पश्चिम एशिया में पिछले महीने के आखिर में शुरू हुए संघर्ष के बाद रुपये पर भारी दबाव आया है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) रुपये को बड़ी गिरावट से बचाने के लिए जूझ रहा है।
मार्च महीने में रुपया 2.9 प्रतिशत गिरा है, जो शुक्रवार को 93.72 प्रति डॉलर के अब तक के निचले स्तर पर पहुंच गया। रिजर्व बैंक ने डॉलर की बिकवाली करके विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया, इसके बावजूद तेज गिरावट दर्ज की गई। रिजर्व बैंक ने करीब 4 अरब डॉलर की बिक्री की। डीलरों का कहना है कि अगर रिजर्व बैंक हस्तक्षेप न करता तो रुपया गिरकर 95 प्रति डॉलर केआंकड़े को पार कर जाता।
बाजार के भागीदारों का अनुमान है कि रिजर्व बैंक ने मार्च में संभवतः 26 अरब डॉलर से 27 अरब डॉलर की बिकवाली की है, जिससे रुपये की गिरावट को कम किया जा सके। रिजर्व बैंक हमेशा कहता रहा है कि वह किसी खास स्तर का लक्ष्य नहीं रखता, बल्कि सिर्फ उतार-चढ़ाव रोकने के लिए हस्तक्षेप करता है।
चालू वित्त वर्ष में अब तक डॉलर के मुकाबले रुपये में 8.8 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह वित्त वर्ष 2014 के बाद सबसे तेज गिरावट है, जब डॉलर के मुकाबले रुपया 9.37 प्रतिशत गिरा था।
मुद्रा विशेषज्ञों ने कहा कि आने वाले दिनों और महीनों में कई तरह के व्यवधान आ सकते हैं, जिनकी वजह से रिजर्व बैंक को रुपये को बचाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी।
भूराजनीतिक तनाव के चलते विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) सुरक्षित ठिकाने की तलाश में भाग रहे हैं। मार्च में इक्विटी निकासी 8.4 अरब डॉलर होने का अनुमान है। वहीं पूर्ण सुलभ मार्ग (एफएआर) के तहत बॉन्ड में आवक भी नकारात्मक है। यदि भूराजनीतिक तनाव बना रहता है तो हाल फिलहाल स्थिति में कोई बदलाव की संभावना नहीं है।
रिजर्व बैंक के फॉरवर्ड बुक में बढ़ता शॉर्ट पोजिशन एक और वजह है, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ा है। जनवरी के आखिर तक रिजर्व बैंक के फॉरवर्ड बुक में डॉलर का घाटा बढ़कर 68.4 अरब डॉलर हो गया है। फरवरी 2025 में घाटा 88.7 अरब डॉलर के उच्च स्तर पर पहुंच गया था, उसके बाद अगस्त में यह घटकर 53.3 अरब डॉलर रह गया। ताजा रिपोर्टों से पता चलता है कि मार्च में घाटा बढ़कर 100 अरब डॉलर हो गया है।
बार्कलेज ने शुक्रवार को एक नोट में कहा, ‘रुपये पर लगातार असर डालने वाली एक और प्रमुख वजह रिजर्व बैंक का आउटस्टैंडिंग फॉरवर्ड बुक एक्सपोजर है।’
नोट में कहा गया है, ‘रुपये में और अधिक तेज गिरावट को रोकने के लिए रिजर्व बैंक हाजिर और फॉरवर्ड दोनों के माध्यम से विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करना जारी रखता है। अनुमानों से पता चलता है कि रिजर्व बैंक का समग्र फॉरवर्ग बुक घाटा करीब 100 अरब डॉलर पहुंच गया है।’
बार्कलेज का कहना है कि एफपीआई और एफडीआई की निकासी के अलावा भुगतान संतुलन भी रुपये पर दबाव डाल रहा है, क्योंकि तेल की कीमतों के झटके का असर रुपये पर पड़ता है।
चालू वित्त वर्ष की अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में भुगतान संतुलन घाटा बढ़कर 24.4 अरब डॉलर हो गया, जो पिछली तिमाही में 10.9 अरब डॉलर था।
भुगतान संतुलन घाटे में वृद्धि का मुख्य कारण पूंजी खाता का नकारात्मक होना था, जो वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही में 10 अरब डॉलर रहा। दूसरी तिमाही में 2.1 अरब डॉलर का शुद्ध अधिशेष था।
आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता ने कहा, ‘पश्चिम एशिया का झटका ऐसे समय में आया है जब भारत से पहले से ही पूंजी की निकासी हो रही थी। रुपये को स्थिर रखने के लिए बहुत ज्यादा हस्तक्षेप करने की जरूरत होगी।’ उन्होंने कहा, ‘संकट की अवधि अज्ञात है। यदि यह लंबा खिंचता है तो विदेशी मुद्रा भंडार बचाए रखना महत्त्वपूर्ण है।’
नवीनतम आंकड़ों के अनुसार भारत का विदेशी भंडार 13 मार्च को समाप्त सप्ताह में घटकर 709.8 अरब डॉलर रह गया, जो 27 फरवरी, 2026 को समाप्त सप्ताह में 728.5 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया था।
पिछले साल मार्च के अंत से भंडार 44.4 अरब डॉलर बढ़ा है, जिसका मुख्य कारण सोने के भंडार में वृद्धि है। चालू वित्त वर्ष में विदेशी मुद्रा संपत्ति (एफसीए) वास्तव में 9.4 अरब डॉलर गिर गई है, जो विदेशी मुद्रा भंडार का प्रमुख घटक है। वित्त वर्ष 2025 में एफसीए 5.6 अरब डॉलर गिर गया था, जिसमें इसके पहले के वित्त वर्ष में 60 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई थी।
सेन गुप्ता ने आगे कहा, ‘इसके अलावा डॉलर की मजबूती के कारण पुनर्मूल्यांकन हानि, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में वृद्धि और सोने की कीमतों में गिरावट के कारण विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आएगी।’
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी जारी रहने के कारण इस सप्ताह भी रुपया दबाव में रहेगा। बाजार भागीदारों को लगता है कि भारतीय मुद्रा इस सप्ताह की शुरुआत में 94 प्रति डॉलर के स्तर को पार कर सकती है।