला लागू कराने के लिए यहां की किसी अदालत में आएगी तो उसकी याचिका का विरोध किया जाएगा। इस बारे में एक सूत्र ने नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर बताया, ‘संसद में पुरानी तारीख से लागू होने वाले कर पर चर्चा हुई थी और कर वसूलने के सरकार के अधिकार के पक्ष में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित हुआ था। ऐसे में इसके प्रावधान में कोई ढील नहीं दी जा सकती।’
पंचाट के निर्णय के खिलाफ सरकार के पास सिंगापुर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र में भी अपील करने का विकल्प है और इस पर करीब 85 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इनमें 45 करोड़ रुपये अब तक जुटे कर और 40 करोड़ रुपये पंचाट द्वारा ली जाने वाली रकम के रूप में शामिल होंगे। विभिन्न कारणों से सिंगापुर सभी वाणिज्यिक विवादों के लिए पंसदीदा मध्यस्थता केंद्र रहा है।
हालांकि वित्त मंत्रालय का कहना है कि इस रुख से नुकसान भी हो सकता है और इससे भारत में निवेश करने को लेकर पेंशन फंडों और बीमा कंपनियों में फिर से जगा उत्साह ठंडा पड़ सकता है। मंत्रालय को उम्मीद है कि प्रस्तावित नैशनल इन्वेस्टमेंट पाइपलाइन के जरिये आने वाले अनुमानित 100 लाख करोड़ रुपये में एक बड़ा हिस्सा विदेशी पेंशन एंव बीमा फंडों से आएगा। दूसरी तरफ इन फंडों की चिंता यह है कि भारत ज्यादातर देशों के साथ अपनी कर संधियों में मध्यस्थता के लिए औपचारिक विकल्प मुहैया नहीं कराता है। सरकार ने 2016 में द्विपक्षीय निवेश सुरक्षा समझौते (बीआईपीए) की जगह संशोधित द्विपक्षीय निवेश संधि (बीआईटी) का ढांचा तैयार किया था और तब से मध्यस्थथ को लेकर यही स्थिति है।
नए बीआईटी के प्रावधानों का झुकाव सरकार के पक्ष में है। 2016 से अब तक पिछले चार वर्षों की अवधि में बीआईपीए के तहत करीब 70 समझौतों का नवीकरण होना था, लेकिन इनमें किसी का भी नवीकरण नहीं हुआ। पेंशन एवं सॉवरिन वेल्थ फंडों को सलाह देने वाली एक विधि कंपनी के एक प्रतिनिधि ने कहा, ‘बीआईटी के तहत सरकार को अधिक अधिकार मिले हैं, जिन्हें लेकर इन फंडों के मन में चिंता है। अगर सरकार एक खास रुख रखती है और इसे लेकर कोई समझौता नहीं हो सकता तो फिर मध्यस्थता के लिए जगह नहीं बचती है।’
मध्यस्थता पंचाट के फैसलों के प्रति भारत का रवैया दोस्ताना नहीं रहा है। भारत ने अब तक सेंटर फॉर सेटलमेंट ऑफ इन्वेस्टमेंट डिसप्यूट्स कन्वेंशन फॉर आर्बिटे्रशन पर हस्ताक्षर नहीं किया है जबकि 150 से अधिक देश इसे लेकर अपनी सहमति दे चुके हैं। यह संधि 1966 में अतिस्तत्व में आई थी और विश्व बैंक ने इसे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के बीच विवाद समाधान एवं समझौते के एक ढांचे के तौर पर पेश किया था। भारत, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और मैक्सिको जैसे कुछ देशों ने इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। अगर भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर किया होता तो वोडाफोन इंटरनैशनल होल्डिंग बीवी पंचाट का निर्णय किसी भारतीय अदालत में रखा होता और आसानी से अपने पक्ष में फैसला ले लेता।
भारत ने अपेक्षाकृत लचीले यूनाइटेड नेशन कमीशन ऑन इंटरनैशनल ट्रेड लॉ संधि पर हस्ताक्षर किया है। इसे न्यूयॉर्क कन्वेंशन के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि इस पर भी भारत ने कुछ शर्तों के साथ हस्ताक्षर किए हैं। इनमें एक अहम शर्त यह है कि मध्यस्थता पंचाट के निर्णय केवल घरेलू कानून के तहत वाणिज्यिक विवादों पर ही लागू होंगे। भारत यह तर्क देगा कि पंचाट का आदेश लागू करना सार्वजनिक नीति के खिलाफ जाएगा क्योंकि पिछली तारीख से कर लगानो का प्रावधान पर देश की संसद ने मुहर लगाई है। दरअसल यही प्रावधान विदेशी निवेशकों में भय पैदा कर रहा है क्योंकि इस हालत में कर मांग को किसी मध्यस्थता अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।