भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने साल 2026 के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की संभावना को और कम कर दिया है। ऐसे में दैनिक उपभोक्ता वस्तु (एफएमसीजी) क्षेत्र की कंपनियों का इरादा कच्चे माल और माल ढुलाई की बढ़ती लागत जैसी चुनौतियों के बावजूद ज्यादा मात्रा में माल बेचना है।
हालांकि कीमतों में बदलाव के विकल्प अभी भी खुले हैं। लेकिन कंपनियों का वॉल्यूम वृद्धि पर फोकस बरकरार है। ऐसे में वे कीमतों में भारी बढ़ोतरी से हिचकिचा रही हैं। खर्च बढ़ाने के सरकारी प्रयासों की मदद से इस क्षेत्र में शहरी खपत भी मजबूत बनी हुई है। कंपनियों ने पिछले साल आयकर कटौती को वृद्धि के अहम कारणों में से एक बताया है।
मौसम विभाग ने साल 2026 के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के अपने पूर्वानुमान को लंबी अवधि के औसत के 90 प्रतिशत तक घटा दिया है। पहले यह अनुमान 92 प्रतिशत था। इससे संकेत मिलता है कि देश में इस साल बारिश सामान्य से कम हो सकती है।
एक एफएमसीजी कंपनी के अधिकारी ने कहा कि इस परिदृश्य में कीमतों में वृद्धि अपरिहार्य है। लेकिन कम वर्षा से मांग को भी नुकसान पहुंच सकता है।
कंपनी अपने उत्पादों में केवल 1 से 2 प्रतिशत की मूल्य वृद्धि की योजना बना रही है। उसकी प्राथमिकता वॉल्यूम बढ़ाना है। अधिकारी ने कहा, ‘माल ढुलाई लागत, पैकेजिंग लागत और कमजोर रुपया, ये सभी खेल बिगाड़ने का काम रहे हैं। लेकिन वॉल्यूम बढ़ाना हमारा एकमात्र लक्ष्य है। हम चुनिंदा तरीके ले कीमत वृद्धि करेंगे और बढ़ोतरी को यथासंभव कम रखेंगे।’
पारले प्रोडक्ट्स के उपाध्यक्ष मयंक शाह ने कहा कि शहरी मांग आयकर कटौती के कारण दमदार बनी हुई है, जो अधिक उपभोग के अहम कारणों में से एक बनी हुई है। उन्होंने कहा कि रबी की फसल भी अच्छी रही है।
शाह ने कहा, ‘खरीफ की फसल और वर्षा कम है या ज्यादा, इस पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है। कच्चे तेल के कारण कुछ मूल्य वृद्धि हो सकती है। पैकेजिंग लागत अस्थिर बनी हुई है। हमें उपभोक्ताओं पर यह बढ़ोतरी डालने से पहले पैकेजिंग लागत के स्थिर होने का इंतजार करना होगा, क्योंकि हम इस कारण मांग को नुकसान नहीं पहुंचने दे सकते।’ उन्होंने कहा कि आवश्यक और खाद्य उत्पादों की तुलना में गैर-जरूरी उत्पादों पर अधिक असर पड़ सकता है।
पश्चिमी भारत में दमदार मौजूदगी रखने वाली बालाजी वेफर्स भी वजन (उत्पाद की मात्रा) में कमी के रास्ते मूल्य वृद्धि पर विचार कर रही है। अलबत्ता ये बदलाव तुरंत नहीं होने हैं और केवल दो से तीन महीने बाद ही लागू होने के आसार हैं।