सत्र अदालत ने इस आदेश के साथ ही मजिस्ट्रेट की अदालत के आदेश के को चुनौती देने वाली याचिका का निबटारा कर दिया। मजिस्ट्रेट ने इस व्यक्ति को प्रति माह अपनी पत्नी को 32 हजार रूपए और बच्चे को 18 हजार रूपए देने का आदेश दिया था।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लाउ ने कहा, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि अपीलकर्ता :पति: खुद ही अपने आय के स्रोत और वास्तविक आय के बारे में स्पष्ट नहीं है। मैं 27 अप्रैल 2013 के मजिस्ट्रेट के विस्तृत आदेश को बरकरार रखती हूं। पारंपरिक आकलन के आधार पर पत्नी और उसकी नाबालिग बेटी के लिए 50 हजार रूपए का अंतरिम गुजारा भत्ता सही है क्योंकि इसमें वैकल्पिक आवास के लिए किराए की राशि भी शामिल है।
जज ने कहा, इसलिए इन परिस्थितियों के मद्देनजर मैं इस आदेश में हस्तक्षेप के पक्ष में नहीं हूं।
हैदराबाद निवासी इस व्यक्ति :अपीलकर्ता: ने अपनी अपील में कहा कि सुनवाई अदालत इस बात पर गौर नहीं कर पाई है कि दिल्ली में रहने वाली महिला ने उसके खिलाफ उत्पीड़न का मामला सिर्फ और सिर्फ पैसा उगाहने के लिए दायर किया है।