रेफ्रिजरेशन ऐंड एयर कंडिशनिंग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आरएएमए) ने सरकार से एयर कंडीशनरों के अगले पांच वर्ष में 1 लाख करोड़ रुपये से ऊपर की बिक्री का 50 फीसदी निर्यात करने का वादा किया है। यह फिलहाल 16,000 करोड़ रुपये है।
उसने यह भी कहा है कि इस सेगमेंट से कमरे में लगने वाले एसी में घरेलू मूल्यवद्र्धन 25 फीसदी से बढ़कर 75 फीसदी तक हो सकता है।
नीति आयोग और उद्योग संवद्र्धन और आंतरिक व्यापार विभाग से उद्योग का यह वादा सरकार की ओर से पिछले वर्ष नवंबर में इस उद्योग के लिए उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (पीएलआई) की घोषणा के आलोक में किया गया है। घरेलू इलेक्ट्रॉनिक सामानों जिसमें एसी और लाइट एमिटिंग डायोड (एलईडी) शामिल हैं, के लिए 6,238 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ पीएलआई की घोषणा की गई थी। साझेदारों के साथ बैठक करने के बाद सरकार योजना को अंतिम रूप दे रही है।
घोषणा के हिस्से के तौर पर केंद्र ने योजना के तहत 10 क्षेत्रों के लिए 1.46 लाख करोड़ रुपये की रकम निश्चित की है। सरकार ने एसी उद्योग के लिए के लिए दोहरा लक्ष्य तय किया है। पहला घरेलू मूल्य वद्र्धन के लिए बहुत अधिक संभावना और दूसरा इन उत्पादों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना। इसमें कहा गया है कि इस सेगमेंट के लिए पीएलआई योजना से और अधिक मात्रा में उत्पादन होगा और निर्यात बढ़ेगा।
आरएएमए के अध्यक्ष तथा डाइकिन के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी कंवलजीत जावा सरकार से साथ हुई चर्चाओं पर बोलते हुए कहते हैं, ‘उद्योग बिक्री के 50 फीसदी के निर्यात के लक्ष्य तक पहुंच सकता है। फिलहाल चीन, वियतनाम और थाइलैंड के साथ हमारी लागत अयोग्यता 15-20 फीसदी है। मात्रा में वृद्धि के साथ पीएलआई योजना से हमें वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनने में मदद मिलेगी।’
जावा कहते हैं कि इस कदम से घरेलू मूल्यवद्र्धन 75 फीसदी तक पहुंचेगा। उदाहरण के लिए एसी की कुल लागत में 20 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले कंप्रेसर का चीन से आयात करने की बजाय भारत में निर्माण करने से स्थायी तौर पर मूल्यवद्र्धन में इजाफा होगा। अन्य घटकों में मोटर, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड, एल्युमीनियम और तांबा शामिल है।
कमरे में लगने वाले एसी के निर्यात की मात्रा के लिहाज से भारत की हिस्सेदारी महज 0.5 फीसदी है। हालांकि, यदि पीएलआई योजना कारगर होती है तो 2025 तक यह 10 फीसदी पर पहुंच सकता है।
कमरे में लगाए जाने वाले एसी का दुनिया भर में होने वाले उत्पादन में चीन की हिस्सेदारी 75 फीसदी है और वैष्विक मांग का 75 फीसदी चीन और थाइलैंड में ही पूरा होता है। चीन में एसी उत्पादन का 85 फीसदी महज पांच कंपनियों द्वारा किया जाता है।
दूसरी तरफ भारत तैयार एसी के कुल बिक्री मूल्य के 30 फीसदी का आयात चीन से करता है। एक और दिलचस्प विरोधाभास यह भी है कि 2019 में चीन ने जहां 10 करोड़ से अधिक कमरे में लगने वाले एसी का उत्पादन किया वहीं भारत में उस साल महज 70 लाख एसी का उत्पादन हुआ। 2019 में आई निर्मल बैंग की रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत में जहां 5 फीसदी घरों में एसी है वहीं चीन में यह संख्या 87 फीसदी और दुनिया में 60 फीसदी है। हालांकि उद्योग ने नोडल मंत्रालय (डीपीआईआईटी) से पीएलआई योजना के तहत 20,000 करोड़ रुपये की मांग रखी थी, जिसके मुकाबले से उसे बहुत कम मिला है। अब उसे इसका एक छोटा हिस्सा एलईडी विनिर्माताओं के साथ भी साझा करना पड़ेगा।