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यूपीआई : डिजिटल का शोर, गड़बड़ी हुई तो कौन करेगा गौर?
तिनेश भसीन /  December 25, 2016

जब से केंद्र सरकार ने विमुद्रीकरण यानी नोटबंदी का ऐलान किया है तभी से नकदरहित लेनदेन पर सभी को जोर नजर आ रहा है और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) भी सुर्खियों में है। नीति आयोग के मुख्य कार्याधिकारी अमिताभ कांत ने यूपीआई दुनिया की सबसे आसान भुगतान प्रणालियों में से एक करार दिया है। इसमें आपको बहुत कुछ झंझट भी नहीं करना पड़ता है। आपको जिसे भुगतान करना है या जिसके पास रकम भेजनी है, उसके आधार क्रमांक यानी आभासी पेमेंट एड्रेस की जरूरत पड़ती है। यह पता लगने के बाद आपको केवल अंगूठा टिकाना होगा और आप अपने बैंक खाते तक भी पहुंच जाएंगे तथा दूसरे पक्ष को रकम भी भेज पाएंगे। इसमें सबसे अच्छी और खास बात यह है कि बैंक की खाता संख्या और आईएफएससी कोड जैसी तमाम बातें याद रखने की आपको कोई जरूरत नहीं है। अब आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि यह प्रक्रिया कितनी आसान है।

 
वाकई यह बहुत आसान है, लेकिन बैंक और ग्राहक कुछ बातों को लेकर चिंतित रहते ही हैं। देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक की चेयरपर्सन अरुंधती भट्टाचार्य ने एक टेलीविजन चैनल को पिछले दिनों दिए एक साक्षात्कार में कहा कि अभी यह बात स्पष्टï नहीं है कि अगर लेनदेन पूरा नहीं हो पाता है तो उसकी शिकायत किस बैंक से की जाएगी और उसे सुलझाने का जिम्मा किसका होगा। हालांकि यूपीआई के जरिये लेनदेन में 8 नवंबर के बाद से जबरदस्त इजाफा हुआ है। जिस दिन प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का ऐलान किया था, उस दिन यूपीआई से 3,721 लेनदेन हुए थे, लेकिन 7 दिसंबर को इसके जरिये 48,238 लेनदेन किए गए। इस तरह महज एक महीने के अंदर लेनदेन में 1,196 फीसदी का इजाफा हुआ। फिर भी कई लोगों को इस पर भरोसा नहीं है।
 
कौन निपटाएगा शिकायत
 
यूपीआई के जरिये लेनदेन में चार पक्ष शामिल हो सकते हैं: दो पक्ष तो ऐप तैयार करने वाले होंगे (एक रकम भेजने वाले के फोन में मौजूद ऐप बनाने वाला और दूसरा पाने वाले का ऐप बनाने वाला), तीसरा वह बैंक, जिससे रकम भेजी जानी है और चौथा वह बैंक, जिसमें रकम आनी है। यूपीआई में व्यक्ति किसी बैंक का ग्राहक बने बगैर ही उसके ऐप का इस्तेमाल कर सकता है और किसी दूसरे बैंक के खाते को उससे जोड़ सकता है। लेकिन यदि लेनदेन विफल रहता है तो वह रकम भेजने वाले के खाते में वापस नहीं आती है। ऐसे में उसे अपने बैंक के पास ही शिकायत करनी होगी।
 
बैंकरों का कहना है कि अभी किसी भी पक्ष को यह नहीं पता होता कि समस्या किस जगह है और रकम खुद-ब-खुद वापस आने की कोई व्यवस्था भी अभी नहीं है। एक बैंकर कहते हैं, 'फिलहाल नैशनल पेमेंट्ïस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) अधिकारी इन दिक्कतों को सुलझान में मदद करते हैं, लेकिन अभी लेनदेन की संख्या भी बहुत कम है। जब रोजाना कई लाख लेनदेन होंगे तो शिकायतों का निपटारा करना एनपीसीआई के लिए भी मुश्किल होगा और बैंक कर्मचारियों के लिए भी।' उस सूरत में ग्राहकों को खुद ही बैंक से बार-बार संपर्क करना होगा।
 
