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बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव से प्रशांत किशोर की पहली अग्निपरीक्षा, जन सुराज पार्टी के लिए दांव पर लगी साख

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जन सुराज पार्टी प्रमुख प्रशांत किशोर बांकीपुर उपचुनाव से खुद चुनावी मैदान में उतरे हैं, जिससे बीजेपी के इस गढ़ में मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है

Last Updated- July 21, 2026 | 11:18 PM IST
Prashant Kishor
बिहार के बांकीपुर विधानसभा सीट से जन सुराज पार्टी (जेएसपी) के उम्मीदवार प्रशांत किशोर | फाइल फोटो

अमूमन किसी विधान सभा सीट के लिए उप-चुनाव को सियासी बिसात पर अधिक तूल नहीं दी जाती है। मगर बिहार के बांकीपुर विधानसभा सीट पर हो रहे उप-चुनाव के मामले में यह बात फिट नहीं बैठती है। वजह यह है कि जन सुराज पार्टी (जेएसपी) के उम्मीदवार के तौर पर प्रशांत किशोर के इस सीट पर दावेदारी के ऐलान से बांकीपुर उप-चुनाव अहम हो गया है। दतिया (मध्य प्रदेश) और मंजलपुर (गुजरात) में होने वाले उप-चुनावों के साथ ही 30 जुलाई को बिहार के बांकीपुर में भी चुनाव होने वाला है। यह किशोर के राजनीतिक प्रयोग की पहली बड़ी चुनावी परीक्षा है।

वर्ष 2025 के बिहार विधान सभा चुनाव में किशोर की पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। जेएसपी ने 243 में 238 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे मगर एक भी सीट हाथ नहीं लगी। अव्वल 236 सीटों पर उसके उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई। पार्टी को कुल मतदान में 3.3 प्रतिशत मत हासिल हुए थे। अब बांकीपुर उप-चुनाव के जरिये किशोर स्वयं उम्मीदवार के तौर पर चुनावी मैदान में उतर रहे हैं।

लोकनीति-सीएसडीएस के सह-निदेशक संजय कुमार के मुताबिक प्रशांत किशोर के राजनीतिक भविष्य के लिए बांकीपुर मुकाबले की काफी अहमियत है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) पर इसका कितना असर होगा यह दूर की बात है।

भाजपा नेता एवं राज्य के पूर्व मंत्री नितिन नवीन के इस्पीफे के बाद बांकीपुर सीट पर उप-चुनाव हो रहा है। नवीन ने पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद इस सीट से इस्तीफा दे दिया था।

चुनाव प्रचार में पहले ही कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। पहले अभिषेक कुमार सिन्हा इस सीट पर भाजपा के थे मगर कुछ ही दिन बाद पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए उन्होंने नामांकन वापस लिया। इसके बाद भाजपा नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतार दिया किसी तरह की संगठनात्मक गड़बड़ी की आशंका उस सीट पर पार्टी का खेल न बिगाड़ दे। इस सीट पर भाजपा का दो दशकों से कब्जा रहा है। प्रशांत किशोर ने इस घटनाक्रम का फायदा उठाया और यहां तक दावा कर दिया कि भाजपा के भीतर घबराहट है। हालांकि, सत्ताधारी पार्टी ने यह आरोप नकार दिया है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की तरफ से रेखा कुमारी गुप्ता चुनावी मैदान में हैं।

जेएसपी भी संगठनात्मक मुश्किलों से अछूती नहीं रही है। चुनाव प्रचार के दौरान इसके चार वरिष्ठ नेताओं (जिनमें विधान सभा चुनाव के पूर्व उम्मीदवार के सी सिन्हा, रीतेश रंजन उर्फ बिट्टू सिंह, गोपाल सिंह और किसान मोर्चा के जिला अध्यक्ष ब्रज किशोर सिन्हा शामिल हैं) ने भाजपा का दामन थाम लिया।

बांकीपुर 1995 से ही भाजपा का गढ़ रहा है। उस समय यह सीट पटना पश्चिम के नाम से जानी जाती थी। इस निर्वाचन क्षेत्र में लगभग 3.79 लाख मतदाता हैं जिनमें ऊंची जातियों, खासकर कायस्थ और वैश्य समुदायों का दबदबा है। राजनीतिक अनुमानों के मुताबिक कुल मतदाताओं में कायस्थ लगभग 15 प्रतिशत और वैश्य लगभग 9 प्रतिशत हैं। इसी सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने लगातार कायस्थ उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है।

किशोर ने नवीन के सीट छोड़ने के मामले को चुनाव प्रचार का मुद्दा बनाने की कोशिश की है। उन्होंने कहा,‘भाजपा बांकीपुर को अपना गढ़ मानती है। यहां के मतदाताओं ने बार-बार नितिन नवीन पर भरोसा जताया है। मगर नितिन नवीन ने उन्हें भूलने में जरा भी देर नहीं की। संसद में जाने का मौका मिलते ही उन्होंने यह सीट छोड़ दी।’

भाजपा के लिए अहम

यह उप-चुनाव बिहार में अप्रैल में सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद पहला विधानसभा चुनाव भी है। वह राज्य में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री हैं।

एक बड़ी जीत पार्टी के इस दावे को मजबूत करेगी कि नीतीश कुमार के दो दशक के कार्यकाल के बाद मतदाताओं ने भाजपा के सीधे नेतृत्व को स्वीकार कर लिया है। अगर जीत का अंतर कम रहता है या कोई उलटफेर होता है तो विपक्ष को यह सवाल उठाने का मौका मिल जाएगा कि क्या भाजपा का दबदबा कमजोर पड़ रहा है।

लोकनीति-सीएसडीएस के कुमार ने कहा,‘यह कहा जा सकता है कि यह चुनाव नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और नए भाजपा अध्यक्षकी लोकप्रियता की परीक्षा लेगा। इसलिए इन दोनों नेताओं की साख दांव पर लगी है। मगर मैं इस निर्वाचन क्षेत्र के नतीजों को नितिन नवीन या सम्राट चौधरी की लो​कप्रियता पर जनमत संग्रह नहीं मानूंगा।’

अन्य उप-चुनावों पर भी टिकी नजरें

मध्य प्रदेश और गुजरात में हो रहे उप-चुनावों का भी अपना राजनीतिक महत्त्व है। दतिया में छह बार के विधायक और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट न देने के भाजपा के फैसले से नाराजगी पैदा हुई है। पार्टी ने कांग्रेस के कुंवर घनश्याम सिंह के खिलाफ आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा है। घोषणा के बाद मिश्रा के समर्थकों ने दतिया में प्रदर्शन किए और राज्य भाजपा नेतृत्व के खिलाफ नारे लगाए। हालांकि, बाद में मिश्रा पार्टी उम्मीदवार तिवारी का समर्थन करने के लिए तैयार हो गए। यह उप-चुनाव कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती के बैंक धोखाधड़ी मामले में दोषी पाए जाने और चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित होने के कारण हो रहा है।

मंजलपुर में उप-चुनाव भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं गुजरात के पूर्व मंत्री योगेश पटेल के निधन के बाद हो रहा है। कई स्थानीय दावेदारों के बजाय सतीश पटेल को उम्मीदवार बनाने के भाजपा के फैसले से पार्टी के कुछ हिस्सों में नाराजगी है। सतीश पटेल सहकारी क्षेत्र के नेता हैं और इस निर्वाचन क्षेत्र के निवासी नहीं हैं। उनका मुकाबला गुजरात कांग्रेस के उपाध्यक्ष भीखाभाई रबारी से है।

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First Published - July 21, 2026 | 10:40 PM IST

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