Iran War Impact: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब एशियाई देशों पर साफ दिखने लगा है। एशिया के ज्यादातर देश तेल और गैस के लिए पश्चिम एशिया पर निर्भर हैं, इसलिए सप्लाई में रुकावट आते ही कीमतें बढ़ गई हैं। इसका सीधा असर इन देशों के खर्च, व्यापार और अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
ऊर्जा की कीमतें बढ़ना सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। इसका असर ट्रांसपोर्ट, बिजली, खेती और खाने-पीने की चीजों तक पहुंचता है। गैस की कमी से फर्टिलाइजर उत्पादन प्रभावित होता है, जिससे खेती महंगी हो जाती है और फूड प्राइस बढ़ने लगते हैं। एशिया के कई देशों में महंगाई के टोकरी में खाने और ट्रांसपोर्ट का हिस्सा 50 प्रतिशत से भी ज्यादा है। ऐसे में तेल की कीमत बढ़ते ही आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ता है।
NATIXIS की रिपोर्ट के मुताबिक, स्थिति इतनी गंभीर हो सकती है कि कई देशों में स्टैगफ्लेशन यानी धीमी ग्रोथ और ऊंची महंगाई एक साथ देखने को मिल सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, थाईलैंड, साउथ कोरिया, ताइवान और फिलीपींस जैसे देश सबसे ज्यादा जोखिम में हैं। ये देश ऊर्जा के बड़े आयातक हैं और कीमतों में हर बढ़ोतरी इनके आर्थिक संतुलन को बिगाड़ सकती है। फिलीपींस की स्थिति सबसे ज्यादा नाजुक मानी गई है क्योंकि वह ऊर्जा और खाद्य दोनों का आयात करता है। वहीं भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है। भारत को पश्चिम एशिया से बड़ी मात्रा में रेमिटेंस मिलता है। अगर वहां काम करने वाले लोगों की आमदनी प्रभावित होती है, तो इसका असर भारत के करंट अकाउंट और घरेलू खर्च पर भी पड़ेगा।
वहीं, थाईलैंड और साउथ कोरिया जैसे देश भले ही करंट अकाउंट सरप्लस में हों, लेकिन ऊर्जा पर उनकी निर्भरता इतनी ज्यादा है कि उनके जीडीपी पर बड़ा असर पड़ सकता है।
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इस संकट का असर एक नहीं, बल्कि चार बड़े चैनलों से एशिया तक पहुंच रहा है।
इन चारों का संयुक्त असर अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ सकता है।
आंकड़े बताते हैं कि एशिया के देश इस संकट से निपटने के लिए तेजी से कदम उठा रहे हैं। थाईलैंड डीजल की कीमत पर कैप लगाकर सब्सिडी दे रहा है, लेकिन इससे उसके ऑयल फंड पर भारी बोझ पड़ रहा है। साउथ कोरिया टैक्स कट और सब्सिडी के जरिए राहत देने की कोशिश कर रहा है। ताइवान ने तेल की कीमतों पर साप्ताहिक नियंत्रण लागू किया है।
वियतनाम सीधे पेट्रोल-डीजल पर सब्सिडी दे रहा है, जबकि फिलीपींस ड्राइवरों को नकद मदद दे रहा है और सब्सिडी बढ़ाने पर विचार कर रहा है। जापान ने तो अपने तेल भंडार तक जारी कर दिए हैं ताकि कीमतों को काबू में रखा जा सके।
भारत ने गैस सप्लाई को प्राथमिकता देकर उर्वरक और घरेलू जरूरतों को सुरक्षित करने की कोशिश की है। चीन ने ईंधन के निर्यात पर रोक लगाकर घरेलू सप्लाई बचाई है। मलेशिया और इंडोनेशिया भी सब्सिडी के जरिए कीमतों को कंट्रोल में रखने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन सच्चाई यह है कि जितना लंबा यह संघर्ष चलेगा, उतना ही सरकारों का खर्च बढ़ेगा।
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सरकारें अभी कीमतों को रोकने के लिए सब्सिडी दे रही हैं, लेकिन यह हमेशा नहीं चल सकता। जैसे-जैसे तेल महंगा होगा, सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा और सरकारों के बजट पर दबाव आएगा। थाईलैंड पहले ही संकेत दे चुका है कि उसे डीजल की कीमत बढ़ानी पड़ सकती है। इंडोनेशिया के सामने भी यही चुनौती है। अगर सरकारें सब्सिडी नहीं बढ़ातीं, तो महंगाई बढ़ेगी। और अगर सब्सिडी बढ़ाती हैं, तो फिस्कल डेफिसिट बढ़ेगा। यानी दोनों ही स्थिति में दबाव तय है।
यह संकट सिर्फ ऊर्जा तक सीमित नहीं है। गैस की सप्लाई बाधित होने से फर्टिलाइजर उत्पादन पर असर पड़ रहा है। इसका सीधा असर खेती और खाद्य उत्पादन पर पड़ेगा। फिलीपींस जैसे देश, जो पहले से ही खाद्य और ऊर्जा दोनों के आयातक हैं, सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। वहीं भारत और थाईलैंड जैसे देश, जो खाद्य निर्यात करते हैं, उन्हें भी उत्पादन लागत बढ़ने का सामना करना पड़ेगा।
जेट फ्यूल की कीमतें बढ़ने से हवाई यात्रा महंगी हो गई है। कई एयरलाइंस ने उड़ानें कम कर दी हैं। अगर यह स्थिति बनी रहती है, तो टूरिज्म पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को बड़ा झटका लग सकता है। थाईलैंड, वियतनाम और मलेशिया जैसे देशों के लिए यह एक बड़ा खतरा बन सकता है।
जैसे-जैसे जोखिम बढ़ता है, निवेशक सुरक्षित निवेश की ओर जाते हैं। इससे एशिया में पूंजी का फ्लो कम हो सकता है और वित्तीय हालात सख्त हो सकते हैं। सेंट्रल बैंक अब ब्याज दरों को घटाने की बजाय बढ़ाने की सोच सकते हैं, ताकि महंगाई को कंट्रोल किया जा सके। इससे ग्रोथ पर और दबाव पड़ेगा।
कुल मिलाकर, यह संकट एशिया के लिए एक डबल झटका बनकर सामने आ रहा है। एक तरफ महंगी ऊर्जा और बढ़ती महंगाई, और दूसरी तरफ धीमी होती आर्थिक ग्रोथ। फिलीपींस सबसे ज्यादा जोखिम में दिख रहा है, जबकि भारत पर भी असर पड़ सकता है। एकमात्र राहत यह है कि कुछ देशों के पास भंडार और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत हैं। लेकिन अगर यह संघर्ष लंबा चला, तो एशिया की अर्थव्यवस्था के लिए यह एक बड़ा झटका साबित हो सकता है।