कैसे हो निपटारा
 
जैसे ही रकम भेजने वाले के खाते से किसी लेनदेन की शुरुआत की जाती है तो उसकी सूचना एनपीसीआई के सर्वर पर पहुंच जाती है। वहां से वह सूचना रकम पाने वाले के बैंक तक जाती है। कभी कभार ऐसा भी होता है कि दूसरे बैंक से लेनदेन की पुष्टिï होने से पहले ही उसके लिए निर्धारित समय पूरा हो जाता है यानी टाइम आउट हो जाता है, लेकिन रकम पाने वाले के खाते में पहुंच जाती है। उस सूरत में रकम भेजने वाले के पास तो लेनदेन विफल रहने का संदेश आता है यानी उसके बैंक खाते से रकम नहीं निकली होती है, लेकिन दूसरे बैंक को रकम मिल चुकी है। ऐसे में मामला सुलझाने के लिए दोनों बैंकों को मिलकर काम करना होगा और रकम भेजने वाले या पाने वाले के खाते से उक्त रकम निकालनी होगी। लेकिन मामला तब पेचीदा हो जाता है, जब रकम पाने वाला पैसा आते ही उसे किसी और खाते में भेज देता है या निकाल लेता है। इसीलिए बैंकों ने एनपीसीआई से अनुरोध किया है कि प्राप्तकर्ता बैंक से पहले यह पुष्टिï की जाए कि रकम वहां पहुंची है या नहीं और उसके बाद ही लेनदेन पूरा होने या नाकाम रहने का संदेश भेजा जाए।
 
प्रक्रिया से परेशानी
 
कुछ बैंकों को लेनदेन की शुरुआत करने वाली प्रक्रिया से परेशानी होती है। इस प्रक्रिया में डेबिट कार्ड संख्या के आखिरी 6 अंक और उसकी एक्सपायरी डेट की जरूरत होती है। बैंकों का कहना है कि यह विवरण बेहद आसानी से प्राप्त होता है क्योंकि लोग खरीदारी करते वक्त पॉइंट ऑफ सेल (पीओएस) मशीनों पर अपने कार्ड सौंप देते हैं। बैंकों ने एनपीसीआई से कहा है कि साइन अप करते वक्त ग्राहकों से अपने कार्ड की निजी पहचान संख्या (पिन) भी डालने के लिए कहा जाए।
 
व्यापारियों को सुविधा नहीं
 
लेनदेन की संख्या कम होने की बहुत बड़ी वजह यही बताई जाती है। ट्रूपे के सह संस्थापक विवेक लौहचब बताते हैं, 'बैंकों ने यूपीआई पर व्यापारियों के लिए भुगतान की सुविधा ही शुरू नहीं की है।'
 
तकनीकी खामियां
 
लौहचब कहते हैं कि कुछ अरसा पहले तक यदि किसी व्यक्ति के पास दो सिम वाला मोबाइल फोन होता था और उसने पंजीकृत फोन नंबर वाले सिम को प्राथमिक सिम स्लॉट में नहीं डाला होता था तो पंजीकरण हो ही नहीं पाता था। इसके अलावा जब कोई व्यक्ति अपना मोबाइल फोन बदलता है तो उसे यूपीआई की सेवाओं के लिए नए सिरे से पंजीकरण करना होता है। अलबत्ता ज्यादातर लोगों को यही लगता है कि आगे चलकर मुश्किलें खत्म हो जाएंगी। स्टेट बैंक में उप प्रबंध निदेशक (कॉर्पोरेट स्ट्रैटेजी ऐंड न्यू बिजनेस) मंजू अग्रवाल मानती हैं, 'ये शुरुआती दिक्कतें हैं। एक बार जब इनका समाधान हो जाएा तो देश में ज्यादा से ज्यादा लेनदेन यूपीआई के जरिये ही किए जाएंगे। दुनिया में लेनदेन की कोई भी प्रणाली यूपीआई जितनी सरल और सहज नहीं है।' ऐक्सिस बैंक के कार्ड एवं भुगतान कारोबार प्रमुख संग्राम सिंह भी इस बात से सहमत हैं। वह कहते हैं, 'यूपीआई की अभी शुरुआत है। जब सक्रिय उपयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ जाएगी (5 करोड़ हो जाएगी) तो इसमें तेजी से इजाफा होगा। अगली दो या तीन तिमाहियों में ऐसा हो सकता है।'
 

चंद शिकायतें ही आई हैं अभी : ए पी होता

एनपीसीआई के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी ए पी होता ने तिनेश भसीन के साथ बातचीत में स्वीकार किया कि यूपीआई का क्रियान्वयन शुरुआती समय-सीमा पर खरा नहीं उतरा है, लेकिन उन्होंने उम्मीद जताई कि इस पर लेनदेन का आंकड़ा अगले साल मार्च तक 10 लाख रोजाना के पार पहुंच जाएगा। मुख्य अंश:

 
क्या यूपीआई को आपकी उम्मीद के मुताबिक तेजी से अपनाया जा रहा है?
 
पिछले कुछ महीनों में लेदने में तेजी आई है। हमने 8 दिसंबर को करीब 85,000 सऊल लेनदेन देखे। हमरा लक्ष्य अगले साल मार्च तक 10 लाख लेनदेन रोजाना का आंकड़ा हासिल करना है। फिलहाल 31 बैंक यूपीआई से जुड़े हुए हैं। सरकारी बैंकों को इस प्लेटफॉर्म के साथ जोडऩे के मामले में हम तय समयसीमा से पीछे चल रहे हैं। बैंक ऑफ इंडिया और सिंडिकेट बैंक इस महीने के अंत तक यूपीआई से जुड़ जाएंगे। कॉर्पोरेशन बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक अैर पंजाब ऐंड सिंध बैंक को कुछ वक्त लग जाएगा, शायद जनवरी मध्य तक का। सरकारी बैंक अहम हैं क्योंकि उनके जुडऩे से क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक भी यूपीआई के साथ जुड़ जाएंगे।
 
कुछ बैंकों ने शिकायत निपटान प्रणाली को लेकर चिंता जताई है। इस पर आप क्या कर रहे हैं?
 
यूपीआई में ग्राहक किसी एक बैंक का हो सकता है, ऐप दूसरे बैंक का हो सकता है और रकम किसी तीसरे बैंक को भेजी जा सकती है। लेकिन तकरीबन 75 फीसदी मामलों में एक बैंक से दूसरे बैंक को स्पष्टï लेनदेन होता है। आम लेनदेन में दो से अधिक बैंकों का कोई काम नहीं होता है। बैंकों के बीच लेनदेन में शिकायतों का निपटारा मुश्किल भरा होता है, इसलिए यह मानना एकदम सही है तीन बैंक होने पर दिक्कत ओर ज्यादा होगी। लेकिन यूपीआई प्रणाली में शिकायत निपटारा व्यवस्था पहले से मौजूद है। अगर किसी को लगता है कि लाभार्थी तक रकम नहीं पहुंची है या ग्राहक के खाते से गलती से रकम निकाल ली गई है तो ऐप से ही शिकायत करने की सुविधा मौजूद है। हम लेनदेन का पूरा पता लगा सकते हैं, जिससे निपटारा आसान हो जाता है। पिछले चार-पांच महीनों में मुश्किल से ही किसी ग्राहक ने इस तरह की शिकायत दर्ज कराई है।
 
क्या समस्या दूर करने का जिम्मा ऐप डेवलपर का होना चाहिए?
 
नहीं। सेवा मुहैया कराने वालों को ही यह जिम्मा लेना चाहिए। यह काम एनपीसीआई, बैंक की एजेंसी और खुद बैंक का है।
Keyword: digital payment, UPI,,
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